भाजपा की ‘बंगाल क्रांति’ जारी : तीन सीटें हार कर भी ममता के गढ़ में लगातार लग रही सेंध…

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 30 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। हमारे देश में हर महीने-दो महीने में किसी न किसी क्षेत्र में कोई न कोई चुनाव या उप चुनाव होते रहते हैं। भले ही ये छोटे-मोटे चुनाव देश की राष्ट्रीय राजनीति में अधिक प्रभाव न डालते हों, परंतु कुछ चुनाव के परिणाम ऐसे होते हैं, जो राज्य की सत्ता में बैठे लोगों की नींद उड़ा देते हैं। शुक्रवार को भी देश में दो राज्यों उत्तराखंड (1) और पश्चिम बंगाल (3) की 4 विधानसभा सीटों के उप चुनाव परिणाम घोषित हुए। राष्ट्रीय राजनीति में भले ही इनकी चर्चा अधिक न हुई हो, परंतु स्थानीय स्तर पर इन चुनाव परिणामों ने विशेषकर पश्चिम बंगाल में बड़ा प्रभाव डाला है।

वास्तव में पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP-बीजेपी) के बढ़ते कद से सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC), उसकी सुप्रीमो व मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी लगातार परेशान हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा ने ममता के गढ़ पश्चिम बंगाल में भारी सेंध लगा कर 18 सीटें जीत लीं, तो ममता को अपनी राजनीतिक ज़मीन खिसकती दिखाई देने लगी। इतना ही नहीं, ममता ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 के लिए लोकसभा चुनावों में भाजपा के सेंध लगाने के बाद से ही तैयारियाँ शुरू कर दी हैं, परंतु ममता की तैयारियों का बहुत अधिक प्रभाव देखने को नहीं मिल रहा। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है, क्योंकि राज्य की 3 विधानसभा सीटों के उप चुनाव परिणाम कुछ यही संकेत दे रहे हैं।

हार कर भी बाज़ीगर बनी भाजपा

इसमें कोई संदेह नहीं है कि पश्चिम बंगाल में हुए उप चुनावों में ममता बैनर्जी की पार्टी टीएमसी ने तीनों सीटें जीत लीं। कालियागंज, करीमपुर और खड़गपुर सदर विधानसभा सीटों के उप चुनावों में टीएमसी को ही विजय हासिल हुई है और दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव में तेजी से आगे बढ़ने वाली भाजपा को हार का सामना करना पड़ा, परंतु हार के बावजूद भाजपा छावनी में निराशा नहीं, अपितु संतोष का वातावरण है, क्योंकि इन परिणामों में भी भाजपा की लोकसभा चुनाव 2019 में आरंभ हुई ‘बंगाल क्रांति’ की झलक स्पष्ट रूप से देखने को मिली है। उप चुनाव परिणामों के आँकड़ों का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट है कि भाजपा की बंगाल क्रांति जारी है और तीनों सीटें जीतने के बावज़ूद ममता बैनर्जी न तो इतनी अधिक खुश होंगी और न ही इस बात को लेकर आश्वस्त होंगी कि उनका बंगाली दुर्ग अब भी उतना ही सुरक्षित है। चुनाव परिणामों के आँकड़ों का विश्लेषण करें, तो भाजपा भले ही तीनों सीटें हार गई, परंतु विधानसभा चुनाव 2016 की तुलना में भाजपा को तीन गुना अधिक वोट मिले हैं। इतना ही नहीं भाजपा तीनों सीटों पर दूसरे नंबर पर रही है।

कालियागंज

एक-एक सीट का विश्लेषण करें, तो सबसे पहले कालियागंज विधानसभा सीट को ही ले लीजिए। यह सीट टीएमसी ने मात्र 2,414 वोटों से जीती है और हारने वाली पार्टी यानी दूसरे नंबर वाली पार्टी भाजपा रही है। भाजपा को यहाँ 95 हजार से अधिक वोट हासिल हुए हैं। विधानसभा चुनाव 2016 में कालियागंज सीट कांग्रेस ने टीएमसी को 46 हजार 602 वोटों से हरा कर जीती थी, जबकि भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी। एक तरह से उप चुनाव में टीएमसी ने कालियागंज में वापसी की है, परंतु ममता को परेशान करने वाली बात यह है कि भाजपा यहाँ दूसरे स्थान पर रही है। इसका अर्थ यह हुआ कि भाजपा का जनाधार 2016 के मुक़ाबले तीन गुना बढ़ा है।

करीमपुर

करीमपुर उप चुनाव में टीएमसी ने 23,910 वोटों से जीत हासिल की और भाजपा यहाँ भी दूसरे स्थान पर रही है। 2016 से तुलना की जाए, तो टीएमसी के प्रदर्शन में सुधार हुआ है, क्योंकि 2016 में टीएमसी ने यह सीट 15,989 वोटों से जीती थी। इस लिहाज़ से उप चुनाव में जीत का अंतर बढ़ा है, परंतु 2016 में जहाँ निकटतम् प्रतिद्वंद्वी यानी दूसरे नंबर पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा-CPM) थी और भाजपा तीसरे स्थान पर थी, वहीं इस उप चुनाव में भाजपा 78 हजार वोट पाकर दूसरे स्थान पर रही है। भाजपा की यह हार वाली बढ़त ममता और टीएमसी के लिए 2021 के चुनाव में परेशानी का सबब बन सकती है।

खड़गपुर सदर

इसी प्रकार खड़गपुर सदर सीट की बात करें, तो यहाँ भी टीएमसी ने 20 हजार 853 मतों से जीती। टीएमसी ने भाजपा को हराया। भाजपा दूसरे नंबर पर रही। यहाँ भाजपा को झटका लगा है, क्योंकि 22016 में प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने यह सीट जीती थी और उनके सांसद बनने के बाद दिए गए त्यागपत्र के कारण उप चुनाव हुए थे। इस लिहाज़ से खड़गपुर सदर सीट टीएमसी ने न केवल भाजपा से छीनने में सफलता पाई है, अपितु 2016 में तीसरे स्थान से लंबी छलांग भी लगाई है।

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