दान, पुण्य और कीर्ति : मोह की वो पराकाष्ठा, जो आत्म-ज्ञान के पथिक के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है

आज राम नवमी है अर्थात् भगवान श्री राम का अवतरण दिवस। यहाँ अवतरण दिवस इसलिए, क्योंकि मृत्युलोक में जन्म लेने वाले प्रत्येक प्राणी की मृत्यु निश्चित है, परंतु ईश्वर विश्व कल्याण के लिए मृत्युलोक पर आते हैं। वे माया का आधार लेकर किसी माता की कोख से जन्म लेते दिखाई पड़ते हैं, परंतु वास्तव में ईश्वर का यह जन्म नहीं, अपितु अवतरण होता है, क्योंकि जो भी इस मृत्युलोक पर मानव बन कर जन्म लेने के बाद ‘ईश्वर’ बन जाता है, वह कभी मरता नहीं है। उसके शरीर का नाश होता है, परंतु माता की कोख से अज्ञानी के रूप में जन्म लेने वाला कोई भी व्यक्ति स्वयं से साक्षात्कार के बाद ईश्वर के साथ एकाकार हो जाता है और फिर वह मरता नहीं, बल्कि अंतर्ध्यान होता है।

भगवान राम ने भी माता कौशल्या की कोख से जन्म लिया था मानव के रूप में। राम भगवान विष्णु का अवतार थे। चूँकि उन्होंने मावन देह धारण किया था। इसलिए वे जन्म के साथ जागतिक दृष्टि से ज्ञानी नहीं थे। ज्ञानी का अर्थ है : वह व्यक्ति, जिसने यह जान लिया है कि वह देह नहीं, आत्मा है, वह ज्ञानी है। जानकारियों का कूड़ा भर कर घूमने वाला व्यक्ति सही अर्थ में ज्ञानी नहीं होता। भगवान राम भी जागतिक दृष्टि से अज्ञानी थी। इसलिए उन्होंने गुरु वशिष्ठ से आत्म-ज्ञान प्राप्त किया। अवतारी पुरुष के रूप में राम का जीवन कई लोगों को दुःखों से भरा हुआ लगता है। ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि ज्ञानी पुरुष तो दुःख से मुक्त होता है, फिर राम दुःखी क्यों रहे ? इसका उत्तर है जगत की भ्रांति। जिन्होंने राम के चरित्र को बाहर से देखा, उन्हें ही राम दुःखी दिखाई दिए, परंतु योग वशिष्ठ ग्रंथ के अनुसार राम भीतर से परम् शांत थे, क्योंकि वे अज्ञान रूपी सभी ष़ड्रिपुओं (6 शत्रु) काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर से मुक्त थे।

क्या है जीवन का सौभाग्य और दुर्भाग्य ?

अब आते हैं शीर्षक पर। यह शीर्षक और यह विश्लेषण उन लोगों के लिए है, जो आत्म-ज्ञान के पथ पर अग्रसर हैं, जिन्हें अध्यात्म की भाषा में मुमुक्षु भी कहा जाता है। हमारे वेदांत, उपनिषदों और आत्म-ज्ञान का मार्ग दिखाने वाले श्रीमद् भगवद् गीता सहित अनेक ग्रंथों तथा स्वयं-साक्षात्कारी गुरुओं की उद्घोषणा का जो सार है, वह यही है कि मानव जीवन केवल और केवल स्वयं से साक्षात्कार के लिए ही मिलता है, क्योंकि 84 लाख योनियों में एकमात्र मानव योनि में ही स्वयं से साक्षात्कार और स्वयं को ईश्वर के साथ एकाकार किया जा सकता है। अन्य 83,99,999 योनियों के प्राणियों और यहाँ तक कि देवताओं के लिए भी ईश्वर से एकाकार होना संभव नहीं है। अर्थात् मानव जीवन का एक ही लक्ष्य होना चाहिए स्वयं से साक्षात्कार। संसार में रह कर सभी कर्तव्य कर्मों का निष्काम भाव से पालन करते हुए स्वयं से साक्षात्कार करना। मानव जीवन के सौभाग्य और दुर्भाग्य पर दृष्टि डालें, तो यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में यक्ष पूछता है, ‘मानव जीवन का सौभाग्य क्या है ?’ युधिष्ठिर उत्तर देते हैं, ‘सत्संग’। यह बात आज के आधुनिक युग में उन लोगों के लिए और भी अधिक परम सौभाग्य की बात बन जाती है, जिन्हें सत्संग का लाभ मिला है। दुर्भाग्य की बात करें, तो राजा जनक की सभा में आयोजित शास्त्रार्थ के दौरान गार्गी-याज्ञवल्क्य संवाद में गार्गी के अनेक प्रश्नों के उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य एक उत्तर यह भी देते हैं, ‘जो मनुष्य स्वयं से साक्षात्कार किए बिना इस लोक से चला जाता है, वह कृपण, दया का पात्र और दुर्भाग्यशाली है।’ इन दोनों दृष्टांतों से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि मृत्युलोक पर जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य को सारे काम छोड़ कर सबसे पहला काम क्या करना चाहिए ?

चौथा रिपु मोह सबसे शक्तिशाली

मनुष्य जन्म लेने के बाद अपने पूर्व जन्म के संस्कारों, वर्तमान जीवन में विरासत में मिली रुढ़ियों और उस पर अशुद्ध मन के कुप्रभाव के कारण षड्रिपुओं से बुरी तरह घिर जाता है। हमारे शास्त्रों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की विभावना है, जिसका कई लोग ग़लत अर्थ लगाते हुए मोक्ष को अंतिम लक्ष्य मानते हैं, परंतु मोक्ष कोई पाने की वस्तु नहीं है, अपितु अनुभूति का विषय है और यदि मानव अपने जीवन में चारों विभावनाओं में पहली प्राथमिकता मोक्ष को दे, तो धर्म, अर्थ और काम स्वयं ही उसके जीवन में ज्ञानमय हो जाते हैं, परंतु मानव ऐसा सोचे, उससे पहले उसे षड्रिपु घेर लेते हैं। धर्मग्रंथों और सद्गुरुओं की विविध वाणियों के अनुसार इन षड्रिपुओं को आधार बना कर ही अच्छे व्यक्ति अच्छा और बुरे व्यक्ति बुरा काम करते हैं। जो बुरा काम करते हैं, उन्हें तो जीवन के लक्ष्य का पता ही नहीं है, परंतु जो भलाई का काम करते हैं, वे भी जीवन के लक्ष्य से अनजान होते हैं। इसलिए वे परलोक सुधारने के लिए परोपकार, दान और पुण्य जैसे सुकर्म में लग जाते हैं और इन सुकर्मों के प्रति उन्हें मोह हो जाता है। यह मोह उस समय पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है, जब व्यक्ति को कीर्ति का मोह घेर लेता है, परंतु ऐसे व्यक्ति को जीवन के किसी भी पड़ाव में जब यह एहसास होता है कि मानव जीवन का लक्ष्य तो स्वयं को जानना है, तब उसका मार्गदर्शन करने वाले ग्रंथ-गुरु सबसे पहले उसे षड्रिपुओं से ही मुक्ति दिलाने का महायज्ञ प्रारंभ करते हैं। धर्मग्रंथों और सद्गुरुओं की विविध वाणियों के अनुसार आत्म-ज्ञान का पथिक इन षड्रिपुओं से मुक्ति के लिए साधना में लग जाता है। साधना के जरिए धीरे-धीरे व्यक्ति छह में से पाँच शत्रुओं पर तो विजय प्राप्त करता जाता है, परंतु मोह (जिसकी अनेक शाखाएँ हैं) एक ऐसा शत्रु है, जिस पर विजय पाना साधक के लिए अत्यंत दुष्कर हो जाता है।

कीर्ति के मोह पर विजय से ही होता है आत्म-ज्ञान का मार्ग प्रशस्त

साधक यदि भारी प्रयत्नों से मोह की अनेक शाखाओं को काट भी देता है, तो भी उसे दान-पुण और कीर्ति जैसी मोह रूपी शाखाएँ काटने में वर्षों लग जाते हैं। जो ज्ञान मार्ग के पथिक नहीं हैं, उनके लिए यह बात नहीं है। यह बात तो उनके लिए है, जो ज्ञान मार्ग के पथिक हैं। ऐसे लोगों के लिए इन षड्रिपुओं से मुक्ति पाना ही मोक्ष की दशा को प्राप्त करने का प्रथम पग है। आत्म-ज्ञान का पथिक यह अच्छी तरह जान-समझ चुका होता है कि किसी भी क्रिया के जरिए ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है, वह दान-पुण्य-कीर्ति जैसी क्रियाओं से धीरे-धीरे मुक्त होने का प्रयास करता है, परंतु ग्रंथ-गुरुओं के करारे प्रहारों के बावजूद मोह की पराकाष्ठा स्वरूप कीर्ति से मुक्ति पाने में आत्म-ज्ञान के पथिक को भारी कठिनाई होती है। यहाँ कहने का आशय यही है कि षड्रिपुओं की इस श्रृंखला को तोड़ने में जुटे प्रत्येक पथिक को मोह की पराकाष्ठा रूपी कीर्ति की शाखा को भी अंततः काट देना चाहिए, तभी उसके लिए ही आत्म-ज्ञान का मार्ग प्रशस्त होगा। यह पथिक की बहुत बड़ी विजय होगी। यद्यपि अभी भी ईश्वर से एकाकार होने के लिए और भी कई महत्वपूर्ण और कठिन पड़ावों से गुजरना शेष होता है, परंतु मोह रूपी सभी शाखाओं को जड़ से काट देने से आगे के महत्वपूर्ण और कठिन पड़ावों को पार करने में बहुत ही सहायता मिलती है।
(गुरु अर्पण)

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