क्या कहती है ‘तूफान’ से पहले की यह ‘अशांति’ ?

* क्या नरेन्द्र मोदी हमेशा की तरह कुछ ‘लार्जर दैन लाइफ’ करने की सोच रहे हैं ?

* क्या 23 मई के बाद NDA के कुछ घटक दल कर सकते हैं पाला बदलने की कोशिश ?

* क्या विपक्ष की सक्रियता और ईवीएम पर हल्लाबोल के पीछे बढ़ा हुआ हौसला या हार की बौखलाहट ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 22 मई, 2019। देश की राजनीति में 6 मार्च को लोकसभा चुनाव 2019 की घोषणा होने के साथ ही मचा राजनीतिक घमासान सात चरणों के चुनाव सम्पन्न होने के बाद भी शांत होने की बजाए तेज हो गया है। चुनावी मैदान में एक-दूसरे के विरुद्ध आरोप-प्रत्यारोप की बौछार लगाने वाले राजनीतिक दल चुनाव सम्पन्न होने के बाद भी शांत नहीं है और यह अशांति 19 मई को अंतिम चरण का मतदान सम्पन्न होते ही आए EXIT POLL 2019 के बाद पैदा हुई है।

एग्ज़िट पोल आने के बाद जहाँ एक तरफ सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-BJP)
नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) जीत के प्रति आश्वस्त हो गया है, वहीं NON BJP-NDA और मोदी विरोधी एजेंडा लेकर राजनीतिक दलों में खलबली मची हुई है। यद्यिप दोनों पक्षों में कल 23 मई को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) से बाहर आने वाले परिणामों में उठने वाले तूफान से पहले की ‘अशांति’ है। इस अशांति में एक बड़ा फर्क़ यह है कि एक तरफ जहाँ सत्तारूढ़ भाजपा-एनडीए गठबंधन में यह आंतरिक अशांति है, तो सत्ता विरोधी दलों में बाह्य अशांति है।

भाजपा में जश्न के अभाव के पीछे मोदी की ‘लार्जर देन लाइफ’ करने की सोच ?

26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार ने नोटबंदी, जीएसटी से लेकर उरी आतंकवादी हमले के बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक तक के तमाम कदमों के बावजूद कांग्रेस और अन्य विरोधियों के निशाने पर रही। इसके बाद नोटबंदी-जीएसटी, बेरोजगारी और राफेल डील में भ्रष्टाचार के मुद्दों ने तो मोदी सरकार को चहुँओर से घेर लिया। पुलवामा आतंकी हमला, एयर स्ट्राइक और अभिनंदन वर्तमान की वापसी के पूरे घटनाक्रम से पहले यानी 14 फरवरी, 2019 से पहले तक आए सभी चुनावी सर्वेक्षणों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा था। हर सर्वेक्षण के आँकड़े मोदी को छह महीने पहले के आँकड़ों से नीचे ही आँक रहे थे, परंतु 14 फरवरी के बाद घटे घटनाक्रम ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को फिर एक बार लोकप्रियता की चोटी पर बैठा दिया। इस घटनाक्रम के बाद हुए सभी मतदान पूर्व (ओपिनियन पोल) और मतदान पश्चात (एग्ज़िट पोल) सर्वेक्षणों में मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ चढ़ा और इतना चढ़ा कि एनडीए को 287 से 365 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। इतने अच्छे सर्वेक्षण निष्कर्षों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तमाम भाजपा-एनडीए नेताओं की आवाज़ में जोश और जश्न का अभाव राजनीतिक विश्लेषकों के मन में संदेह पैदा कर रहा है कि कहीं भाजपा को 23 मई को आने वाले परिणामों में बहुमत से दूर रह जाने की आशंका तो नहीं है ? दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी को 2001 से जानने-पढ़ने वाले राजनीतिक विश्लेषक भाजपा में व्याप्त ‘शांति’ को तूफान से पहले की शांति मान रहे हैं, क्योंकि मोदी ने अपने पूरे राजनीतिक कैरियर में कई बार लार्जर दैन लाइफ काम किया है। शांत मोदी निश्चित रूप से जीत के बाद कुछ ऐसा भव्य, दिव्य और पूरी दुनिया को चौंका देने वाला काम करने वाले हैं, जैसा कि उन्होंने 2014 के शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेश-SARC) के पाकिस्तान सहित सभी राष्ट्राध्यक्षों को बुला कर किया था। संभव है कि मोदी इस बार केवल शपथ ग्रहण तक नहीं, बल्कि इसके आगे भी बहुत कुछ बड़ा करने की सोच रहे होंगे।

NDA में ‘अशांति’ अवसरवादिता ?

एग्ज़िट पोल में एनडीए को भारी बहुमत मिलने की संभावनाएँ दिखाई गई हैं। इसके बावजूद एनडीए के कुछ घटक दलों के सुरों में अविचलन दिखाई दे रहा है। एग्ज़िट पोल के सकारात्मक निष्कर्षों के बाद जहाँ नरेन्द्र मोदी-अमित शाह ने एनडीए की भोज बैठक बुलाई, वहीं इस बैठक में शामिल होने को लेकर शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और जेडीयू प्रमुख नीतिश कुमार के असमंजस ने विरोधियों का उत्साह और राजनीतिक विश्लेषकों के मन में सवाल पैदा किए हैं। शिवसेना के मुखपत्र सामना में तो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की चुनावी मेहनत की तारीफ की गई। एनडीए के कुछ घटक दलों की इस बेचैनी से सवाल यह उठता है कि क्या इन घटक दलों को यह आशंका है कि भाजपा तो दूर, एनडीए को भी बहुमत नहीं मिलेगा ? शिवसेना के पास तो भाजपा का साथ छोड़ कर किसी और दल या गठबंधन के साथ जाने का कोई विकल्प नहीं है, परंतु परिणाम से नीतिश की बेचैनी, भाजपा के मूल एजेंडा धारा 370, 35ए हटाने, राम मंदिर, समान नागरिक संहिता (CCC) लागू करने जैसे कई मुद्दों पर पूर्व घोषित असहमित जताना मोदी विरोधियों का उत्साह बढ़ा रहा है, वहीं राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि नीतिश किसी भी समय पाला बदल सकते हैं।

विपक्ष की सक्रियता के पीछे हौसला या बौखलाहट ?

एग्ज़िट पोल के बाद कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों की सक्रियता बढ़ गई है। जैसे ही एग्ज़िट पोल आए हैदराबाद में बैठे तेलुगू देशम् पार्टी (तेदेपा-TDP) और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, कांग्रेस नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद सहित 22 विपक्षी दलों का दिल्ली में हल्लाबोल, चुनाव आयोग (EC) से लेकर सुप्रीम कोर्ट (SC) तक ईवीएम के खिलाफ मोर्चाबंदी, चुनाव के बाद संभावित गठबंधन की कवायद और सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा-BSP) चीफ मायावती और समाजवादी पार्टी (सपा-SP) प्रमुख अखिलेश यादव की एक-दूसरे को बधाई जैसे घटनाक्रम एग्ज़िट पोल को लेकर देश की जनता और भाजपा-एनडीए के कुछ घटक दलों, नेताओं में संदेह पैदा कर रहे हैं। इस घटनाक्रम के पीछे जहाँ कुछ राजनीतिक विश्लेषक मोदी विरोधी नेताओं की 23 मई को एग्ज़िट पोल के ग़लत सिद्ध होने की उम्मीद और उससे बढ़ा हौसला बताया जा रहा है, वहीं ईवीएम को लेकर मोदी विरोधी नेताओं की हाय-तौबा को संभावित हार को लेकर बौखलाहट माना जा रहा है।

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