PM तो कोई न कोई बन ही जाएगा, परंतु 5 साल से खाली पड़ी इस कुर्सी पर कोई बैठेगा या फिर खाली ही रहेगी ?

विपक्ष के नेता पद का रोचक इतिहास : राम सुभग सिंह से आरंभ, अटल-आडवाणी-राजीव ने संभाला मोर्चा, 2019 देगा सुषमा का उत्तराधिकारी ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

लोकसभा चुनाव 2019 अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। कुल 7 में से 6 चरणों का मतदान हो गया है और अंतिम व 7वें चरण का मतदान 19 मई को होना है, जिसमें 8 राज्यों की 59 सीटों के लिए वोट डाले जाएँगे। इसका अर्थ यह हुआ कि देश में नई सरकार किसकी बनेगी, यह लगभग तय हो गया है। निवर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही प्रधानमंत्री रहेंगे या प्रधानमंत्री के रूप में देश को कोई नया चेहरा देखने को मिलेगा, यह तो 23 मई को ही पता चलेगा। चुनावों की घोषणा से पहले और बाद से अगला प्रधानमंत्री कौन पर चर्चा हो रही है, परंतु एक पद ऐसा भी है, जो लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है। उस पद को लेकर कोई चर्चा नहीं हो रही है, जो पिछले पाँच वर्षों से रिक्त पड़ा है।

भारतीय संविधान के मुताबिक प्रधानमंत्री का पद कभी रिक्त नहीं रह सकता। यही कारण है कि जब एक तरफ इंदिरा गांधी का शव अंतिम संस्कार के लिए रखा हुआ था और दूसरी तरफ पुत्र राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई जा रही थी, क्योंकि प्रधानमंत्री का पद रिक्त नहीं रखा जा सकता, परंतु हमारे लोकतंत्र में जितना महत्व प्रधानमंत्री पद का है, उतना न सही, पर उससे कम भी नहीं, ऐसा विपक्ष के नेता के पद का महत्व भी है। 543 सदस्यीय लोकसभा में 272 से अधिक सीटें हासिल करने वाले राजनीतिक दल या गठबंधन का नेता तो प्रधानमंत्री होता है, परंतु विपक्ष के नेता का पद उसे ही मिलता है, जिस पार्टी को लोकसभा के कुल सदस्य संख्या 543 की 10 प्रतिशत यानी लगभग 54 सीटें मिली हों। दुर्भाग्य से जब-जब विपक्षी खेमे का कोई एक दल 54 सीटें हासिल नहीं कर सका, तब-तब यह पद रिक्त रहा है।

वर्तमान यानी 16वीं लोकसभा में भी स्थिति यही रही, क्योंकि 2014 में मोदी लहर पर सवार भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 282 और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंघन (राजग-NDA) के साथ मिल कर कुल 336 के साथ अकेले दम पर भारी बहुमत हासिल कर लिया और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए, परंतु विपक्षी खेमे में कांग्रेस सहित कोई भी राजनीतिक दल विपक्ष का नेता बनने के लिए अनिवार्य 54 सीटों के आँकड़े को छू न सका। इस तरह वर्तमान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने विपक्ष के नेता का जो पद पाँच वर्ष पहले छोड़ा था, वह अभी भी रिक्त पड़ा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि देश की जनता 23 मई को बहुमत किसी भी दल को दे, परंतु क्या विपक्षी खेमे के किसी एक राजनीतिक दल को 54 सीटें देगी, जिससे सुषमा का छोड़ा गया पाँच वर्षों से खाली पड़ा विपक्ष के नेता का पद भर सके ?

ऐसी रेस, जो किसी की प्राथमिकता नहीं !

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके विरोधियों की तसवीर। (फाइल चित्र)

देश में लोकसभा चुनाव लड़ने वाले प्रमुख राजनीतिक दलों के सभी नेताओं की मंशा तो प्रधानमंत्री बनने की है और यह स्वाभाविक भी है, परंतु विपक्ष के नेता की खाली पड़ी कुर्सी की रेस ऐसी होती है, जो किसी भी नेता की पहली प्राथमिकता नहीं होती। हाँ, यदि प्रधानमंत्री न बन सके, तो अवश्य हर नेता यह चाहेगा कि वह कम से कम विपक्ष का नेता तो बन ही जाए। लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा नीत एनडीए ने तो 336 सीटें हासिल कीं, परंतु तत्कालीन सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग-UPA) को कुल 59 सीटें ही मिलीं और यूपीए की संस्थापक कांग्रेस केवल 44 सीटों पर सिमट गई, जिसके चलते 16वीं यानी वर्तमान लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद पाँच वर्षों तक रिक्त रहा। 15वीं लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज थीं, जो इस पद पर 19 मई, 2014 तक थीं। 20 मई, 2014 से लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद रिक्त पड़ा है।

मोदी बनेंगे विपक्ष के नेता ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। (फाइल चित्र)

23 मई को चुनाव परिणाम आने से पहले चुनाव पूर्व हुए तमाम सर्वेक्षणों का एक निष्कर्ष तो स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आ रहा है कि भाजपा-एनडीए सबसे बड़े दल-गठबंधन के रूप में उभरेंगे और अधिकतर सर्वेक्षणों का दावा है कि केन्द्र में पुनः भाजपा-एनडीए सरकार बनेगी और नरेन्द्र मोदी ही दोबारा प्रधानमंत्री बनेंगे। मान लीजिए सारे सर्वेक्षणों को ठुकरा भी दिया जाए, भाजपा-एनडीए बहुमत हासिल न कर सके और विपक्षी खेमा गठबंधन कर सरकार बना ले, तो क्या नरेन्द्र मोदी सुषमा स्वराज की ओर से छोड़ी गई विपक्ष के नेता की कुर्सी पर बैठेंगे ? यह सवाल भविष्य के गर्भ है, क्योंकि मोदी के बारे में यह कहना संभव नहीं है कि वे अगर प्रधानमंत्री न बन पाए, तो विपक्ष के नेता बनेंगे। मोदी पहले ही कह चुके हैं कि वे फ़कीरी मौज में जीने वाले व्यक्ति हैं। ऐसे में कई संभवनाएँ बनती है कि मोदी विपक्ष के नेता बनने की नौबत आने पर इस पद पर न बैठें, मोदी संगठन में चले जाएँ या फिर राजनीति भी छोड़ दें। एक स्थिति यह भी बन सकती है कि मोदी संगठन में जाने के साथ ही लोकसभा में विपक्ष का नेता पद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को सौंप दें। दूसरी तरफ सारे सर्वेक्षण सही साबित हों और भाजपा के दावों के अनुसार एनडीए को 2014 से भी अधिक सीटें मिल जाएँ, तो क्या विपक्षी खेमे में कांग्रेस सहित कोई भी दल विपक्ष के नेता पद को पाने के लिए आवश्यक 54 सीटें हासिल कर पाएगा ? यदि कर पाएगा तो कौन ?

तो राहुल ही विकल्प, पर बन पाएँगे नेता ?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी। (फाइल चित्र)

यदि जनादेश मोदी के पक्ष में गया, तो विपक्ष के नेता पद की इस रेस में एकमात्र कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही रह जाएँगे, क्योंकि भाजपा के बाद एकमात्र कांग्रेस पार्टी ही ऐसी है, जो 420 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। भाजपा 432 सीटों पर चुनाव मैदान में है। भाजपा-कांग्रेस के अलावा देश की लगभग कोई भी मुख्य राजनीतिक पार्टी पूरी 50 सीटों पर भी चुनाव नहीं लड़ रही है। ऐसे में कांग्रेस के अलावा किसी भी राजनीतिक दल के विपक्ष के नेता पद के लिए अनिवार्य 54 सीटों का जीतना संभव ही नहीं है। यह बात तो तय है कि भाजपा-एनडीए पुनः बहुमत हासिल करे, तो विपक्ष के नेता पद के उम्मीदवार के विकल्प के रूप में एकमात्र राहुल ही रहेंगे, परंतु सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस पार्टी इस बार 2014 से अधिक सीटें हासिल कर सुषमा स्वराज की छोड़ी और पाँच वर्षों से खाली विपक्ष के नेता की कुर्सी को प्राप्त कर सकेगी ? वैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार दावा कर रहे हैं कि कांग्रेस इस बार 2014 से भी कम सीटों पर सिमट जाएगी। यदि मोदी का दावा सही साबित हुआ, तो संभव है कि देश को और लोकसभा को अगले पाँच वर्ष भी बिना विपक्ष के नेता के ही काम चलाना पड़ेगा।

आरंभ ही अभाव से, आरंभ का कारण भी कांग्रेस ही बनी

लोकसभा में प्रथम विपक्ष के नेता राम सुभग सिंह। (फाइल तसवीर)

आइए अब थोड़ा इतिहास पर नज़र डालते हैं। वैसे स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र में और लोकसभा में विपक्ष के नेता को बहुत ही महत्व दिया गया है। विपक्ष का नेता सत्तारूढ़ सरकार की जन विरोधी नीतियों के विरुद्ध जनता की आवाज़ बन कर काम करता है, परंतु भारतीय लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य ही रहा कि पहली ही लोकसभा में विपक्ष का कोई नेता नहीं था। देश में पहली लोकसभा के लिए और पहला लोकसभा चुनाव 1952 में हुआ, जिसमें कांग्रेस को भारी बहुमत मिला और विपक्षी खेमे के किसी दल को विपक्ष के नेता पद के आवश्यक सीटें नहीं मिलीं। लोकसभा का आरंभ ही विपक्ष के नेता के अभाव से हुआ। यह पद 1957, 1962 और 1967 के लोकसभा चुनावों से भी नहीं भरा। यद्यपि 1967 के चुनाव के 2 साल बाद ही राम सुभग सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर संगठन कांग्रेस (कांग्रेस-ओ) बनाई और उनके साथ आए सांसदों की संख्या विपक्ष के नेता पद की शर्त पूरी करती थी। लिहाजा 17 दिसम्बर, 1969 को राम सुभग सिंह स्वतः देश के और लोकसभा के प्रथम विपक्ष के नेता बने। इस प्रकार लोकसभा में प्रथम विपक्ष के नेता पद के आरंभ का कारण कांग्रेस व उसमें पड़ी फूट ही बनी।

कितनी बार रिक्त रहा विपक्ष के नेता का पद ?

लोकसभा के सत्र की फाइल तसवीर।

26 जनवरी, 1952 से 3 मार्च, 1967 तक लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद रिक्त रहा। उसके बाद राम सुभग सिंह तो कांग्रेस की आंतरिक फूट के चलते प्रथम विपक्षी नेता बने, परंतु 27 दिसम्बर, 1970 से 30 जून, 1977 तक फिर यह पद रिक्त रहा। 22 अगस्त, 1979 से 23 दिसम्बर, 1990 यानी 11 वर्षों तक भी लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद पर कोई आसीन नहीं था, परंतु फिर देश के राजनीतिक हालात बदले और कांग्रेस कमज़ोर पड़ती गई तथा विरोधी दल इतने मजबूत होते गए कि कम से कम विपक्ष के नेता का पद तो हासिल कर ही सकें। इसी कारण 18 दिसम्बर, 1989 से 19 मई, 2014 तक लोकसभा को विपक्ष का नेता मिलता रहा, जो सिलसिला 2014 में आकर फिर एक बार थम गया।

कौन-कौन महानुभाव ?

सोनिया गांधी, राजीव गांधी, लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी। (फाइल तसवीर)

लोकसभा में सत्ता पक्ष का नेता जिस तरह देश का प्रधानमंत्री होता है, उसी तरह विपक्ष के नेता को देश के विपक्षी नेता के रूप में महत्व दिया जाता है। लोकसभा में विपक्ष के नेता के इस महत्वपूर्ण पद पर पहली बार राम सुभग सिंह आसीन हुए, तो उनके बाद कांग्रेस के यशवंतराव चवाण, सी. एम. स्टिफन, जनता पार्टी के जगजीवन राम, कांग्रेस के राजीव गांधी, भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, कांग्रेस के पी. वी. नरसिम्हा राव, कांग्रेस के शरद पवार, सोनिया गांधी और अंत में भाजपा की सुषमा स्वराज विपक्ष के नेता बने।

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