‘द्वेष पीड़ित’ गोडसे और ‘देश पीड़क’ आतंकी में कोई फर्क नहीं मानते कमल हासन ?

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 17 मई, 2019। भारतीय फिल्मों के सुपर स्टार और तमिलनाडु की राजनीति में राजनीतिक दल बना कर प्रवेश करने वाले कमल हासन अपने एक विवादास्पद वक्तव्य के कारण इन दिनों देश की राजनीति की चर्चा के केन्द्र में आ गए हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में कूदने का साहस नहीं कर पाने वाले कमल हासन ने 2018 में ही अपना राजनीतिक दल मक्काल नीधि मलम (MNM) नामक राजनीतिक दल बनाया है। मक्काल नीधि मलम का अर्थ होता है पीपल्स सेंटर फॉर जस्टिस यानी न्याय के लिए जनता का केन्द्र।

कमल हासन और एमएनएम का लक्ष्य तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2021 है। हासन लोकसभा आकर राष्ट्रीय राजनीति नहीं करना चाहते। वे विधानसभा चुनाव लड़ कर राज्य की राजनीति में जयललिता और करुणानिधि के निधन के बाद आई शून्यता का फायदा उठाना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने अपनी पार्टी एमएनएम की चुनावी यात्रा लोकसभा चुनाव 2019 के साथ हो रहे 18 विधानसभा सीटों के उप चुनावों में अपने उम्मीदवार उतार कर शुरू की हैं।

अभिनेता से नेता बनते ही दर्शकों को बाँट दिया ?

उप चुनावों के रास्ते विधानसभा में प्रवेश करने को आतुर एमएनएम और उसके अध्यक्ष कमल हासन अभिनेता से नेता बनते ही राजनीति के रंग में रंग गए। वे भूल गए कि पिछले 39 वर्षों के फिल्मी कैरियर में दर्शकों के जिस समूह ने उन्हें सुपर स्टार बना कर आसमान पर बैठाया, वह किसी धर्म-जाति विशेष से जुड़ा हुआ नहीं था। दर्शकों का वह समूह केवल समूह था और उसमें शामिल करोड़ों हिन्दू, लाखों मुसलमान केवल कमल को देखने के लिए सिनेमा हॉल जाते थे। करोड़ों फैन्स को देख कर कमल हासन एक अभिनेता के रूप में बहुत खुश होते रहे होंगे। तब उन्हें इन फैन्स में किसी का धर्म-जाति नहीं पता होगा, परंतु अभिनेता से नेता बनते ही कमल ने अपने करोड़ों ‘निःधर्मी’ फैन्स को झटका दिया और मुस्लिम तुष्टीकरण की वही गंदी राजनीति अपनाई, जो हमारे देश में वर्षों से अनेक राजनीतिक दलों का हथियार बनी हुई है।

गोडसे को गाली से वोट तो मिलेंगे, पर गांधी नहीं हो सकते खुश

महात्मा गांधी भारत की धरती पर हुए अनेक अवतारी पुरुषों में से एक थे। 700 करोड़ लोगों की इस दुनिया में कोई एक व्यक्ति ऐसा नहीं मिलेगा, जो अपने आपमें पूर्ण हो। आलोचनाएँ तो ईसा मसीह, हज़रत मोहम्मद पैगंबर, राम, कृष्ण, बुद्ध तक की हुई थीं, परंतु किसी ने आलोचक को पलट कर जवाब नहीं दिया, क्योंकि गालियाँ देने वाले व्यक्तिगत द्वेष से पीड़िते थे, जबकि महापुरुष तो अपने आपमें सामूहिक विचारधारा का प्रतिबिंब होते हैं। यही कारण है कि महात्मा गांधी का भी उनके जीवन काल में अनेक आलोचकों से सामना हुआ, परंतु गांधीजी ने कभी किसी को अपशब्द नहीं कहे। यदि नाथूराम गोडसे के गोली मारे जाने के बावजूद गांधीजी बच जाते, तो निश्चित रूप से वे गोडसे को माफ कर देते। ऐसे में कमल हासन नाथूराम गोडसे को स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी बता कर कुछ मुस्लिम मत जरूर हासिल कर लेंगे, परंतु हासन के इस बयान से गांधीजी की आत्मा को ठेस ही पहुँची होगी।

द्वेष और द्रोह में फर्क न समझने वाला अविवेकी नहीं ?

अनेक अवॉर्ड जीतने वाले मंझे हुए अभिनेता होने के बावजूद क्या कमल हासन द्वेष और द्रोह के बीच अंतर नहीं समझ सकते ? नाथूराम गोडसे को महात्मा गांधी की विचारधारा से आपत्ति थी। गोडसे तो मूर्ख और विद्वेष से पीड़ित था। इसीलिए उसके पास यह विवेक नहीं था कि गांधी की हत्या से विचारधारा नहीं मरने वाली। इसीलिए व्यक्तिगत द्वेष से पीड़ित गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। उसे भला आतंकवादी कैसे कहा जा सकता है। गोडसे ने कोई वाद अपना कर यह करतूत नहीं की थी। दूसरी तरफ आतंकवादी एक निश्चित विचारधारा, निश्चित सोच, निश्चित देश, निश्चित और कुंठित-संकीर्ण धर्म के नाम पर एक देश विशेष, एक धर्म विशेष के लोगों को निशाना बनाते हैं। आतंकवादियों की सोच में मानवता के लिए कोई जगह नहीं होती, परंतु व्यक्तिगत द्वेष से पीड़ित अपने विवेक के आधार पर सभी विकल्पों को सोचने के बाद अंतिम विकल्प के रूप में ही किसी की हत्या करता है। कमल हासन यदि गोडसे और कसाब के बीच के विचारधारा के इस फर्क को समझ जाएँगे, तो उन्हें अच्छी तरह पता चल जाएगा कि गोडसे हत्यारा तो था, परंतु आतंकवादी नहीं था, क्योंकि आतंकवादी देशद्रोही होता है, जबकि गोडसे की देशभक्ति पर किसी को कोई संदेह नहीं हो सकता।

Leave a Reply

You may have missed