निर्लज्जता की पराकाष्ठा : बार-बार याचना लेकर पहुँच रही EVM विरोधी टोली को SC की कड़ी फटकार, ‘यह बकवास है’ !

* विजय पर जश्न और पराजय पर प्रश्न से ‘एकजुट विपक्षी मातम’ का पर्याय बन गई EVM !

* बात निकालनी है, तो अटलजी की हार और मनमोहन की ताजपोशी से लेकर 13 राज्यों के मुख्यमंत्रियों तलक ले जाई जाए

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 21 मई, 2019। देश में पिछले लगभग 15 वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर चल रहा विवाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-BJP) को मिलने वाली हर जीत के साथ बढ़ता गया और इस समय जबकि लोकसभा चुनाव 2019 के परिणामों के बीच चंद घण्टे ही शेष रह गए हैं, तब हार भाँप चुके राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने इस विवाद को पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया है। ऐसा नहीं है कि इन 15 वर्षों में देश में हुए लोकसभा के 3 और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में केवल भाजपा को ही जीत मिली। इस डेढ़ दशक में एक बार जहाँ लोकप्रिय वाजपेयी सरकार को जाना पड़ा, वहीं मनमोहन सिंह की दो-दो बार ताजपोशी हुई। इतना ही नहीं, कई राज्य विधानसभा चुनावों में भी भाजपा को करारी शिकस्त मिली और कांग्रेस सहित कई अभाजपाई दलों और क्षेत्रीय दलों ने सत्ता की कुर्सी हासिल की, परंतु कई पराजयों के बाद भी भाजपा ईवीएम पर कभी मुखर नज़र नहीं आई, तो दूसरी तरफ केन्द्र की राजनीति में नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बढ़ते प्रभाव के बाद भाजपा विरोधी दलों ने हार का ठीकरा फोड़ने के लिए ईवीएम को ही चुना और इस बार भी जब सारे एग्ज़िट पोल 2019 में भाजपा-एनडीए को स्पष्ट बहुमत दिखाया जा रहा है, तब NON-BJP-NDA दलों और नेताओं ने ईवीएम को लेकर परिणाम से पहले ही ऐसी हायतौबा मचा रखी है कि ईवीएम का फुलफॉर्म इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की बजाए एकजुट विपक्षी मातम बन गया है।

EXIT POLL और ईवीएम का क्या लेना-देना ?

लोकसभा चुनाव 2019 में ईवीएम से मतदान रुकवाने के लिए इस एकजुट विपक्षी मातमी टोली ने ईसी से लेकर एससी तक ज़ोर लगा दिया, परंतु इनकी एक न चली और पूरे देश में सात चरणों में ईवीएम से ही मतदान हुआ। अभी जबकि मतदान गत 19 मई को ही सम्पन्न हुआ है और परिणाम भी नहीं आए हैं, तब ईवीएम पर हो-हल्ला क्यों मचाया जा रहा है ? ओपिनियन पोल और एग्ज़िट पोल तो लोगों की राय सुन कर तैयार किए जाते हैं। इनका तो ईवीएम से कोई लेना-देना ही नहीं है। ऐसे में ईवीएम के विरुद्ध अभियान चला रही टोली अचानक एग्ज़िट पोल के बाद बेचैन क्यों हो गई ? एग्ज़िट पोल तो ग़लत भी सिद्ध हो सकते हैं, जैसा की 2004 में और उससे पहले और बाद में कई मामलों में हुआ भी है। फिर एग्ज़िट पोल में दिख रही मोदी सुनामी से विपक्ष घबराया और बौखलाया हुआ क्यों है ? इसका तो सीधा अर्थ यही निकलता है कि हर हार की तरह इस बार भी यदि हार हुई, तो ईवीएम विरोधी टोली हार का ठीकरा अपने नाकारेपन की बजाए ईवीएम पर ही फोड़ने वाली है।

सुप्रीम कोर्ट ने फिर ली ख़बर, आए ठिकाने अकल ?

इस बीच ईवीएम का रोना रोने वाली यह विपक्षी एकजुटता मातमी टोली ने आज फिर एक बार सुप्रीम कोर्ट का खटखटाया और बार-बार एक ही मुद्दे पर सुनवाई से खिन्न सुप्रीम कोर्ट ने इस टोली की अच्छी तरह ख़बर ले ली। सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम विरोधी टोली के दर्द को और चुनाव आयोग की दलीलों को समझते हुए पिछले आदेश में स्पष्ट कहा था कि वीवीपैट का ईवीएम से 5 प्रतिशत मिलान करने का आदेश दिया था, परंतु ईवीएम विरोधी टोली इससे संतुष्ट नहीं हुई। उसने फिर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम एक ही मामले को बार-बार क्यों सुनें ? एग्ज़िट पोल आने के बाद व्याकुल हुई ईवीएम विरोधी टोली आज फिर सुप्रीम कोर्ट पहुँची और वीवीपैट का ईवीएम से 100 प्रतिशत मिलान की मांग कर डाली। सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को बकवास करार दिया। ईवीएम से वीवीपैट के 100 प्रतिशत मिलान की अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को ज़ोरदार फटकार लगाई और कहा कि ऐसी अर्जियों को बार-बार नहीं सुना जा सकता। न्यायमूर्ति अरूण मिश्र की अगुवाई वाली अवकाश पीठ ने प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली अदालत की वृहद पीठ इस मामले में सुनवाई कर आदेश पारित कर चुकी है।  न्यायमूर्ति मिश्र ने कहा, ‘हम प्रधान न्यायाधीश के आदेश की अवहेलना नहीं कर सकते हैं….. यह बकवास है। यह याचिका खारिज की जाती है। आपको बता दें कि चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हर याचिका-हर बार सुनवाई के दौरान दावे के साथ कहता आया है कि ईवीएम से छेड़छाड़ संभव नहीं है और सुप्रीम कोर्ट भी ईसी की इस बात से सहमत है। इसके बावजूद ईवीएम विरोधी टोली बार-बार ईसी और एससी के चक्कर काट रही है। हार की बौखलाहट ने ईवीएम विरोधी टोली और उसके नेताओं को निर्लज्जता यानी बेशर्मी की पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया है।

मातमियों के ‘सरदार’ को क्यों रास नहीं आ रही पिता की पहल ?

भाजपा-एनडीए और मोदी विरोधी राजनीतिक दलों का तो प्रत्येक राज्य में अपना विशेष महत्व है और इन क्षेत्रीय दलों के नेता स्वयं को क्षेत्रीय क्षत्रप मानते हैं। यद्यपि केन्द्र की राजनीति में यानी दिल्ली आकर उन्हें कांग्रेस का सहारा लेना पड़ता है। इसीलिए दिल्ली में ईवीएम में गड़बड़ी की आशंका, ईवीएम पर संदेह व्यक्त करने से लेकर हर तरह से ईवीएम को कटघरे में खड़ा करके मातम मनाने वालों की टोलियों का नेतृत्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कर रहे हैं। चुनाव आयोग (EC) से लेकर सुप्रीम कोर्ट (SC) तक हर जगह यह राजनीतिक ईवीएम यानी एकजुट विपक्षी मातम मनाने वाली टोली ने गुहार लगाई, परंतु सवाल यह उठता है कि क्या राहुल गांधी को अपने पिता के आविष्कार पर संदेह है। क्या राहुल नहीं जानते कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर देश में ईवीएम से चुनाव कराने संबंधी कानून राजीव गांधी सरकार ने पारित कराया था ? यदि राजीव को ईवीएम में कोई कमी नज़र आती, तो वे इस अत्याधुनिक ई-लोकतंत्र की पद्धति को अपनाते ही क्यों ?

ईवीएम का पहली बार देशव्यापी उपयोग और वाजपेयी सरकार का पतन

देश में वैसे तो नवम्बर-1998 के बाद हुए अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनावों में ईवीएम का उपयोग शुरू कर दिया गया था, परंतु चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव 2004 में पहली बार पूरे देश में ईवीएम से मतदान कराया। इस चुनाव में ईसी ने देश के सभी मतदान केन्द्रों पर 10.75 लाख ईवीएम का उपयोग कर देश को ई-लोकतंत्र में परिवर्तित कर दिया, परंतु 2004 के चुनाव की पहली विशेषता यह थी कि इसमें पहली बार ईवीएम का देशव्यापी उपयोग किया गया, तो दूसरी विशेषता यह थी कि तत्कालीन छह वर्षीय लोकप्रिय वाजपेयी सरकार का पतन हो गया।

भाजपा-एनडीए को सबसे बड़ा झटका, पर किसी ने नहीं उठाया सवाल

लोकसभा चुनाव 2004 में जब पहली बार देशव्यापी ईवीएम का उपयोग हुआ, तब देश की जनता ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा नीत एनडीए सरकार को सत्ता से हटा दिया। वाजपेयी सरकार को अनपेक्षित शिकस्त मिलने के बावजूद जहाँ एक तरफ भाजपा-एनडीए ने ईवीएम पर कोई सवाल नहीं उठाया और जनादेश का पूरा सम्मान किया, वहीं आज की ‘ईवीएम यानी एकजुट विपक्षी मातमी’ टोली का नेतृत्व कर रही कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर किसी भी नॉन-बीजेपी-एनडीए दल ने बिना मेहनत हाथ आई सत्ता में भागबँटाई करने के लिए खुशी-खुशी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) का गठन कर लिया। सारे भाजपा-एनडीए विरोधी मिल कर खुशी-खुशी सत्ता में भागीदार बने। अटल सरकार के पतन के साथ डॉ. मनमोहन सिंह की ताज़पोशी हुई। यही नहीं, 2004 में जहाँ ईवीएम से हुए मतदान में जनता ने अटलजी जैसे लोकप्रिय चेहरे को सत्ता से बाहर कर दिया और डॉ. मनमोहन सिंह जैसे अनपेक्षित चेहरे को प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर बैठा दिया, वहीं लोकसभा चुनाव 2009 में भी ईवीएम से ही हुए देशव्यापी मतदान में जनता ने भाजपा-एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी के चेहरे को न केवल नकारा, बल्कि 2004 में अनपेक्षित रूप से प्रधानमंत्री के रूप में सामने आए मनमोहन सिंह की स्वीकार्यता को भी स्वीकृति दी और दूसरी बार मनमोहन की ताज़पोशी हुई। तब भी जहाँ एक तरफ भाजपा-एनडीए ने ईवीएम के कटघरे में खड़ा नहीं किया, तो यूपीए के दिलों-दिमाग में ईवीएम में गड़बड़ी का शक की सुई तक नहीं थी।

दो लोकसभा और कई विधानसभा चुनाव जिताने वाली ईवीएम पर सत्ता छिनते ही शक क्यों ?

लोकसभा चुनाव 2004 और 2009 में दो-दो बार सत्ता मिलने और कई राज्यों में भाजपा को हरा कर कांग्रेस सहित नॉन-बीजेपी-एनडीए दलों के नेताओं को जिता कर सत्ता और मुख्यमंत्री पद की कुर्सी तक पहुँचाने वाली ईवीएम लोकसभा चुनाव 2014 में अचानक शक के घेरे में आ गई। ईवीएम ने 2004 और 2009 की तरह ही 2014 में भी जनता का मूड ही लोगों के सामने पेश किया, जिसमें नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की लहर थी। भाजपा-एनडीए विरोधी दलों को लोकसभा चुनाव 2014 से पहले आए सभी मतदान पूर्व (ओपिनियन पोल) और मतदान पश्चात (एग्ज़िट पोल) सर्वेक्षणों में दिखाई जा रही मोदी लहर तक कोई विशेष आपत्ति नहीं थी, परंतु 16 मई, 2014 को जब ईवीएम खुली और भाजपा-एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिला, तो अचानक कई चुनावों में जीत दिलाने वाली ईवीएम को कटघरे में खड़ा कर दिया।

मोदी-शाह के बढ़ते कद-कदम की काट ईवीएम से निकालने की कोशिश

लोकसभा चुनाव 2014 से ही भाजपा-एनडीए-मोदी-शाह विरोधी कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों को ईवीएम खटकने लगी और जब मोदी-शाह की रणनीति के चलते देश के 21 राज्यों तक भाजपा-एनडीए सरकारें फैलने गईं, तो विपक्षी दल ईवीएम पर हमलावर हो गए। राहुल गांधी, चंद्रबाबू नायडू, ममता बैनर्जी, मायावती, के. चंद्रशेखर राव सहित करीब दो दर्जन राजनीतिक दलों ने राजनीतिक और चुनावी लड़ाई के मैदान में भाजपा-एनडीए की काट निकालने की बजाए ईवीएम को हथियार बनाना शुरू किया और 2014 के बाद जितने भी राज्यों में भाजपा-एनडीए को जीत मिली, हर बार एकजुट विपक्षी मातमी टोली ने भाजपा पर आरोपों की झड़ी लगाई कि भाजपा ने ईवीएम में गड़बड़ी कर चुनावों में जीत हासिल की। ऐसा नहीं है कि 2014 से 2019 के बीच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में हर बार जीत भाजपा को ही मिली। 2014 से 2019 के दौरान ईवीएम से हुए मतदान के बावजूद आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू-टीडीपी ने 2014 में, बिहार में नीतिश कुमार के नेतृत्व में जेडीयू-आरजेडी महागठबंधन ने 2015 में, छत्तीसगढ़ में राहुल गांधी की कांग्रेस ने 2018 में, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल-AAP ने 2015, कर्नाटक में राहुल-देवेगौड़ा-कांग्रेस-जेडीएस ने 2018 में, केरल में वामपंथियों ने 2016 में, मध्य प्रदेश में राहुल-कांग्रेस ने 2018 में, मिज़ोरम में कांग्रेस ने 2018 में, ओडिशा में नवीन पटनायक-बीजेडी ने 2014 में, पंजाब में राहुल-अमरिंदर सिंह-कांग्रेस ने 2017 में, पुड्डुचेरी में वामपंथियों ने 2016 में, राजस्थान में कांग्रेस ने 2018 में, तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव-टीआरएस ने 2018 में और पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी-टीएमसी ने चुनावों में जीत दर्ज की। जीत की खुशी में आज के ईवीएम विरोधियों को ईवीएम में खामी नज़र नहीं आई, तो हार का सामना होते ही इनके निशाने पर ईवीएम क्यों आ जाती है ?

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