EXCLUSIVE : मोदी से मिलने के लिए यूँ ही नहीं मिमिया रहा ‘पठान का बच्चा’ !

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 8 जून, 2019। पहले फोन आया, अब एक चिट्ठी आई है। नरेन्द्र मोदी के नाम यह चिट्ठी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने लिखी है। जब से इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से उनके ज़ेहन में मोदी से मिलने की चाहत कई बार सार्वजनिक होती रही है। इमरान ने लोकसभा चुनाव 2019 में दोबारा जीत को अवसर मानते हुए शिष्टाचार के बहाने फोन कर मोदी को बधाई दे दी। इमरान ने सोचा था कि कदाचित मोदी उन्हें शपथ ग्रहण समारोह में ही न्यौता दे देंगे और इस बहाने मोदी से मिलने का अवसर मिल जाएगा, परंतु मोदी ने बिम्सटेक (BIMSTEC) देशों को बुला कर पाकिस्तान और इमरान का पत्ता ही काट दिया।

इमरान खान 18 अगस्त, 2018 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे। तब मोदी ने शिष्टाचार फोन किया था। इस बातचीत के दौरान मोदी ने इमरान को सीधी-सादी भाषा में चेतावनी के साथ शांति पाठ पढ़ाया था। जवाब में इमरान ने खुद को पठान का बच्चा बताते हुए मोदी से वादा किया था कि शांति के लिए वे मोदी के साथ मिल कर काम करेंगे और मुकरेंगे नहीं, परंतु उसके बाद क्या हुआ, यह किसी से छिपा नहीं है। इसीलिए मोदी के मन से न केवल इमरान खान, अपितु पाकिस्तान भी उतर गया और उन्होंने समूचे पाकिस्तान को ही नज़रअंदाज करने तथा समग्र विश्व में अलग-थलग करने की सफल कूटनीति अपनाई।

‘पठान’ शब्द को लज्जित किया ?

इस्लाम-मुस्लिम धर्म में पठान जाति अपनी बहादुरी के लिए विख्यात है। इमरान ने पीएम बनते वक्त मोदी से वादा किया था कि वे पठान के बच्चे हैं और शांति के लिए काम करने के अपने वायदे से मुकरेंगे नहीं, परंतु इमरान तो पक्के मुकरी निकले। पीएम बनने के बाद मोदी से हुई इस पहली बातचीत में किए वायदे को उन्होंने नहीं निभाया। पुलवामा आतंकी हमले के बाद मोदी ने इमरान को खुली चुनौती दी कि वे असली पठान के बच्चे हैं, तो अपने यहाँ पल रहे आतंकियों का ख़ात्मा करें, परंतु पाकिस्तान ने ऐसा कुछ नहीं किया और भारत को एयर स्ट्राइक कर यह काम करना पड़ा। इमरान ने पठान जाति को एक बार नहीं, कई बार लज्जित किया। एक तरफ मोदी इमरान को भाव नहीं दे रहे, दूसरी तरफ इमरान की चाहत मोदी से मिलने की है।

क्यों बकरी की तरह मिमिया रहा ‘पठान का बच्चा’ ?

मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था, परंतु उसके बाद भारत को पठानकोट और उरी आतंकवादी हमलों का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही मोदी ने पाकिस्तान के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियान छेड़ दिया। मोदी ने सोचा कि इमरान के पीएम बनने के बाद हालात बदलेंगे, परंतु मोदी के इमरान को शिष्टाचार फोन करने के बाद भारत को पुलवामा आतंकी हमला झेलना पड़ा। एक तरफ मोदी ने पाकिस्तान और इमरान को नज़रअंदाज़ करने की नीति अपनाई, तो दूसरी तरफ इमरान खान लगातार मोदी से मिलने के लिए मरे जा रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा और भारत के मतभेदों को सुलझाने के लिए वार्ता की इच्छा व्यक्त की। प्रश्न यह उठता है कि खुद को ‘पठान का बच्चा’ बताने वाले इमरान आखिर बकरी की तरह क्यों मिमिया रहे हैं ? इसका उत्तर उनके इस पत्र से ही मिल जाता है। इमरान ने अपने पत्र में कश्मीर मुद्दे को सुलझाने का भी उल्लेख किया है। इरादा साफ है कि इमरान की नीति और नीयत भी पूर्व की सरकारों की तरह कश्मीर पर केन्द्रित है।

पुराने ढर्रे पर इमरान, पर बदल चुका हिन्दुस्तान

भारत से अलग देश के रूप में स्थापित होने के बाद से लेकर 72 वर्षों के इतिहास में पाकिस्तान की नीति और नीयत कश्मीर केन्द्रित ही रही। कश्मीर के लिए पाकिस्तान ने चार युद्ध लड़ लिए और जब विफलता ही मिली, तो पाकिस्तान की तत्कालीन सरकारों ने वार्ता-मंत्रणा का ढोंग रचा और इमरान ने भी उसी कुनीति-बदनीयती को फॉलो किया, परंतु कदाचित इमरान नहीं जानते कि हिन्दुस्तान बदल चुका है। भारत में अब जो सरकार है, उसका एजेंडा साफ है। यह सरकार भारत की पूर्ववर्ती सरकारों के सरकारी व राजनीतिक नारे ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’ का केवल ढोल नहीं पीटने वाली। यह सरकार इस नारे को साकार करने की दृढ़ इच्छा शक्ति रखती है। यहाँ उल्लेखनीय है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP), प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और नए गृह मंत्री अमित शाह की नस-नस में भी यह बात रमी हुई और इसीलिए वर्तमान भारत सरकार के रुख़ से स्पष्ट संदेश निकल कर आता है कि वह कश्मीर को वास्तव में कोई समस्या या मुद्दा मानने को ही तैयार नहीं है।

वार्ता नहीं, ‘वापसी’ है मोदी-शाह का लक्ष्य

मोदी के पहली बार पीएम बनने के बाद जैसे ही पठानकोट आतंकवादी हमला हुआ, मोदी सरकार ने पाकिस्तान के साथ वार्ता के दरवाज़े बंद करना शुरू कर दिए। फिर उरी आतंकवादी हमले ने पीएम मोदी को झकझोर दिया, तो पुलवामा आतंकी हमले के साथ ही वार्ता के सारे द्वार पूरी तरह बंद कर दिए गए। अब इमरान को कौन समझाए कि उन्हें वार्ता की पेशकश करने से पहले एक बार भाजपा-मोदी-शाह के कश्मीर एजेंडा का अध्ययन कर लेना चाहिए। भाजपा-मोदी-शाह का कश्मीर एजेंडा ऐसा है, जो पूरे देश की भावना का द्योतक है। इतना ही नहीं, राम मंदिर और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर भाजपा के सहयोगी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) के घटक दल भले सहमत न हों, परंतु भाजपा कश्मीर एजेंडा पूरी तरह राष्ट्रवादी एजेंडा है और एनडीए के घटक दल तो क्या, कांग्रेस सहित कोई भी विपक्षी राजनीतिक दल इस कश्मीर एजेंडा का विरोध करने का साहस नहीं जुटा सकता, जिसका मूल मंत्र है, ‘पूरा कश्मीर हमारा है’। मोदी-शाह की कश्मीर नीति में वार्ता के लिए कोई स्थान नहीं है। मोदी-शाह तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) और चीन अधिकृत कश्मीर (CoK) यानी अक्साइ चिन को वापस भारत में लाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।

जो नेहरू न कर सके, वह मोदी ने किया

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत अमित शाह को देश का गृह मंत्री बनाया है। जो कार्य देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू न कर सके, वह कार्य वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी ने कर दिखाया। देश के अधिकांश लोग, भाजपा सहित अधिकांश राजनीतिक दल और यहाँ तक कि कांग्रेस के ही कई पुराने-नए दिग्गज नेता खुली या दबी ज़ुबान में यह मानते हैं कि यदि देश का प्रथम प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को बनाया जाता, तो कश्मीर कोई समस्या ही होती। चलिए, ऐसा न हो सका। कदाचित नियति को स्वीकार नहीं था। देश को आज़ादी दिलाने वाले एक गुजराती यानी महात्मा गांधी के कहने पर दूसरे गुजराती यानी सरदार पटेल ने पूरी कांग्रेस के समर्थन के बावजूद समझौता कर लिया, परंतु नेहरू ने गृह मंत्री के रूप में सरदार पटेल को कश्मीर मुद्दा सुलझाने का अधिकार न देकर फिर एक बार इस चाणक्य-लौहपुरुष और घातक कूटनीति के धनी गुजराती सरदार पटेल की अवगणना करने की भूल की, जिसके दुष्परिणाम आज भी देश भुगत रहा है। दूसरी तरफ मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल में कश्मीर मुद्दे को सर्वोपरि मानते हुए फिर एक बार एक गुजराती यानी अमित शाह को गृह मंत्रालय सौंपा और नेहरू वाली भूल न करते हुए शाह को भाजपा व सरकार की कश्मीर नीति लागू करने की खुली छूट भी दी।

पहले आंतरिक सफाई, फिर बाह्य धुनाई

मोदी-शाह की रणनीति स्पष्ट है। गृह मंत्री के रूप में शाह सबसे पहले कश्मीर की आंतरिक समस्याएँ सुलझाएँगे। एक तरफ मोदी सरकार ने पिछले पाँच वर्षों से कश्मीर घाटी में सक्रिय आतंकवादियों पर ऑपरेशन ऑल आउट का कहर बरपा रखा है, तो दूसरी तरफ अब अमित शाह कश्मीर को देश की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए धारा 370 और अनुच्छेद 35ए की सफाई करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस आंतरिक सफाई के बाद मोदी-शाह की जोड़ी अपूर्ण कश्मीर को पूरा कश्मीर बनाने की दिशा में का शुरू करेगी। इसके लिए मोदी सरकार को एक तरफ पाकिस्तान के मोर्चे पर घातक कूटनीति के साथ काम करना होगा, ताकि पीओके को पुनः भारत और कश्मीर का हिस्सा बनाया जा सके, तो दूसरी तरफ चीन के साथ कुटिल कूटनीति का उपयोग करते हुए उसके द्वारा हथियाए गए सीओके यानी अक्साइ चिन को वापस लेने की दिशा में प्रयास शुरू करने होंगे।

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