2 नवम्बर, 1947 से ‘व्याकुल’ सरदार पटेल को आज मिली होगी ‘शांति’ !

आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 31 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। ‘कश्मीर में जो संघर्ष हो रहा है, वो हमलावरों के ख़िलाफ कश्मीर की जनता का संघर्ष है। जब वहाँ शांति स्थापित हो जाएगी, कबाइली घुसपैठिये जब कश्मीर से पूरी तरह बाहर हो जाएँगे, तब वहाँ युनाइटेड नेशन्स (UN) की देखरेख में जनमत कराने का हम वादा करते हैं।’

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आकाशवाणी से प्रसारित हो रहे इन वाक्यों को अपने घर में रहे रेडियो पर सुनते ही उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के मुख से एक ही उद्गार निकला, ‘जवाहर पछताएगा।’ यह दिन था 2 नवम्बर, 1947 का, जब एक तरफ अखंड जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी कबाइली घुसपैठियों के विरुद्ध भारतीय सेना पूरे दम-खम के साथ युद्ध लड़ रही थी, तो दूसरी तरफ गृह मंत्री होने के बावजूद सरदार पटेल को इतना तक नहीं पता था कि नेहरू आकाशवाणी से अपने प्रथम भाषण में कश्मीर के विषय में क्या कहने वाले हैं, क्योंकि जूनागढ और हैदराबाद जैसे टेढ़े चल रहे राज्यों सहित 565 रजवाड़ों का भारत में सफल विलय कराने वाले गृह मंत्री सरदार पटेल के अधिकार क्षेत्र में आने वाले कश्मीर मुद्दे को नेहरू ने अपने हाथों में रखा था।

नेहरू के भाषण की प्रति पढ़ते ही व्याकुल हो उठे सरदार

15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। इससे पहले नापाक राष्ट्र पाकिस्तान का उदय हो चुका था। भारत और पाकिस्तान के बीच सीमाएँ खींच दी गई थीं, परंतु कश्मीर को लेकर पाकिस्तान संतुष्ट नहीं था। विभाजन के समय कश्मीर के राजा हरी सिंह कश्मीर को एक स्वतंत्र राज्य/देश के रूप में रखना चाहते थे। वे कश्मीर को न भारत में, न पाकिस्तान में ही मिलाने को तैयार थे। भारत की स्वतंत्रता को अभी दो महीने ही पूरे हुए थे कि 22 अक्टूबर, 1947 को अनिर्णायक परिस्थिति से जूझ रहे हरी सिंह के कश्मीर को हड़पने के लिए पाकिस्तान ने कबाइलियों की घुसपैठ के ज़रिए हमला कर दिया। जब जान पर आफत आई, तो हरी सिंह ने नेहरू से मदद मांगी। नेहरू ने सेना भेजी। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी कबाइलियों को खदेड़ना शुरू किया। इधर सेना कश्मीर में घुसपैठियों को खदेड़ते हुए लगातार आगे बढ़ रही थी, उधर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने युद्ध शुरू होने के 11 दिन बाद ही यानी 2 नवम्बर, 1947 को आकाशवाणी पर कश्मीर पर संदेश देने का निर्णय किया। परेश रावल अभिनीत बॉलीवुड फिल्म ‘सरदार’ के एक दृश्य को यहाँ प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, जिसमें नेहरू के जनमत संग्रह वाले वक्तव्य पर सरदार पटेल की आपत्ति और व्याकुलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। फिल्म ‘सरदार’ में दर्शाए गए दृश्य के अनुसार नेहरू आकाशवाणी पर भाषण देने जाते, उससे पहले सायं 6.15 बजे सरकार का एक संदेश वाहक नेहरू के भाषण की प्रति लेकर सरदार पटेल के निवास स्थान पर पहुँचा। सरदार पटेल ने नेहरू के भाषण को पढ़ा और पढ़ते ही सन्न रह गए। उन्होंने मणिबेन पटेल को तत्काल जवाहर को फोन लगाने को कहा। इसके साथ ही प्रति पर पहली प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘हमने कश्मीर में जनमत का वायदा किया है, तो होगा, लेकिन अपने बच्चे के जन्म के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ से दाई बुलाने की कोई ज़रूरत नहीं है।’ उधर मणिबेन ने प्रधानमंत्री आवास पर फोन लगाया, तो उत्तर मिला कि नेहरू आकाशवाणी के लिए रवाना हो चुके हैं। सरदार की व्याकुलता अब और बढ़ गई। सरदार पटेल ने संदेश वाहक को गाड़ी निकालने के लिए कहते हुए कहा, ‘तुम फ़ौरन रेडियो स्टेशन जाकर उनको (नेहरू को) यह वाक्य पढ़ने से रोको कि जनमत का फ़ैसला संयुक्त राष्ट्र संघ की देखरेख में होगा।’ संदेश वाहक तत्काल गाड़ी लेकर आकाशवाणी की ओर भागा, परंतु जब तक वह पहुँचता, तब तक नेहरू अपने वक्तव्य में कह चुके थे, ‘कश्मीर में जो संघर्ष हो रहा है, वो हमलावरों के ख़िलाफ कश्मीर की जनता का संघर्ष है। जब वहाँ शांति स्थापित हो जाएगी, कबाइली घुसपैठिये जब कश्मीर से पूरी तरह बाहर हो जाएँगे, तब वहाँ युनाइटेड नेशन्स (UN) की देखरेख में जनमत कराने का हम वादा करते हैं।’

आप भी देखिए फिल्म ‘सरदार’ में दर्शाया गया 2 नवम्बर, 1947 की संध्या का वह दृश्य :

भूल पर भूल करते गए नेहरू, पर विवश थे सरदार

एक तरफ स्वतंत्रता प्राप्ति के दो महीनों के भीतर ही भारत पाकिस्तान के साथ अपना पहला युद्ध लड़ रहा था। भारतीय सेना कश्मीर में आगेकूच कर रही थी, तो दूसरी तरफ कश्मीर मोह में फँसे नेहरू एक के बाद एक भूल पर भूल किए जा रहे थे, परंतु गृह मंत्री होने के बावजूद सरदार पटेल विवश थे, क्योंकि कश्मीर का मुद्दा नेहरू ने अपने पास रखा था। नेहरू ने जहाँ पहली भूल संयुक्त राष्ट्र संघ की देखरेख में जनमत का वायदा करके की, वहीं 1 वर्ष 2 महीनों से अधिक समय से कश्मीर पर नियंत्रण करते हुए आगे बढ़ रही भारतीय सेना जब वर्तमान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) से पाकिस्तानियों को खदेड़ रही थी, तभी नेहरू ने दूसरी भूल की और 31 दिसम्बर, 1948 को रात 11.59 बजे युद्ध विराम की घोषणा कर दी। नेहरू की इस घोषणा ने पीओके की नींव रखी, जिसे भारत आज भी अपना अभिन्न अंग मानता है। यदि नेहरू ने उस दिन युद्ध विराम की घोषणा न की होती, तो आज अखंड जम्मू-कश्मीर भारत का होता, जिसका एक तिहाई हिस्सा वर्तमान में पाकिस्तान के कब्ज़े में है और कुछ हिस्सा चीन के कब्ज़े में है। नेहरू ने कश्मीर पर तीसरी भूल की धारा 370 को लागू करके की, जिसका उद्देश्य कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देकर वहाँ के लोगों को भारत के साथ रहने के लिए राज़ी करना था। स्वयं नेहरू ने कहा था कि धारा 370 अस्थायी है, परंतु यह अस्थायित्व काल 72 वर्षों तक चला और कश्मीर में पाकिस्तान के हस्तक्षेप, पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और अलगाववाद के पनपने का माध्यम बना। धारा 370 के कारण ही कश्मीर भारत की मुख्य धारा से जुड़ नहीं सका। इस धारा ने कश्मीर को अलग झंडा और अलग संविधान दिया, जिसके चलते कश्मीर केवल कागज़ों और वक्तव्यों में ही भारत का अभिन्न अंग बन सका, वास्तव में नहीं।

अब जाकर सरदार पटेल की आत्मा को मिली होगी शांति

कश्मीर पर लौह पुरुष सरदार पटेल का रुख बिल्कुल स्पष्ट था। फिल्म ‘सरदार’ में सरदार पटेल यह कहते भी नज़र आ रहे हैं कि पाकिस्तान मुस्लिम बहुलता के नाम पर कश्मीर को हड़प लेना चाहता है, परंतु कश्मीर पर नेहरू की ग़लत नीतियों के आगे सरदार विवश थे। यह विवशता की पराकाष्ठा ही थी कि जिस धारा 370 ने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनने से रोका, उसे संसद में गृह मंत्री के रूप में सरदार पटेल को ही प्रस्तुत करना पड़ा था। धारा 370 को लेकर देश में शुरू से ही भिन्न-भिन्न मत रहे, परंतु मुखर विरोध किया जनसंघ ने। जनसंघ के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को तो धारा 370 के विरुद्ध आंदोलन के चलते श्रीनगर में रहस्यमय मृत्यु का वरण करना पड़ा। यद्यपि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में राजनीतिक स्तर पर कांग्रेस के अतिरिक्त किसी राजनीतिक दल का कोई विशेष प्रभाव नहीं था। ऐसे में जनसंघ का विरोध कोई परिणाम नहीं दे पा रहा था, परंतु समय बीतता गया और 6 अप्रैल, 1980 को जनसंघ का एक नए दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) के रूप में उदय हुआ। जनसंघ की तरह ही भाजपा ने भी अपने एजेंडा में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 के उन्मूलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, परंतु इसके लिए आवश्यकता थी सत्ता की। पूरे 34 वर्षों की प्रतीक्षा के बाद भाजपा को 2014 में केन्द्र में सत्ता मिली और नरेन्द्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने, परंतु अभी भी सरकार की प्राथमिकता और शक्ति में कुछ कमी थी, क्योंकि राज्यसभा में बहुमत नहीं था। पाँच वर्ष और प्रतीक्षा की गई। 2019 में देश ने भाजपा और मोदी को दोबारा बहुमत दिया, तो मोदी ने अब धारा 370 की समाप्ति का लक्ष्य तय कर लिया। इसके लिए मोदी ने सबसे पहला काम अमित शाह को गृह मंत्रालय सौंपा। गृह मंत्री के रूप में अमित शाह ने गत 5/6 अगस्त को न केवल लोकसभा, अपितु अल्पमती राज्यसभा से भी धारा 370 समाप्त करने का विधेयक पारित करवा लिया। इस विधेयक के अनुसार सरदार पटेल जयंती यानी 31 अक्टूबर, 2019 से जम्मू-कश्मीर से धारा 370 समाप्त हो गई, जम्मू-कश्मीर केन्द्र शासित प्रदेश बन गया, जम्मू-कश्मीर से विभाजित होकर लद्दाख भी केन्द्र शासित प्रदेश बन गया। सरदार पटेल की आत्मा को अब जाकर शांति मिली होगी, परंतु अभी पूर्ण शांति शेष है, क्योंकि सरदार पटेल अखंड कश्मीर सहित अखंड भारत के स्वप्नदृष्टा थे। सरदार पटेल का अखंड कश्मीर का सपना तभी पूरा होगा, जब भारत पीओके और चीन अधिकृत कश्मीर को भी अपने नियंत्रण में ले लेगा।

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