स्मृति ईरानी यह ‘काम’ करके बन सकती हैं भारत के चुनावी इतिहास की पहली ‘सिंहनी’ ! CLICK करें और जानें क्या है वह ‘काम’ ?

हर लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट कांग्रेस और गांधी परिवार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न रहती है। कांग्रेस को यहाँ जीत का पहला स्वाद को विद्याधर वाजपेयी ने चखाया था, परंतु अमेठी गांधी परिवार की विरासत बना 1980 में। यद्यपि गांधी परिवार ने तो 1977 में ही अमेठी को अपनी विरासत बनाने की सबसे पहली कोशिश की थी, परंतु गांधी परिवार की इस कोशिश को जनता पार्टी और उसके उम्मीदवार रवीन्द्र प्रताप सिंह ने विफल कर दिया था। 1977 के बाद कोई भी विपक्षी दल गांधी परिवार के पंजे से अमेठी को नहीं छीन सका। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि 2014 के गणित को आधार बना कर राहुल गांधी के विरुद्ध दूसरी बार अमेठी से चुनाव मैदान में उतरीं भाजपा की स्मृति ईरानी ऐसी दूसरी सिंह बन पाएँगी, और पहली सिंहनी बन पाएँगी, जो गांधी के पंजे से अमेठी को छीन सकें, क्योंकि यह कारनामा केवल एक ही बार 1977 में हुआ है और वह भी जनता पार्टी के रवीन्द्र प्रताप सिंह के हाथों।

स्मृति के लिए क्यों बनी संभावनाएँ ?


लोकसभा चुनाव 2014 में अमेठी में राहुल गांधी को कड़ी टक्कर दी स्मृति ईरानी ने

अमेठी में कांग्रेस की विरासत संभालने वाले राहुल गांधी और पार्टी की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे गिरा है। राहुल 2004 में पहली बार 2009 में दूसरी बार अमेठी से जीते थे, परंतु 2014 में उनका सामना भाजपा की तेजतर्रार नेता स्मृति ईरानी से हुआ। स्मृति ने राहुल को हराने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया। उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन उनके प्रयत्न से राहुल और कांग्रेस को ऐसा झटका लगा कि 2019 में राहुल को एक सुरक्षित सीट का रुख वायनाड करना पड़ा। वास्तव में लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस के गढ़ अमेठी में कांग्रेस को प्राप्त हुए मतों में 2009 के मुकाबले 25 प्रतिशत की भारी गिरावट आई। 2004 में 66 प्रतिशत तथा 2009 में 71 प्रतिशत वोट पाने वाले राहुल को 2014 में स्मृति के मुकाबले में आने के कारण सिर्फ 46 प्रतिशत वोट ही मिले। इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में अमेठी संसदीय क्षेत्र में शामिल विधानसभा की 5 में से 4 सीटों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा, क्योंकि अमेठी से चुने जाने के बाद राहुल भले ही राष्ट्रीय राजनीति में व्यस्त रहे, परंतु स्मृति ने राहुल के विरुद्ध अमेठी में मोर्चा डट कर संभाले रखा और इतना ही नहीं भाजपा ने 2019 में यानी इस चुनाव में भी स्मृति ईरानी को ही राहुल के विरुद्ध अमेठी से चुनाव मैदान में उतार दिया। इसके अतिरिक्त कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि राहुल अमेठी के सांसद के रूप में पर्याप्त समय नहीं दे सके और सांसद के रूप में उनके कार्यों से वहाँ की जनता में असंतोष भी है। इन्हीं तमाम भयों के चलते राहुल को वायनाड जैसे सुरक्षित किले का रुख करना पड़ा। ऐसे में एक तरफ राहुल अभी भी पूरे देश का दौरा कर भाजपा-मोदी को हराने के अभियान में जुटे हुए हैं, तो स्मृति का पूरा फोकस केवल और केवल अमेठी पर है।

पहले दो चुनाव में कांग्रेस की जीत

अमेठी लोकसभा क्षेत्र का मानचित्र

अमेठी लोकसभा सीट 1967 में अस्तित्व में आई और पहले चुनाव 1967 तथा दूसरे चुनाव 1971 में कांग्रेस के विद्याधर वाजपेयी ने ही जीत दर्ज की

गांधी की पहली एंट्री और पहली हार


अमेठी में कांग्रेस के संजय गांधी (ऊपर) को 1977 में पहली बार हराने वाले जनता पार्टी के रवीन्द्र प्रताप सिंह (नीचे)

1977 में पूरे देश में आपातकाल और इंदिरा विरोधी लहर थी। जनता जनता पार्टी के पक्ष में लामबंद थी। ऐसे में कांग्रेस के अमेठी किले को बनाए रखने के लिए इंदिरा गांधी ने अपने पुत्र संजय गांधी को चुनाव मैदान में उतारा। इस तरह अमेठी में गांधी परिवार की पहली एंट्री हुई, परंतु जनता पार्टी के रवीन्द्र प्रताप सिंह ने भारी मतों से संजय गांधी को हरा कर कांग्रेस से अमेठी सीट छीन ली और यहाँ गांधी परिवार की नींव नहीं पड़ने दी।

संजय ने डाली नींव, राजीव ने संभाली विरासत


राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और संजय गांधी

अमेठी में 1977 में हारे संजय गांधी 1980 में गांधी परिवार की विरासत की नींल डालने में सफल हो गए, परंतु संजय की विमान दुर्घटना में मौत के बाद 1981 में उप चुनाव हुए और अमेठी के लोगों ने यह विरासत भाई राजीव गांधी को सौंप दी। इसके बाद राजीव ने 1984, 1989 और 1991 में लगातार तीन चुनाव अमेठी से जीते। यद्यपि 1991 में जब अमेठी में राजीव की जीत की घोषणा हुई, तब राजीव जीवित नहीं थे, क्योंकि उनकी आतंकवादी हमले में मृत्यु हो चुकी थी।

‘गांधी’ बिना भी अमेठी ने दिया कांग्रेस का साथ


अमेठी से दो बार चुनाव जीते कांग्रेस के कैप्टन सतीश शर्मा

राजीव के निधन के बाद 1991 में हुए उप चुनाव में कांग्रेस ने कैप्टन सतीश शर्मा को उम्मीदवार बनाया। गांधी न होते हुए भी अमेठी ने शर्मा को ही जिताया। 1996 में भी शर्मा ही विजयी रहे।

1998 में भाजपा ने रचा इतिहास

पहली बार भाजपा के डॉ. संजय सिंह ने जीत हासिल की

भाजपा ने अपनी स्थापना के 18 साल बाद अमेठी में पहली और ऐतिहासिक जीत हासिल की 1998 में। इस चुनाव में भाजपा के डॉ. संजय सिंह ने दो बार से सांसद रहे सतीश शर्मा को परास्त कर कांग्रेस से यह सीट छीन ली। हालाँकि संजय सिंह की इस उपलब्धि में एक कमी यह थी कि उन्होंने अमेठी का किला कांग्रेस से छीना अवश्य, परंतु उम्मीदवार गांधी परिवार का नहीं था।

गांधी की एंट्री होते ही भाजपा की हवा निकली

सोनिया गांधी ने अमेठी में कांग्रेस पार्टी, अपने देवर और पति की विरासत संभाली

1998 में हार के बाद 1999 में सोनिया गांधी ने पति की विरासत को संभालने के लिए अमेठी से चुनाव लड़ा। इस बार भाजपा के संजय सिंह बुरी तरह परास्त हुए।

अब राहुल के हाथों में नैया

राहुल गांधी 2004 से लगातार तीन बार सांसद चुने गए और चौथी चुनाव मैदान में हैं

अमेठी में गांधी परिवार की नैया 2004 से राहुल गांधी के हाथों में है। हालाँकि 2004 में अमेठी ने राहुल को सरआँखों पर बैठाया और 66 प्रतिशत वोट दिए, तो 2009 में राहुल 71 प्रतिशत वोट लेकर जीते, परंतु 2014 में मोदी लहर, राहुल की सांसद के रूप में कथित विफलताओं और उन्हें जनता के बीच उजागर करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देने वाली भाजपा की स्मृति ईरानी के कारण अमेठी में राहुल की लहर की चूलें हिल गईं और वे तीसरी बार जीते तो सही, परंतु वोट मिले केवल 46 प्रतिशत। दूसरी तरफ जिस भाजपा को 2009 में केवल 5.81 प्रतिशत वोट मिले थे, उसे 2014 में 34.48 प्रतिशत वोट मिले।

स्मृति के लिए उज्ज्वल संभावनाएँ

लोकसभा चुनाव 2019 में अमेठी से कांग्रेस प्रत्याशी राहुल गांधी और भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी

इन चुनाव आँकड़ों ने स्मृति ईरानी का उत्साह बढ़ाया, तो राहुल गांधी को वायनाड का रुख करना पड़ा, परंतु सवाल यह उठता है कि अमेठी की सीट गांधी परिवार के पंजे से केवल रवीन्द्र प्रताप सिंह ही छीन सके थे। भाजपा ने एक बार जीत हासिल की, लेकिन परास्त गांधी परिवार को नहीं किया। ऐसे में स्मृति के समक्ष गांधी परिवार से यह सीट छीन कर रवीन्द्र प्रताप के बाद दूसरी सिंह और पहली महिला सिंह बनने की चुनौती है।

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