‘मारक’ मोदी और ‘संहारक’ शाह : जवाहर के ‘जाल’ में फँसे कश्मीर को अब मिलेगी ‘सच्ची आज़ादी’ !

* मोदी-शाह के मिशन कश्मीर को लेकर पढ़िए सटीक भविष्यवाणियाँ

* साकार होगा सरदार पटेल का अखंड कश्मीर का सपना, जो नेहरू के कारण बिखरा

* अगले पाँच वर्षों में वो सब कुछ होगा, जिसकी हर भारतीय केवल सुखद् कल्पना ही करता है

* विकास की खुलेंगी खिड़कियाँ, धाराओं की छँटेगी धुंध और धार्मिक हदबंदी की टूटेंगी दीवारें

* समाप्त होगा तथाकथित कश्मीर हितैषियों व अलगाववादियों का श्रीनगर पर ‘एकाधिकार’

* 72 वर्षों के इतिहास में सभी 14 मुख्यमंत्री मुस्लिम, परंतु 15वाँ मुख्यमंत्री हिन्दू भी संभव

* पड़ोसी की कुदृष्टि को भी मिलेगा ऐसा करारा जवाब कि वह POK सौंपने पर हो जाएगा विवश

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 5 जून, 2019 (युवाप्रेस.कॉम)। माँ भारती के छिन्न-भिन्न मस्तक की मरम्मत के लिए मिशन कश्मीर आरंभ हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गृह मंत्री अमित शाह ने पदभार संभालते ही जिस प्रकार कश्मीर मुद्दे को अपने कामकाज की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा, उससे स्पष्ट है कि केन्द्र में लगातार दूसरी बार पूर्ण व पहले से अधिक प्रचंड बहुमत के साथ सत्तारूढ़ होने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) अपने पूर्वजों पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्मवाद और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ के नारे से युक्त एजेंडा पर आगे बढ़ने जा रही है, जिसकी जड़ों में वर्तमान छिन्न-भिन्न कश्मीर तक सीमित नहीं, अपितु पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) को भी भारत का भाग बना कर माँ भारती के मस्तक को पूर्णाभिषेक करने तक की विस्तृत सोच है। पीएम मोदी की प्रहारक नीति और शाह की संहारक नीति के साथ आरंभ हुआ यह मिशन कश्मीर न तो वर्तमान भारतीय राजनीति में कश्मीर को लेकर सक्रिय राजनेताओं की समझ में आएगा और न ही कश्मीर हितों के तथाकथित ठेकेदार राजनेता परिवारों और अलगाववादियों की बुद्धि में आएगा।

आश्चर्य मत करना अगर POK-COK भारत के हो जाएँ…

वास्तव में मोदी-शाह का मिशन कश्मीर उन्हीं लोगों के मनो-मस्तिष्क में उतरेगा, जो सचमुच पूरे कश्मीर को भारत के भाल के रूप में देखना चाहते हैं और जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस-RSS), उससे निकले जनसंघ और उसके बाद बनी भाजपा की सनातनी विचारधारा को समझा है। यह एक ऐसी विचारधारा है, जिसके माध्यम से देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जाल में उलझ कर अखंड से खंडित हो चुके कश्मीर को पुन: अखंड बना कर कश्मीर और कश्मीरियों को ऐसी सच्ची आज़ादी दिलाई जा सकती है, जो देश के लौह पुरुष और प्रथम उप प्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल चाहते थे। गृह मंत्री होते हुए भी कश्मीर मसला सरदार को न देकर नेहरू ने जो भूल की, उसे अब संघ-भाजपा की धारदार विचारधारा के माध्यम से मोदी-शाह की जोड़ी सरदार के अखंड कश्मीर के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। मोदी-शाह की धारदार नीति उस हद तक जाएगी, जहाँ एक तरफ कश्मीर में बैठे कश्मीरी हितों की ठेकेदारी करने वाले राज-परिवारों और अलगाववादियों को चारों खाने चित्त कर देगी, वहीं दूसरी तरफ पीओके पर कब्जा जमाए बैठे पाकिस्तान के ऐसे परखच्चे उड़ाएगी कि वह भारत का कश्मीर भूल कर अवैध रूप से हथियाया गया कश्मीर यानी पीओके भारत को सौंपने पर विवश हो जाएगा। इतना ही नहीं, चालाक चीन के साथ भी चालाकी से काम लेते हुए 1962 के भारत-चीन युद्ध में हथियाए गए अक्साई चिन (COK) को भी कश्मीर का हिस्सा बनाने की कोशिश की जाएगी। यह सब होगा, क्योंकि मोदी है, तो मुमकिन है और शाह है, तो सरल है।

परिसीमन से श्रीनगर में परचम की तैयारी

गत 31 मई को गृह मंत्री का पदभार संभालने के चौथे दिन ही बाद मंगलवार को जब अमित शाह ने अपने मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक की, तब अपेक्षा के अनुरूप ही उसमें चर्चा का सबसे प्रमुख मुद्दा कश्मीर ही था, परंतु जब बैठक में जम्मू कश्मीर में पुनर्सीमांकन यानी परिसीमन की चर्चा होने का खुलासा हुआ, तो सभी चौंक गए। वास्तव में परिसीमन एक ऐसा शस्त्र है, जिसके जरिए राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले शाह की श्रीनगर में पहली बार शुद्ध भगवा परचम लहराना तथा जम्मू-कश्मीर में पहला हिन्दू मुख्यमंत्री बनाने की रणनीति है। चुनाव आयोग (EC) ने जब पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन किया था, तब गुजरात के गृह राज्य मंत्री के रूप में अमित शाह अपने हिसाब से परिसीमन करवाने में सफल रहे थे, जिसके बाद गुजरात में 26 लोकसभा और 182 विधानसभा क्षेत्रों का ऐसा पुनर्सीमांकन हुआ कि किसी भी क्षेत्र विशेष में किसी जाति-धर्म विशेष की बाहुल्यता समाप्त हो गई और भाजपा को फायदा हुआ। अब देश के गृह मंत्री के रूप में शाह जम्मू कश्मीर में परिसीमन के लिए गुजरात मॉडल लागू करेंगे, जिससे जम्मू-कश्मीर में 6 लोकसभा और 87 विधानसभा क्षेत्रों का ऐसा पुनर्सीमांकन हो, जिससे किसी क्षेत्र विशेष में किसी धर्म-जाति विशेष की बाहुल्यता समाप्त हो जाए। जानकारों का मानना है कि यदि शाह का परिसीमन फॉर्मूला सफल रहा, तो वर्तमान में 62 प्रतिशत हिन्दू बहुल जम्मू संभाग के 4 लोकसभा और 37 विधानसभा क्षेत्रों तक सीमित भाजपा 96 प्रतिशत मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी संभाग के 2 लोकसभा और 46 विधानसभा क्षेत्रों में भी प्रभाव बढ़ा सकेगी, क्योंकि शाह के फॉर्मूला के मुताबिक मुस्लिम बहुल कश्मीर संभाग में विधानसभा क्षेत्रों का इस तरह पुनर्सीमांकन किया जाएगा, जिससे कोई धर्म विशेष के लोग निर्णायक स्थिति में न रहें। जम्मू में भाजपा का भारी जनाधार विधानसभा चुनाव 2014 में भी देखने को मिला था, जब भाजपा को 37 में से 25 सीटें मिली थीं, तो लोकसभा चुनाव 2019 में भी भाजपा 6 में से 3 यानी आधी सीटें जीतने में सफल रही। ऐसे में परिसीमन के बाद वर्ष 2019 के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा का विधानसभा में बहुमत के लिए आवश्यक 44 सीटों तक पहुँचना आसान हो सकता है। शाह की रणनीति भी यही है कि मिशन कश्मीर को सफल बनाना है, तो दिल्ली ही नहीं, अपितु श्रीनगर में भी भगवा परचम आवश्यक है। शाह का फॉर्मूला सफल रहा, तो जम्मु-कश्मीर का 15वाँ मुख्यमंत्री हिन्दू हो सकता है, जो पहला हिन्दू मुख्यमंत्री भी होगा।

धारा से अलग करती धाराओं का छँटेगा धुंध

लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान एक न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बहुत ही स्पष्ट और सरल शब्दों में समझाया था कि कश्मीर के तथाकथित हितैषी भारत की ओर से दी गई जिस विशेष स्वायत्तता को कश्मीरियत और क्षेत्रीय अस्मिता से जोड़ कर उसे अपनी राजनीति और अहंकार बनाते हैं, वही स्वायत्तता कश्मीर के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। मोदी ने संविधान की धारा 370 और अनुच्छेद 35ए को कश्मीर के लिए हानिकारक बताया था और कहा था कि यदि कश्मीर से बाहर का कोई व्यक्ति वहाँ जाकर बस ही नहीं सकता, तो फिर कोई उद्योगपति-निवेशक वहाँ कैसे पैसे लगाएगा ? काम करने वालों को रहने के लिए मकान नहीं मिलेंगे, तो कोई कैसे कश्मीर के निर्माण में अपना योगदान दे सकेगा ? भाजपा के पुरोधा श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो कश्मीर को दिए गए इस विशेष दर्जे के लिए अपने प्राणों तक की आहूति दे दी। यद्यपि गठबंधन की राजनीति में भले ही भाजपा ने अपने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर नरमी दिखाई, परंतु लोकसभा चुनाव 2019 के संकल्प पत्र में भाजपा ने कश्मीर को देश की मुख्य धारा से अलग करने वाली इन धाराओं के धुंध से मुक्ति दिलाने का वादा किया था और शाह ने इन धाराओं को हटाने की दिशा में काम तेज गति से शुरू भी कर दिया है। वास्तव में इन धाराओं के हटने से कश्मीर ही नहीं, कश्मीरियत पर विकास की परत चढ़ेगी और तथाकथित आज़ादी के नाम पर गुमराह होकर हाथों में पत्थर लिए घूम रहे बेरोजगार कश्मीरी युवकों के हाथों में मोबाइल और कम्प्यूटर आ सकते हैं।

ठिकाने लगाए जाएँगे ‘ठेकेदार’ !

जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय से लेकर अब तक के इतिहास में वहाँ की राजनीति का केन्द्रबिंदु कश्मीरियत और कश्मीरी अस्मिता को ही बनाया गया, परंतु यह कश्मीरियत और अस्मिता देखते ही देखते धार्मिकता तक सीमित हो गई। कश्मीर की राजनीति में केवल मुस्लिम नेताओं, परिवारों और राजनीतिक दलों का वर्चस्व बन गया। इन नेताओं ने कश्मीरी हितों के नाम पर अलगाववादियों और कभी-कभी आतंकवादियों और यहाँ तक कि पाकिस्तान तक का समर्थन करने में गुरेज़ नहीं किया। ऐसे नेताओं में शेख अब्दुल्ला, उनके बेटे फारूक़ अब्दुल्ला, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला, मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती शामिल हैं। मोदी-शाह का मिशन कश्मीर इन ठेकेदार बन बैठे राज परिवारों को भी चारों खाने चित्त करेगा और कश्मीर के लोगों को इन मुट्ठी भर नेताओं तथा अलगाववादी गुटों से मुक्त कर ऐसी आज़ादी दिलाएगा, जो विकास की ओर ले जाएगी तथा जो देश के प्रथम गृह मंत्री सरदार पटेल की परिकल्पना को साकार करने वाली सिद्ध होगी।

नेहरू ने नादानी ही नहीं की, सरदार का अधिकार भी छीना

वास्तव में जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में विलय से जुड़े इतिहास के पन्नों को पलटने से कई बार इसी निष्कर्ष पर पहुँचने पर विवश होना पड़ता है कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कहीं न कहीं कश्मीर को एक समस्या के रूप में उलझाने के लिए उत्तरदायी रहे। नेहरू का कश्मीर को लेकर मोह, कश्मीर समस्या सुलझा लेने का अति-आत्मविश्वास और गृह मंत्री का विषय होने के बावजूद सरदार पटेल (जो पूरे देश के 562 से अधिक रजवाड़ों का भारतीय संघ में सफलतापूर्वक विलय करवा रहे थे) को कश्मीर मुद्दे से अलग रखने की नेहरू की भूल के बुरे परिणाम आज स्वतंत्रता के 72 वर्षों के बाद भी भारत भुगत रहा है, परंतु कहना होगा कि मोदी-शाह की जोड़ी ने जो मिशन कश्मीर शुरू किया है, वह निश्चित रूप से नेहरू के जाल में फँसे कश्मीर को सरदार की कल्पना वाली सच्ची आज़ादी दिलाएगा और वर्तमान कश्मीर ही नहीं, अपितु भारतीय मानचित्र में दिखने वाला पीओके सहित पूरा कश्मीर भारत का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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