जागो INDIA जागो : 7 लाख से 5 लाख और अब 3 लाख ! तो क्या डूब जाएगा रेगिस्तान का जहाज ?

* विश्व ऊँट दिवस पर विशेष आलेख

* भारत में डायनासोर बनने की ओर ऊँट

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 22 जून, 2019 (युवाप्रेस.कॉम)। ऊँट से भला कौन परिचित नहीं होगा। इंसान के कितने काम आता है। कई दिनों तक भूखा-प्यासा रह कर मानव की लगातार सेवा करने में सक्षम ऊँट हमारे देश में विशेषकर राजस्थान की शान-ओ-शौकत कहलाता है। यहाँ तक कि राजस्थान ने तो ऊँट को राज्य पशु (STATE ANIMAL) का दर्जा तक दे रखा है। आप सोच रहे होंगे कि ऊँट कितना भाग्यशाली है, जिसे कोई राज्य और उसकी सरकार इतना महत्व देती है, परंतु आप जब आँकड़ों की ओर रुख करेंगे, तो आपको ऊँट के दुर्भाग्य पर दया आ जाएगी।

हम ऊँट के बारे में इसलिए बात कर रहे हैं, क्योंकि आज यानी 22 जून, 2019 को विश्व ऊँट दिवस यानी WORLD CAMEL DAY (WCD) है। मानव जाति के लिए अत्यंत उपयोगी प्राणी ऊँट के बारे में कम से कम आज विश्व ऊँट दिवस के अवसर पर तो सोचना बनता ही है। वह भी इसलिए, क्योंकि हम भारत में रहते हैं, क्योंकि भारत में ही ऊँटों की संख्या में गिरावट आ रही है, क्योंकि दुनिया के अन्य देशों में ऊँटों की संख्या बढ़ रही है।

ऊँट को रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है, क्योंकि वह उस रेगिस्तान में भी मानव जाति के काम आ सकता है, जहाँ ज़मीन पर पैर खपा देने वाली रेत होती है, जहाँ दूर-दूर तक पेड़-पौधे नहीं होते हैं और पानी की तो कल्पना भी नहीं की जा कती है। ऐसी विपरीत परिस्थिति में यदि कोई व्यक्ति अपने खाने-पीने का सामान लेकर ऊँट पर सवारी कर कहीं जाना चाहे, तो आराम से जा सकता है। बस रवाना होने से पहले ऊँट को पेट भर खाना और पानी दे दीजिए। इसके बाद ऊँट 40 दिन तक बिना भोजन-पानी जीवित रह सकता है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति आसानी रेगिस्तान के रास्ते से कहीं भी जा सकता है। उसे केवल ऊँट की सवारी करनी है, ऊँट के खाने-पीने की चिंता नहीं करनी है। इसीलिए ऊँट को रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है, परंतु जिस तरह ऊँटों की संख्या लगातार घट रही है, उससे लगता है कि रेगिस्तान का यह जहाज अब ज्यादा दिन नहीं चल सकेगा और अगले कुछ वर्षों में डूब जाएगा। हमारे देश में तो अक्सर किसी घटना को लेकर भविष्यवाणी करते समय यह मुहावरा उपयोग में लाया जाता है, ‘देखते हैं, अब ऊँट किस करवट बैठता है’, परंतु अब जब ऊँट ही नहीं रहेगा, तो बैठेगा किस करवट ?

लुप्त हो जाएगा ऊँट ?

भारत में ऊँट का इतिहास राजतंत्र काल से भी पुराना है, परंतु समय के साथ ऊँटों की संख्या लगातार घटती जा रही है। पशु गणना 2003 के अनुसार भारत में 7 लाख ऊँट थे, परंतु 2007 में ये घट कर 4 लाख 98 हजार और 2012 में घट कर 4 लाख पर आ गए। एक अनुमान के अनुसार इस समय भारत में ऊँटों की संख्या घट कर 3 लाख रह गई है। तनिक सोचिए, यदि इसी तरह ऊँटों के केवल राज्य पशु का दर्जा देकर कर्तव्यों की इतिश्री समझ लिया जाएगा, तो वह दिन दूर नहीं, जब भारत में ऊँट लुप्त हो जाएँगे। वैसे ऊँटों की संख्या में गिरावट के कई कारण हैं। सबसे पहला तो यह कि आधुनिक युग में ऊँट का न तो युद्धों में उपयोग होता है, न परिवहन में। अब इनका अधिकांशत: उपयोग बोझ ढोना, कृषि कार्यों या फिर दूध उत्पादन तक सीमित रह गया है। ऐसी स्थिति में ऊँटों की राजधानी राजस्थान में ऊँट पालन के प्रति उदासीनता बढ़ी है।

भारत में ऊँट की 9 प्रजातियाँ

भारत में मुख्य रूप से ऊँटों की 9 से अधिक प्रजातियाँ हैं, जिनमें राजस्थान में बीकानेरी, मारवाड़ी, जैसलमेरी, मेवाड़ी, जालोरी, गुजरात में कच्छी और खराई, मध्य प्रदेश में मालवी और हरियाणा में मेवाती प्रजाति के ऊँट पाए जाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण है बीकानेरी व जैसलमेरी प्रजाति। हाँ, भारत में एक और प्रजाति का ऊँट भी पाया जाता है, जो अपने अंत के निकट है। वह है कश्मीर का दो कूब वाला ऊँट, जो वहाँ आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहता है। हमारे देश में सफेद ऊँटों की संख्या 500 से भी कम रह गई है। अब यह प्रजाति लुप्त होने के निकट है। ऊँटों के लुप्त होने का मुख्य कारण उनका कटान, जो बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है। विश्व के कई देशों में ऊँट का मांस भोजन के रूप में खाया जाता है और ऊँट मालिक तथा तस्कर धन के लालच में ऊँटों की तस्करी कर रहे हैं।

सरकार का ऊँट संवर्धन का प्रयास

सरकार ने दूसरे राज्यों में ऊँटों के बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे अब ऊँटों को दूसरे राज्यों में कटान के लिए नहीं भेजा जाएगा और वह सुरक्षित रहेंगे। अब हर राज्य में ऊँट पालन को आगे बढ़ाने के लिए सरकार नई – नई योजनाएँ बना रही है। इसके साथ ही ऊँट पालकों को अनुदान भी प्रदान कर रही है। ताकि ज्यादा मात्रा में ऊँट पालन हो सके। इसके साथ ही राष्ट्रीय ऊँट अनुसंधान केंद्र बीकानेर के तहत ऊँटों के प्रजनन को आगे बढाने के लिए कई योजनाएं बनाई जा रही है और इनको बचाने के लिए सरकार कई सोशल मीडिया कैम्पेन, प्रदर्शनी, डोक्युमेंट्री आदि के माध्यम से लोगों को जागरूक भी कर रही है। इसके अलावा ऊँट के दूध का पूरा कलेक्शन सरकारी डेरी आरसीडीऍफ( RCDF) द्वारा किया जा रहा है। इतना ही नहीं सरकार ने अब इनके उत्थान और इनके पालन को बढ़ावा देने के लिए राजस्थान ऊँट बिल पारित किया है। जिसके अंतर्गत अब ऊँट का सरकारी पंजीकरण (Registration) करवाना अनिवार्य कर दिया है। इसके अलावा सरकार ने ऊँट बीमा में भी बढ़ोतरी की है। इसलिए अब ऊँट पलकों को अपने ऊँटों का बीमा करवाना बहुत जरूरी है।

ऊँट की जीवन शैली

आज के समय में ऊँट खेती में भी बहुत काम आने लगे हैं। खेतों की बुआई और सिंचाई में ऊँटों का उपयोग राजस्थान में लंबे समय से किया जाता रहा है। ऊँट सच्चे अर्थों में उपयोगी और सामान्यतया भोला पशु माना गया है। यह घास-फूस और पत्ते खाकर अपना जीवन यापन कर लेता है। एक रात में एक ऊँट 60-70 किलोमीटर की यात्रा तय कर लेता है। ऊँट के बारे में प्रसिद्ध है कि वह बहुत भोला जानवर है और यह सही भी है कि एक हजार में से 999 ऊँट सीधे और भोले होते हैं। विश्व में उपलब्ध कुल ऊँटों में से अकेले भारत में करीब तेरह-चौदह लाख ऊँट हैं। इसमें से करीब छह लाख ऊँट अकेले राजस्थान में हैं। राजस्थान में पाए जाने वाले बीकानेरी, जैसलमेरी और मेवाड़ी ऊँटों में बीकानेरी नस्ल सबसे अच्छी मानी गई है। ऊँट बहुत मेहनती होता है।

सरकार द्वारा वित्तीय सहायता

अगर आप ऊँट पालन शुरू करना चाहते है तो आपको ऊँट पालन शुरू करने से पहले से राज्य सरकार के पशुपालन विभाग में रजिस्ट्रेशन करवाना बहुत जरूरी है। जिसके लिए राज्य सरकार गर्भवती मादा ऊँटनी के रजिस्ट्रेशन पर 3 हजार रुपए प्रदान करती है। फिर जब उसका बच्चा एक महीने का हो जाता है तो फिर 3 हजार रुपए देती है और जब बच्चा 9 माह का हो जाता है तो सरकार 4 हजार रुपए देती है।

विपणन और बाजार

भारत के साथ – साथ बाकि देशों में भी इसकी मांग बहुत अधिक हैं हालांकि इसकी क्षेत्रीय मांग के अलावा विदेशों में भी इसके दूध का निर्यात होता है। अब तो अमूल ने भी ऊँट के दूध के विपणन के लिए सैद्धांतिक रूप पर हामी दे दी है। लेकिन अब सरकार ने ऊँटों के निर्यात पर प्रतिबंद लगा दिया है। इस व्यवसाय पर राष्ट्रीय ऊँट पालन अनुसंधान केंद्र ने कहा है कि “यह व्यवसाय किसानों के लिए काफी लाभप्रद है। जिससे किसान भविष्य में अच्छा मुनाफा कमा सकेंगे। सरकार द्वारा ऊँट पालकों की सहायता के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किये जा रहे है। जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों का रुझान इस पालन की तरफ बढ़े।’’

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