कटु सत्य ! एक पूरा ‘HONG KONG’ जी रहा है अपने घर और देश से बाहर, भारत में तो एक PM तक ने ले रखी है शरण !

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 20 जून, 2019 (युवाप्रेस.कॉम)। शीर्षक पढ़ कर आश्चर्य के साथ जिज्ञासा भी जन्मी होगी कि पूरी दुनिया में अपनी सम्पन्नता और खुशहाली के लिए प्रसिद्ध हॉङ्ग कॉङ्ग देश क्यों अपने घर और देश से बाहर जी रहा है ? आपकी जिज्ञासा का अंत किए देते हैं। यहाँ हांग कांग देश का उल्लेख इसलिए करने को विवश होना पड़ा, क्योंकि इस देश की जनसंख्या 7 करोड़ से अधिक है और दुनिया में हांग कांग की जनसंख्या के बराबर यानी 7 करोड़ लोग शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं।

आज यानी 20 जून, 2019 को विश्व शरणार्थी दिवस यानी WORLD REFUGEE DAY (WRD) के अवसर पर हम आपको विश्व में दर-दर भटक रहे शरणार्थियों के बारे में बताएँगे। ये लोग अपना घर-बार और देश छोड़ कर दूसरे देशों में दोयम दर्जे का जीवन जीने को विवश हैं। इनकी इस दशा के कई कारण हैं, जिनमें युद्ध, दो देशों के बीच विवाद आदि शामिल हैं।

विश्व के एकमात्र निर्वासित PM लोबसांग सांगे

आश्चर्य की बात तो यह है कि 7 करोड़ से अधिक शरणार्थियों में एक शरणार्थी तो एक देश का प्रधानमंत्री है, जो अपने देश से करीब 405 किलोमीटर दूर भारत में रहते हैं। इनका नाम है Lobsang Sangay, जो निर्वासित तिब्बती हैं। लोबसांग सांगे जन्म से भारतीय हैं और उनके पास अमेरिका की नागरिकता भी है। सांगे केन्द्रीय तिब्बती प्रशासन के प्रधानमंत्री हैं। चीन के अत्याचार से निर्वासित होकर दुनिया भर में शरणार्थी का जीवन जी रहे तिब्बतियों ने तिब्बती राजनेता और धर्मगुरु दलाई लामा के संन्यास के बाद 2011 में सांगे को पहली बार प्रधानमंत्री चुना। सांगे 2016 में दूसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए। दार्जीलिंग-भारत में निर्वासित तिब्बती परिवार जन्मे सांगे 28 फरवरी, 2016 को तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। यह बात ओर है कि चीन-भारत सहित दुनिया का कोई देश सांगे को प्रधानमंत्री नहीं मानता, परंतु यह बात भी उतनी ही सच है कि भारत तिब्बतियों का समर्थक रहा है और चीन से प्रताड़ित तिब्बतियों की समस्या एक विकराल समस्या है, जिसे कोई नकार नहीं सकता।

‘शरणार्थी’ एक ज्वलंत समस्या

पूरी दुनिया के लिए शरणार्थियों की समस्या एक ज्वलंत समस्या बन चुकी है। युनाइटेड नेशन्स हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजीस (UNHCR) की ओर से विश्व शरणार्थी दिवस की पूर्व संध्या पर जारी आँकड़ों के अनुसार 2018 में युद्ध और हिंसा सहित कई कारणों से 7 करोड़ से अधिक लोगों को अपना घर छोड़ने को विवश होना पड़ा। यूएनएचआरसी के अनुसार शरणार्थियों को तीन समूहों में बाँटा गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2018 में दो देशों के बीच विवाद या युद्ध या उत्पीड़न के कारण देश छोड़ने वालों की संख्या 2.59 करोड़ रही, जो 2017 के मुक़ाबले 5 लाख अधिक है। एक समूह वह है, जो स्वयं देश में अपने स्थायी घर के लिए संघर्ष कर रहे हैं, परंतु घर नहीं मिलने के कारण दूसरे देशों में रह रहे हैं। इनकी संख्या 35 लाख है। तीसरा समूह ऐसा है, जो अपने ही देश में विस्थापितों का जीवन यापन कर रहा है। इसमें 4.13 करोड़ लोग हैं। ऐसे लोगों को इंटरनली डिसप्लेस्ड पीपल (IDP) कहा जाता है।

दुनिया के 67 प्रतिशत शरणार्थी केवल 5 देशों के

यह भी आश्चर्य की बात है कि विश्व में 233 देश हैं, परंतु विश्व में जो 7 करोड़ शरणार्थी हैं, उनमें से 67 प्रतिशत अकेले 5 देशों के लोग हैं, जो अपने देश से बाहर अन्य देशों में रह रहे हैं। सर्वाधिक 67 लाख शरणार्थी सीरिया के हैं, जो अन्य देशों में रह रहे हैं। इसके बाद अफग़ानिस्तान के 27 लाख, दक्षिणी सूडान के 23 लाख, म्यानमार के 11 लाख और सोमालिया के 90 हजार नागरिकों को अन्य देशों में पलायन करना पड़ा।

यहाँ है दुनिया का सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर

संयुक्त राष्ट्र और उससे जुड़े 100 से अधिक देश वर्ष 2001 से 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस मनाते हैं। 86 प्रतिशत शरणार्थी विकासशील देशों के नागरिक हैं। शरणार्थियों में 80 प्रतिशत नागरिक अपने देश के पड़ोस वाले देश में रहने के लिए विवश हैं और उस देश के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। युगांडा में 2,800 ऐसे शरणार्थी हैं, जिनकी आयु 5 वर्ष या उससे कम है और वे अनाथ हैं। विश्व का सबसे बड़ा रिफ्यूजी कैम्प कीनिया के ददाब में हैं, जहाँ 2.30 लाख लोगों ने शरण ले रखी है। इनमें सर्वाधिक सोमालियाई नागरिक हैं, जो 1991 में गृह युद्ध के बाद पलायन को विवश हुए थे। 2016 में ददाब शरणार्थी शिविर में रहने वालों की संख्या 3.20 लाख तक पहुँच गई थी।

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