आ अब लौट चलें : 11TH यदि बन जाए ‘एकादशी’, तो कट जाए ‘लख चौरासी’

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 9 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। युवाPRESS एक वैचारिक क्रांति का मंच है, जो केवल और केवल ‘भारत की बात सुनाता है’। युवाPRESS ने गत 19 सितंबर, 2019 गुरुवार से साप्ताहिक स्तंभ ‘सनातन संक्रांति’ आरंभ किया है, जिसकी तीन कड़ियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आज युवाPRESS ‘आ अब लौट चलें’ नामक निरंतरिक स्तंभ आरंभ करने जा रहा है, जिसके माध्यम से हम भारत के युवा के समक्ष इस कथन को सार्थक करने का प्रयास करेंगे, ‘जो इतिहास नहीं जानते, वो भूगोल नहीं बदल सकते।’ युवाPRESS का ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ देश के युवाओं के समक्ष भारतीय पुरातन-प्राचीन और गौरवशाली इतिहास से जुड़े तथ्यों से अवगत कराएगा, जिससे वे न केवल स्वयं के भारतवासी-भारतवंशी होने पर गौरव की अनुभूति कर सकें, अपितु अपनी आने वाली पीढ़ी को भी गर्व के साथ बता सकें, ‘हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है…’। ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ में पाठकों को भारत की हर वह बात जानने-समझने मिलेगी, जिसे आधुनिक विश्व और विज्ञान ‘पौराणिक’, ‘MYTHOLOGY’, ‘मान्यता’ और ‘मिथक’ जैसे शब्दों से झुठलाने का कुत्सित प्रयास करता आया है। इतना ही नहीं, ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ पाठकों को भारत का वह गौरवशाली इतिहास, उससे जुड़े ऋषि-मुनियों, वराह से लेकर राम-कृष्ण, महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद से लेकर रवीन्द्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी सहित अनेक अवतारी महापुरुषों से जुड़े तथ्य भी बताएगा, जिनसे जुड़ कर आप जीवन पथ पर सरलता से आगे बढ़ सकेंगे और वह ज्ञान-सम्पदा अर्जित कर सकेंगे, जिनकी अन्य आधुनिक मीडिया निरंतर अवहेलना करता आया है।

‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ का सूत्रपात ‘एकादशी से एकावशेषी’ नामक उप स्तंभ से होने जा रहा है। आज के आधुनिक युग में 10+1 को हम 11 या ELEVEN या 11TH या ELEVENTH या ग्यारह या ग्यारस जैसे शब्दों से व्यक्त करते हैं, परंतु भारतीय सनातन धर्म-संस्कृति और हिन्दू पंचांग में इस 11 या ELEVEN या ग्यारह को एकादश और 11TH या ELEVENTH या ग्यारस को एकादशी कहा जाता है। 11 या ELEVEN या 11TH या ELEVENTH या ग्यारह, ग्यारस जैसे शब्द केवल व्यावहारिक प्रचलन के शब्द लगते हैं और बन चुके हैं। इनमें कोई पुण्य भाव, भक्ति भाव या धार्मिक भाव का आभास नहीं होता, परंतु इसी 11 या ELEVEN या ग्यारह को एकादश और 11TH या ELEVENTH या ग्यारस को एकादशी कहते ही मन में धार्मिक-आध्यात्मिक भक्ति-भाव जागृत हो जाता है। हमारी धर्म-संस्कृति में भी एकादश व एकादशी का बहुत महत्व है, तो हिन्दू पंचांग में एकादशी तिथि को सबसे शुभ तिथि माना जाता है। ‘एकादशी से एकावशेषी’ उप स्तंभ को आरंभ करने के लिए आज का ही दिन इसलिए चुना गया है, क्योंकि आज एकादशी है। हिन्दू पंचांग में हर एकादशी महत्वपूर्ण होती है। इसीलिए किसी एक एकादशी की दूसरी एकादशी के साथ छोटी या बड़ी के रूप में तुलना नहीं की जा सकती। आज यानी आश्विनी शुक्ल एकादशी विक्रम संवत 2076 है। इस एकादशी को ‘पापाकुंशा’ एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी का एक और महत्व यह है कि जब भगवान श्री राम वनवास चले गए और ननिहाल से लौटे भरत को पता चला, तो भरत ज्येष्ठ भ्राता राम को ससम्मान वापस लाने के लिए वन की ओर गए थे, जहाँ भाई-भाई के बीच के अभूतपूर्व प्रेम को समस्त ब्रह्मांड ने देखा था। रामायण में इसे ‘भरत मिलाप’ कांड कहा जाता है और यह घटना आश्विनी शुक्ल एकादशी के दिन ही घटी थी। वैसे तो ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ के अंतर्गत निरंतर कई विषयों पर बातें होंगी, परंतु ‘एकादशी से एकावशेषी’ उप स्तंभ केवल एकादशी तिथि को प्रकाशित होगा। वर्ष में 24 एकादशियाँ आती हैं। तीन वर्ष में एक बार अधिक मास आने पर एकादशियों की संख्या बढ़ कर 26 हो जाती है, परंतु चूँकि वर्तमान चालू वर्ष में अधिक मास नहीं है। अत: 12 माह के हिसाब से ‘एकादशी से एकावशेषी’ की एक वर्ष में कुल 24 कड़ियाँ प्रकाशित की जाएँगी, परंतु इन 24 कड़ियों के प्रकाशन के बावजूद यदि हमें ऐसा लगेगा कि ‘एकादशी से एकावशेषी’ उप स्तंभ में अभी भी बहुत कुछ कहना शेष रह गया है, तो इसे 24 कड़ियों के प्रकाशन के बाद भी जारी रखा जाएगा।

क्या है ‘एकादशी से एकावशेषी’ ?

‘एकादशी से एकावशेषी’ का अर्थ है वर्ष में पड़ने वाली सभी 24 एकादशियाँ मनुष्य को अधर्म से धर्म की ओर ले जाती हैं। मनुष्य को पाप से मुक्त करने का वचन देती हैं। इन सभी एकादशियों के साथ अलग-अलग नाम, विशेषण, विशेषता, महत्व, व्रत, पूजा-अनुष्ठान, संकीर्तन आदि जुड़े हुए हैं, जिन्हें करते हुए मनुष्य एकावशेषी यानी अवशेष के रूप में एकमात्र ईश्वर का स्वरूप बन सकता है। ‘एकादशी से एकावशेषी’ की पहली कड़ी में हम आपको सबसे पहले सभी एकादशियों के नाम बता देते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार नव वर्ष का आरंभ चैत्र माह से होता है और नए वर्ष में पड़ने वाली प्रथम चैत्र शुक्ल एकादशी को ‘कामदा’ एकादशी कहते हैं, तो कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी वरूथिनी एकादशी कहलाती है। इसी प्रकार वैशाखी शुक्ल एकादशी को ‘मोहिनी’, कृष्ण एकादशी को ‘अपरा’, ज्येष्ठी शुक्ल एकादशी को ‘निर्जला’ व कृष्ण एकादशी को ‘योगिनी’, आषाढ़ी शुक्ल एकादशी को ‘देव शयनी’ व कृष्ण एकादशी को ‘कामिका’, श्रावणी शुक्ल एकादशी को ‘पुत्रदा’ व कृष्ण एकादशी को ‘अजा’, भाद्रपदी शुक्ल एकादशी को ‘परिवर्तिनी’ व कृष्ण एकादशी को ‘इंदिरा’, आश्विनी शुक्ल एकादशी को ‘पापांकुशा’ व कृष्ण एकादशी को ‘रमा’, कार्तिकी शुक्ल एकादशी को ‘देव प्रबोधिनी’ व कृष्ण एकादशी को ‘उत्पन्ना’, मार्गशीर्षी शुक्ल एकादशी को ‘मोक्षदा’ व कृष्ण एकादशी को ‘सफला’, पौषी शुक्ल एकादशी को ‘पुत्रदा’ व कृष्ण एकादशी को ‘षटतिला’, माघी शुक्ल एकादशी को ‘जया’ व कृष्ण एकादशी को ‘विजया’, फाल्गुनी शुक्ल एकादशी को ‘आमलकी’ व कृष्ण एकादशी को ‘पापमोचिनी’ और तीन वर्ष में एक बार पड़ने वाले अधिक मास में आने वाली शुक्ल एकादशी को ‘पद्मिनी’ तथा कृष्ण एकादशी को ‘परमा’ एकादशी कहा जाता है। इन सभी एकादशियों के साथ जुड़े विशेषणों की अपना पौराणिक-आध्यात्मिक कथानक और महत्व है, जो मनुष्य को सब कर्म करते हुए मोक्ष की दशा तक ले जाने में यानी एकावशेषी (कैवल्य पद, जहाँ एक के अतिरिक्त कुछ नहीं होता) बनाने में सक्षम है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि हम अपने जीवन में प्रत्येक एकादशी के महत्व को समझें और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना, व्रत-उपवास, उनका संकीर्तन, उनका नाम स्मरण करें, तो यह एकादशी हमें लख चौरासी के चक्र से मुक्त करने का सामर्थ्य रखती है।

कोटि-कोटि फलदात्री है ‘पापांकुशा’ एकादशी

‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ के अंतर्गत ‘एकादशी से एकावशेषी’ उप स्तंभ में हम आपको क्रमबद्ध सभी 24 एकादशियों और अधिक मास में पड़ने वाली 2 एकादशियों के महत्व, उस दिन घटी घटनाओं, व्रत, त्योहार, पूजा-अनुष्ठान, संकीर्तन आदि के बारे में बताएँगे, परंतु आज चूँकि आश्वनी शुक्ल एकादशी यानी पापांकुशा एकादशी है, अत: ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ व ‘एकादशी से एकावशेषी’ उप स्तंभ दोनों का सूत्रपात ‘पापाकुंशा’ एकादशी और इस दिन से जुड़े अन्य विवरणों के वर्णन से करने जा रहे हैं। जैसा कि इस एकादशी के नाम से पहले लगा शब्द पापाकुंशा अपने आप में यह संदेश देता है कि यह एकादशी पाप को अंकुश में करने के लिए सबसे उपयोगी दिवस है। भारतीय सनातन धर्म के अनुसार स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने आश्विनी शुक्ल एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी दिया है। महाभारत काल के दौरान जब धर्मराज युधिष्ठिर ने आश्विनी शुक्ल एकादशी के दिन भगवान कृष्ण से पूछा, ‘हे भगवान ! आश्विन शुक्ल एकादशी का क्या नाम है ? अब आप कृपा करके इसकी विधि तथा फल कहिए।’भगवान कृष्ण कहने लगे, ‘हे युधिष्ठिर ! पापों का नाश करने वाली इस एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी है। हे राजन ! इस दिन मनुष्य को विधिपूर्वक भगवान पद्‍मनाभ की पूजा करनी चाहिए। यह एकादशी मनुष्य को मनवांछित फल देकर स्वर्ग को प्राप्त कराने वाली है। मनुष्य को बहुत दिनों तक कठोर तपस्या से जो फल मिलता है, वह फल भगवान गरुड़ध्वज को नमस्कार करने से प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य अज्ञानवश अनेक पाप करते हैं, परंतु हरि को नमस्कार करते हैं, वे नर्क में नहीं जाते। विष्णु के नाम के कीर्तन-संकीर्तन मात्र से संसार के सब तीर्थों के पुण्य का फल मिल जाता है। जो मनुष्य शारंग धनुषधारी भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं, उन्हें कभी भी यम यातना भोगनी नहीं पड़ती। जो मनुष्य वैष्णव होकर शिव की और शैव होकर विष्णु की निंदा करते हैं, वे अवश्य नर्कवासी होते हैं। सहस्रों वाजपेयी और अश्वमेध यज्ञों से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी के व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होता है। संसार में एकादशी के बराबर कोई पुण्य नहीं। इसके बराबर पवित्र तीनों लोकों में कुछ भी नहीं है। इसमें भी पापांकुशा एकादशी के बराबर कोई व्रत नहीं। जब तक मनुष्य पद्‍मनाभ की एकादशी का व्रत नहीं करते हैं, तब तक उनकी देह में पाप वास कर सकते हैं।’

भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर से आगे कहा, ‘हे राजेन्द्र ! यह पापांकुशा एकादशी स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्यता, सुंदर स्त्री तथा अन्न और धन की दात्री है। एकादशी के व्रत के बराबर गंगा, गया, काशी, कुरुक्षेत्र और पुष्कर भी पुण्यवान नहीं हैं। हरिवासर तथा एकादशी का व्रत करने और जागरण करने से सहज ही में मनुष्य विष्णु पद को प्राप्त होता है। हे युधिष्ठिर ! इस व्रत के करने वाले दस पीढ़ी मातृ पक्ष, दस पीढ़ी पितृ पक्ष, दस पीढ़ी स्त्री पक्ष तथा दस पीढ़ी मित्र पक्ष का उद्धार कर देते हैं। वे दिव्य देह धारण कर चतुर्भुज रूप हो, पीतांबर पहने और हाथ में माला लेकर गरुड़ पर चढ़ कर विष्णु लोक को जाते हैं। हे नृपोत्तम ! बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में इस व्रत को करने से पापी मनुष्य भी दुर्गति को प्राप्त न होकर सद्‍गति को प्राप्त होता है। आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की इस पापांकुशा एकादशी का व्रत जो मनुष्य करते हैं, वे अंत समय में हरिलोक को प्राप्त होते हैं तथा समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। सोना, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, छतरी तथा जूती दान करने से मनुष्य यमराज को नहीं देखता। जो मनुष्य किसी प्रकार के पुण्य कर्म किए बिना जीवन के दिन व्यतीत करता है, वह लोहार की भट्टी की तरह साँस लेता हुआ निर्जीव के समान ही है। निर्धन मनुष्यों को भी अपनी शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए तथा धनवानों को सरोवर, उद्यान, मकान आदि बनवा कर दान करना चाहिए। ऐसे मनुष्यों को यम का द्वार नहीं देखना पड़ता तथा संसार में दीर्घायु होकर धनाढ्‍य, कुलीन और रोगरहित रहते हैं। इस व्रत को करने वाला दिव्य फल प्राप्त करता है।’

इसी दिन हुई थी ‘भरत मिलाप’ में भ्रातृप्रेम की पराकाष्ठा

आश्विनी शुक्ल एकादशी को भरत मिलाप उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। रामायण में भरत मिलाप प्रकरण संसार में भ्रातृप्रेम का अनुपम दृष्टांत है। जब कैकेयी के वचन में बंधे अयोध्या के राजा दशरथ ज्येष्ठ पुत्र राम को 14 वर्ष का वनवास पर जाने को कहते हैं, तब इस घटना के समय कैकेयी के पुत्र भरत अपने ननिहाल में होते हैं। पिता की आज्ञा को आदेश मान कर भगवान सीता व लक्ष्मण सहित वनवास को निकल जाते हैं। भरत को अयोध्या लौटने पर जब सारा घटनाक्रम पता चलता है, तो वह अत्यंत व्याकुल व शोकग्रस्त हो जाता है और अपनी माता कैकेयी के प्रति क्रुद्ध हो जाता है। इतना ही नहीं, भरत बड़े भाई राम को ससम्मान वापस लाने के लिए अयोध्या से रवाना हो जाते हैं। उस समय भगवान राम चित्रकूट पर्वत पर निवास कर रहे होते हैं। भरत चतुरंगिणी सेना, हाथी, घोड़ों और अश्त्र-शस्त्रों से सुसज्ज होकर चित्रकूट की ओर रवाना होते हैं। लक्ष्मण को संदेह होता है कि भरत राम का वध करने के उद्देश्य से आक्रमण करने आ रहे हैं, परंतु प्रभु राम कहते हैं, ‘ ‘लक्ष्मण! तुम ये कैसी बातें कर रहे हो? भरत तो मुझे प्राणों से भी प्रिय है। अवश्य ही वह मुझे अयोध्या वापस ले जाने के लिये आया होगा। भरत में और मुझमें कोई अंतर नहीं है, तुमने जो कठोर शब्द भरत के लिये कहे हैं, वे वास्तव में मेरे लिये कहे हैं। किसी भी स्थिति में पुत्र पिता के और भाई-भाई के प्राण नहीं लेता।’ आश्विनी शुक्ल एकादशी के दिन ही भरत चित्रकूट पर्वत पर पहुँचते हैं और अत्यंत शोकाकुल, व्याकुल और रोते-बिलखते-विलाप करते हुए बड़े भाई राम से मिलते हैं। राम-भरत के इस मिलाप के दौरान दो भाई सिंहासन पाने के लिए नहीं, अपितु देने के लिए एक-दूसरे से हठ करते हैं। भरत राम को वापस ले जाने की हठ करते हैं, तो राम पिता की आज्ञा और रघुकुल रीति ‘प्राण जाय पर वचन न जाय’ की अनुपालना से बंध कर भरत का आग्रह अस्वीकार करने की अपनी विवशता बार-बार दोहराते हैं। भरत मिलाप के इन दृश्यों में भ्रातृप्रेम की पराकाष्ठा दर्शाई गई है। जब भरत राम को अयोध्या लौट चलने हेतु मनाने में विफल रहते हैं, तब वे राम से उनकी चरण पादुकाएँ मांगते हुए कहते हैं, ‘भैया, जब तक आप अयोध्या नहीं लौटेंगे, तब तक सिंहासन पर आपकी ये चरण पादुकाएँ रहेंगी। मैं आपकी तरह महल में रह कर भी वनवासी की तरह रहूँगा और कुटिया से ही राजकाज संभालूँगा।’ इतना ही नहीं, भरत यहाँ भगवान राम से एक वचन भी लेते हैं, ‘यदि आपने (राम ने) अयोध्या लौटने में 14 वर्ष से ऊपर एक दिन भी लगाया, तो आप मेरा मरा मुँह देखेंगे।’

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