अहिंसा और शांति के पुजारी गांधीजी ने क्यों दिया था प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन का साथ ?

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आज़ादी की आस में बलिदान हो गए 50,000 भारतीय जवान

मगर अंग्रेजों ने किया छल और हजारों सीने कर दिए छलनी

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 28 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। आज प्रथम विश्व युद्ध की 105वीं बरसी है। आपको जानकर आश्चर्य होगा, परंतु यह सत्य है कि अहिंसा और शांति के पुजारी महात्मा गांधी ने प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सेना भेजने का समर्थन किया था। आपको यह जानकर और हैरानी होगी कि भारत जिन अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, उसी ब्रिटेन की तरफ से युद्ध लड़ने के लिये भारत की सेना विश्व युद्ध में कूदी थी। हालाँकि ऐसा करने के पीछे गांधीजी की जो मंशा थी, वह फलीभूत नहीं हुई। गांधीजी को उम्मीद थी कि विश्व युद्ध में ब्रिटेन की ओर से भारतीय सेना के भाग लेने से खुश होकर ब्रिटिश शासक भारत को आज़ाद कर देंगे, मगर ऐसा नहीं हुआ। अंग्रेजों ने गांधीजी और भारत के साथ छल किया। उधर विश्वयुद्ध में भारत की ओर से दुनिया के कोने-कोने में लड़ने गये 8 लाख सैनिकों में से लगभग 50,000 सैनिक मारे गये और लगभग 65 हजार सैनिक घायल हुए। हजारों सैनिक लापता भी हुए, जिनका कोई पता नहीं चल सका।

क्यों हुआ था प्रथम विश्व युद्ध ?

प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत 28 जुलाई 1914 को हुई थी। ऑस्ट्रिया के सेराजेवो में ऑस्ट्रिया के सिंहासन के उत्तराधिकारी आर्चड्युक फर्डिनेंड और उनकी पत्नी की हत्या हो जाने के एक महीने बाद ऑस्ट्रिया ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की थी। रूस, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने इस युद्ध में ऑस्ट्रिया की मदद की थी। इसी बीच जर्मनी ने कुटिलता की और फ्रांस की ओर बढ़ने से पहले ही तटस्थ बेल्जियम और लक्जमबर्ग पर हमला बोल दिया, जिसके बाद ब्रिटेन ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध का ऐलान कर दिया। यह युद्ध चार साल से भी अधिक लंबा चला था।

अगस्त-1917 के मध्य तक इस युद्ध में कई देश शामिल हो चुके थे। 1917 के बाद अमेरिका भी अपने मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में कूद पड़ा था। अमेरिका के इस युद्ध में भाग लेने का कारण यह था कि जर्मनी ने इंग्लैंड के लुसिटिनिया जहाज को समंदर में डुबो दिया था, जिसमें कुछ अमेरिकी नागरिक भी सवार थे। इस घटना से गुस्साए अमेरिका ने भी ब्रिटेन की तरफ से युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी। 1918 में ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका ने मिलकर जर्मनी और उसके सहयोगी देशों को पराजित कर दिया। जर्मनी और ऑस्ट्रिया की प्रार्थना पर 11 नवंबर-1918 को युद्ध समाप्ति की घोषणा की गई, परंतु तब तक इस युद्ध में अलग-अलग देशों के 5 करोड़ से भी अधिक सैनिक जान गँवा चुके थे और 4 करोड़ से अधिक सैनिक घायल हो चुके थे।

युद्ध में भारत ने भी लिया था हिस्सा

जो ब्रिटेन विश्व युद्ध लड़ रहा था, उसका भारत समेत कई देशों पर कब्जा था। इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा के अनुसार ब्रिटिश शासन में भारत की जो सेना थी, वह ब्रिटिश शासकों की ही स्वामी-भक्ति करती थी, उस समय की भारतीय सेना ब्रिटेन के दुश्मनों को अपना दुश्मन मानती थी। इसलिये ब्रिटेन के शासकों ने भारत में स्थित ब्रिटिश शासकों से जिस सहयोग की माँग की, वह उन्हें दी गई। भारत के 8 लाख सैनिकों को ब्रिटेन की ओर से लड़ने के लिये दुनिया के विभिन्न मोर्चों पर भेजा गया, जहाँ भारतीय सैनिकों ने प्रशंसनीय प्रदर्शन भी किया।

जब भारत के ब्रिटिश शासकों ने भारतीय सेना को विश्व युद्ध में लड़ने के लिये भेजा तो उस समय की महात्मा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने भी ब्रिटिश शासकों का समर्थन किया था। इतना ही नहीं महात्मा गांधी ने सेना में भर्ती होने के लिये युवाओं को प्रेरित करने हेतु अभियान भी चलाया था। अनेक युवा मजबूरीवश तो कुछ सरकारी नौकरी की लालसा में सेना में भर्ती हुए, जबकि कुछ इलाकों में ब्रिटिश शासकों ने जबरन भी युवाओं को सेना में भर्ती करके युद्ध की आग में झोंक दिया था। गांधीजी ने समर्थन इसलिये किया था कि युद्ध के बाद भारतीयों के प्रदर्शन और ब्रिटेन के पक्ष में युद्ध करने से खुश होकर ब्रिटिश शासक भारत को आज़ाद कर देंगे। परंतु युद्ध समाप्ति के बाद ब्रिटिश शासकों ने इस मुद्दे पर बात करने से ही इनकार करके गांधीजी के साथ ही नहीं, भारतीय सेना और भारत के साथ भी छल किया था।

हालाँकि फ्रांस ने भारतीय सैनिकों के साहस, वीरता और बलिदान को खूब सराहा और फ्रांस में जगह-जगह भारतीय सैनिकों के स्मारक भी स्थापित किये हैं। अंतर्राष्ट्रीय दबाव में आकर बाद में ब्रिटेन ने भी भारतीय सैनिकों के साहस की सराहना की और कुछ भारतीय सैनिकों को ब्रिटेन के सबसे बड़े सैनिक वीरता पुरस्कार विक्टोरिया क्रॉस पदक प्रदान किया।

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