इस आदमी ने दुनिया को सिखाया “बेहोश” होना

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 16 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। चिकित्सा क्षेत्र में वह स्वर्णिम दिन, जिसने एक ऐसे उपचार की खोज़ की, जो मानव जाति के लिए वरदान सिद्ध हुआ। इस उपचार में मरीज़ को दर्द से मुक्त करने की अपार क्षमता थी, जो आज भी बड़े-बड़े शल्यक्रिया यानी ऑपरेशन के दौरान मरीज को हो रहे दर्द से निजात दिलाने के लिए उपयोग किया जाता है। एनेस्थीसिया में शरीर के किसी प्रमुख नसों के बंडलों के चारों तरफ एक हिस्से को सुन्न किया जाता है. क्षेत्रीय एनेस्थीसिया की मदद से हाथ, पैर, पेट इत्यादि क्षेत्र के ऑपरेशन किये जाते हैं, जिसमें मरीज होश में तो रहता है परंतु उसे दर्द का अनुभव नहीं होता है। इसमें एनेस्थेटिक दवाओं का असर 12-18 घंटे तक रहता है, जिससे ऑपरेशन के बाद भी उस स्थान पर दर्द का अनुभव नहीं होता है। हालांकि इसका असर समाप्त होते ही मरीज को अपने दर्द का पुनः अहसास होने लगता है। अर्थात यह केवल कुछ क्षण ही मरीज़ को दर्द से दूर रखने में सक्षम है। आज 174वाँ विश्व एनेस्थीसिया दिवस है। विश्व एनेस्थीसिया दिवस 16 अक्टूबर, 1846 को ईथर एनेस्थीसिया के पहले सफल प्रदर्शन की याद में प्रतिवर्ष 16 अक्टूबर को पूरे विश्व में एनेस्थीसिया दिवस मनाया जाता है। लंदन के विश्व फेडरेशन ऑफ सोसाइटी ऑफ एनेस्थेसियोलिगस्ट्स (World Federation of Societies of Anaesthesioloigsts) WFSA प्रतिवर्ष ये WAD मनाती है, जिसमें 134 से अधिक सोसाइटीज़ के सदस्य और 150 से अधिक देशों के एनेस्थेसियोलॉजिस्ट (निश्चेतना विशेषज्ञ) हिस्सा लेते हैं। एनेस्थीसिया शब्द के नामकरण का श्रेय ऑलिवर वेंडेल होम्स को जाता है, परंतु इसका जनक विलियम थॉमस ग्रीन मोर्टन को माना जाता है, जिन्होंने विश्व को बेहोश करने का मंत्र यानी इस औषधि की खोज़ की।

क्या है एनेस्थीशिया ?

संज्ञाहरण, एनेस्थीशिया या संज्ञाहीनता, निश्चेतना और बेहोश होने का पारंपरिक अर्थ है संवेदनशीलता यानी किसी भी प्रकार का अहसास शरीर के उस हिस्से पर न होना, जहाँ एनेस्थीसिया दिया गया हो। इस औषधी से शब्दस्मृतिलोप, पीड़ाशून्यता, सजगता की हानि, कंकालीय मांसपेशी में प्रतिक्रिया, तनाव में कमी आ जाती है। ये रोगियों को तनाव तथा दर्द महसूस किये बिना शल्यक्रिया से गुजरने की अनुमति देती है। ये औषधि एशिया और अमेरिका में पाई जाने वाली सोलानम प्रजाति है, जिनमें शक्तिशाली किस्म के ट्रोपाना क्षारामों पाया जाता है जो एक व्यक्ति के शरीर को चेतनशून्य बनाने में सक्षम है। मेंड्रेक, हेनबेन, धतूरा धातु और धतूरा आइनॉक्सिया इसके उदाहरण हैं। वहीं प्राचीन ग्रीक और रोमन चिकित्सा शास्त्रों के अनुसार मान्यता है कि हिप्पोक्रेट्स, थेयोफ्रेस्टस, आउलुस कॉर्नेलियस सेल्सस, पेडानिअस डायोस्कोराइड्स और प्लिनी द एल्डर ने अफीम एवं सोलानम प्रजातियों का प्रयोग मरीज को बेहोश करने के लिए किया था।

13वीं शताब्दी में इटली में थिओडोरिक बोर्गोगनेनी ने अफीमयुक्त मादक द्रव्य के साथ ठीक इसी प्रकार के मिश्रण का प्रयोग बेहोश करने के लिए किया था और क्षाराम के संयोग उपचार से 19वीं सदी तक संज्ञाहरण को एकमात्र आधार के रूप में बरकरार रखा गया। खोपड़ी में छेद करने की शल्यक्रिया से पहले अमेरिका में कोका का प्रयोग भी संज्ञाहरण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता था, जिसमें ईन्कैन शैमंस कोका की पत्तियों को चबाते थे और खोपड़ी पर शल्यक्रिया के दौरान बनाए गए घावों पर थूकते थे, जिससे सिर का वह विशेष क्षेत्र चेतनाशून्य हो जाय, जहाँ घाव से दर्द होता था। संज्ञाहरण की प्राचीन वन औषधियों यानी जड़ी-बूटियों को विभिन्न प्रकार से निद्राजनक, पीड़ानाशक एवं मादक माना जाता रहा है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि यह अचेतनावस्था को जन्म देता है, या दर्द से छुटकारा दिलाता है।

कौन थे विलियम थॉमस ग्रीन मॉर्टन ?

विलियम थॉमस ग्रीन मॉर्टन का जन्म 9 अगस्त, 1819 अमेरिका में मैसाचुसेट्स के चार्लटन में हुआ था। वे जेम्स मॉर्टन, एक खान और रेबेका (नीडम) मॉर्टन के पुत्र थे। पहले वे एक क्लर्क, प्रिंटर और सेल्समैन के रूप में काम करते थे। 1840 में उन्होंने बाल्टीमोर कॉलेज ऑफ डेंटल सर्जरी में प्रवेश लिया। 1841 में, उन्होंने सोने की प्लेटों पर झूठे दांतों की मिलाप की एक नई प्रक्रिया विकसित करने के लिए कुख्याति प्राप्त की। 1842 में, उन्होंने हार्टफोर्ड, कनेक्टिकट में डेंटिस्ट होरेस वेल्स के साथ अध्ययन करने के लिए बिना स्नातक पूरा किए कॉलेज छोड़ दिया। 1843 में मॉर्टन ने पूर्व कांग्रेसी लेमुएल व्हिटमैन की भतीजी, कनेक्टिकट के एलिजाबेथ व्हिटमैन से विवाह किया। कनेक्टिकट के माता-पिता ने मॉर्टन के पेशे पर आपत्ति जताते हुए उनसे केवल दवा का अध्ययन करने का वादा लिया और फिर अपनी बेटी का विवाह विलियम से कराया। 1844 में मॉर्टन ने हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में प्रवेश किया और चार्ल्स टी. जैक्सन के रसायन विज्ञान व्याख्यान में भाग लिया, जिसने मॉर्टन को ईथर के संवेदनाहारी गुणों से परिचित कराया। वे एक अमेरिकी दंत चिकित्सक थे जिन्होंने पहली बार 1846 में शल्यचिकित्सा एनेस्थेटिक के रूप में इनहेल्ड ईथर के उपयोग को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया था।

पहली बार एनेस्थीसिया का प्रयोग

30 सितंबर, 1846 को मॉर्टन ने एक मरीज को ईथर देने के बाद दर्द रहित दांत निकालने का एक अनोखा कारनामा कर दिखाया, जिसे एक स्थानीय समाचार पत्र ने छापा। बोस्टन सर्जन हेनरी जैकब बिगेलो ने 16 अक्टूबर, 1846 को मैसाचुसेट्स के जनरल अस्पताल एमजीएच के ऑपरेटिंग थिएटर में ईथर के एक प्रसिद्ध प्रदर्शन की व्यवस्था की। जिसमें मॉर्टन को इस पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया गया। इस प्रदर्शन में जॉन कोलिन्स वॉरेन ने एडवर्ड गिल्बर्ट एबॉट नामक एक मरीज को बुलाया जिसके गले में एक ट्यूमर था। उस मरीज पर ईथर का प्रयोग कर उसे बिना कोई दर्द पहुँचाए ट्यूमर निकाल लिया गया। इस उपयोग की खबर विश्व भर में तेजी से फैल गई। विलियम थॉमस ग्रीन मोर्टन की इस खोज को वर्तमान में “ईथर डोम” के नाम से भी जाना जाता है। अमेरिका के बाहर ईथर का पहला उपयोग इंग्लैंड में दंत चिकित्सक जेम्स रॉबिन्सन द्वारा एक अमेरिकी डॉक्टर फ्रांसिस बूटे के घर पर दांत निकालने में किया गया। उसी दिन 19 दिसम्बर, 1846 को स्कॉटलैंड की डमफ्रीज़ रॉयल इन्फर्मरी में डॉ. स्मार्ट ने शल्यक्रिया की एक प्रक्रिया के लिए ईथर का इस्तेमाल किया। पहले से ही संशयवादी डॉ. वॉरेन, विलियम थॉमस ग्रीन की इस उपलब्धि से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने कहा “सज्जनों, यह कोई पाखंड नहीं है।” इसके कुछ समय बाद चिकित्सक और लेखक ओलिवर वेंडेल होम्स सीनियर ने मॉर्टन को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने इस उपचार का नाम “एनेस्थीसिया” तथा (चेतनाशून्य) रखने का प्रस्ताव दिया। 1846 के उत्तरार्द्ध में सफल संज्ञाहरण तेजी से प्रकाश में आया और यूरोप में कई माननीय सर्जनों ने तेजी से ईथर के साथ कई ऑपरेशन किए।

15 जुलाई, 1968 को विलियम मॉर्टन की मृत्यु

विलियम थॉमस ग्रीन मॉर्टन जुलाई-1868 में न्यूयॉर्क शहर में अपनी पत्नी के साथ गाड़ी में जा रहे थे, तभी अचानक उन्होंने गाड़ी रुकवाई और पास की एक झील में कूद पड़े। उन्हें ठंड की जरूरत महसूस हो रही थी, परंतु ये उनके लिए घातक साबित हुआ और वह बीमार पड़ गए। उन्हें पास के अस्पताल सेंट ल्यूक में ले जाया गया। जहाँ मॉर्टन को पहचानने पर, मुख्य सर्जन ने अपने छात्रों से कहा, “युवा सज्जनों, आप अपने सामने एक ऐसे व्यक्ति को देख रहे हैं जिसने मानवता के लिए अधिक काम किया है और किसी भी ऐसे आदमी की तुलना में दुःख की राहत के लिए जो कभी जीवित रहा है।” 15 जुलाई, 1968 को विलियम मॉर्टन की मृत्यु हो गई। उन्हें वाटरटाउन और कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स में माउंट ऑबर्न कब्रस्तान में दफनाया गया था।

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