मोदी पर राहुल की ‘पहली’ जीत : 23 को उपजा भ्रम, 23 को टूटा और 23 को ही लगी ताबूत में आख़िरी कील !

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विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 24 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। भारतीय इतिहास में बारहों महीनों के सभी 23 तारीखों पर कोई न कोई ऐतिहासिक घटना घटी होगी, परंतु हम जिन 23 तारीखों की बात कर रहे हैं, वह मई-2018 से जुलाई-2019 के बीच आई तीन 23 तारीखें हैं। ये तीन 23 तारीखें भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक तारीख़ें बन गई हैं। कदाचित आपको विश्वास नहीं हो रहा होगा, परंतु यह सच्चाई है।

देश की राजनीति में इस समय दो मुख्य दल हैं। एक दल है 138 वर्ष पुरानी, परंतु जनाधार खो चुकी नेतृत्व विहीन कांग्रेस और दूसरा है 39 वर्ष पुराना, परंतु देश और अनेक राज्यों की सत्ता पर काबिज तथा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP)। अब आप सोच रहे होंगे कि तारीख़ 23 का इससे क्या संबंध है ? आपके मन में यह सवाल भी उठ रहा होगा कि वह कौन सी तीन 23 तारीख़ें हैं ? धैर्य रखिए, धीरे-धीरे आपको सब कुछ समझ में आ जाएगा। वैसे, आपकी उत्कंठा शांत करने के लिए वो तीन 23 तारीखें बता ही देते हैं। वो तीन 23 तारीख़ें हैं 23 मई 2018, 23 मई 2019 और 23 जुलाई, 2019। अब आगे इन तारीख़ों से जुड़े घटनाक्रमों के माध्यम से रहस्यों की परतें भी खुलेंगी। बस, धैर्य से आगे पढ़ते-बढ़ते जाइए।

शीर्षक पर आने से पहले आपको पाँच वर्ष पीछे लिए चलते हैं, जब लोकसभा चुनाव 2014 में देश की जनता ने पूरे 30 वर्षों के बाद किसी एक दल यानी भाजपा को 282 सीटों के साथ को पूर्ण बहुमत दिया था और नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे। यही वह दिन भी था, जब कांग्रेस अपने इतिहास में सबसे कम यानी सिर्फ 44 सीटों पर सिमट कर बुरी तरह परास्त हुई थी। 16 मई, 2014 को भाजपा का जो विजय अभियान आरंभ हुआ, वह उसके बाद कई राज्यों तक फैलता गया और केन्द्र की सत्ता से बेदखल हुई कांग्रेस राज्यों की सत्ताओं से भी बेदखल होती गई। यह सिलसिला मई-2014 से लेकर अप्रैल-2018 यानी 3 वर्षों 11 महीनों तक चलता रहा। भाजपा उठती रही, कांग्रेस पिटती रही।

23 मई, 2018 : सरके सिंहासन को पाकर जन्मा जीत का भ्रम

इस बीच मई में कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 हुए। कर्नाटक की जनता ने अधूरे मन से जनादेश दिया। यह जनादेश खंडित अवश्य था, परंतु चुनाव परिणामों से स्पष्ट था कि जनता ने सत्तारूढ़ सिद्धारमैया सरकार को नकार दिया था, क्योंकि 225 में से 224 सीटों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस को 80 सीटें ही मिली थीं, जो 2013 में मिली 122 सीटों के मुकाबले 42 सीटें कम थीं। दूसरी तरफ 2013 में मात्र 44 सीटें हासिल करने वाली भाजपा को 105 सीटें हासिल हुई थीं। तीसरी पार्टी जनता दल सेकुलर (जदसे-JDS) को मात्र 37 सीटें मिलीं, जो 2013 के मुकाबले 3 कम थीं। इस लिहाज़ से यह जनादेश भले ही किसी एक पक्ष में नहीं था, परंतु सत्तारूढ़ सिद्धारमैया सरकार के तो निश्चित रूप से खिलाफ ही था। खंडित जनादेश मिलते ही कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने पूर्वाधिकारियों की जोड़-तोड़ वाली राजनीति और 90 के दशक से चली आ रही ‘भाजपा को रोको’ वाली रणनीति अपनाई। सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा नेता बी. एस. येदियुरप्पा ने 17 मई, 2018 को सरकार तो बना ली, परंतु कांग्रेस ने जेडीएस को भाजपा की ओर जाने के लिए हर हथकंडा अपनाया और 23 मई, 2018 को कर्नाटक विधानसभा में येदियुरप्पा सरकार गिर गई। बस, यह 23 मई 2018 का दिन ही कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए भावी पतन का कारण बन गया। दरअसल जनता की ओर से नकार दिए जाने के बावजूद कर्नाटक में भाजपा सरकार बनने से रोकने में मिली सफलता को राहुल गांधी के राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध पहली जीत के रूप में देखा गया और स्वयं राहुल भी इसी भ्रम में रहे कि मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को लोकसभा चुनाव 2019 में दोबारा सत्ता में आने से रोकने के उनके मिशन की शुरुआत हो गई। राहुल का यह भ्रम ही राहुल और कांग्रेस के भावी पतन की नींव बना। राहुल गांधी ने जेडीएस के विरुद्ध चुनाव लड़ने के बावजूद कांग्रेस और जेडीएस का गठबंधन करवाया और कर्नाटक में एच. डी. कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद देकर भाजपा रोको अभियान को सफल बना लिया।

23 मई, 2019 : भ्रम से उपजा अति-आत्मविश्वास ले डूबा

कर्नाटक में ज़मीनी सफलता नहीं, अपितु राजनीतिक सफलता प्राप्त कर राहुल गांधी अचानक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के विरुद्ध आक्रमक हो गए। राहुल के हौसले बुलंदी पर पहुँच गए। उन्हें लगा कि मोदी-शाह की जोड़ी को चुनौती देने में अब वे सक्षम हो गए हैं, जबकि राहुल सहित पूरी कांग्रेस और देश की समग्र जनता यह जानती थी कि कर्नाटक में राहुल या कांग्रेस ने कोई तीर नहीं मारा है। गंदी राजनीति के ढर्रे को आगे बढ़ा कर और जनता की ओर से नकारे जाने के बावजूद सत्ता से चिपके रहने की पुरानी राजनीति को मोदी पर बड़ी सफलता मानने वाले राहुल गांधी के मन में कर्नाटकी किला फतह करने के बाद आत्मविश्वास नहीं, अपितु अति-आत्मविश्वास उपजा। राहुल के इस अति-आत्मविश्वास को और हवा उस समय मिली, कांग्रेस ने दिसम्बर में हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2018 में सत्तारूढ़ भाजपा सरकारों को सत्ता से बेदखल कर दिया। अब राहुल का अति-आत्मविश्वास आत्मघातक बनने लगा। राहुल को चार महीने बाद ही होने वाले लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस की बड़ी जीत दिखाई देने लगी। तीन वर्षों से मोदी विरोध के नाम पर देश भर में घूम रहे विपक्षी नेताओं की टोली में राहुल की पूछ बढ़ गई। राहुल स्वयं को इस टोली का सरदार समझने लगे। अभी तक भी ज़मीन पर यह मोदी विरोधी टोली कोई मज़बूत मेहनत करती दिखाई नहीं दे रही थी। लोकसभा चुनाव 2019 भी आ गए। राहुल ने चौकीदार चोर से लेकर तरह-तरह के हथकंडे अपनाए, राज्यों में बेमेल गठबंधन किए, तो कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों से अपमान भी झेला, परंतु 23 मई 2018 को बने कर्नाटकी भ्रम से उपजा अति-आत्मविश्वास राहुल को ले डूबा और ठीक एक साल बाद 23 मई 2019 को लोकसभा चुनाव परिणामों की घोषणा हुई, तो राहुल के हाथ पाँच वर्षों के बाद भी खाली के खाली ही रहे।

23 जुलाई, 2019 : भ्रामक जीत के ताबूत में आख़िरी कील

23 मई, 2019 को लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस पिछले कई दिनों से नेतृत्व विहीन चल रही है। 138 साल पुरानी इस पार्टी का फिलहाल कोई अध्यक्ष नहीं है। अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे चुके राहुल गांधी ने लोकतंत्र के सबसे बड़े चुनावी समर में मिली करारी शिकस्त की नैतिक ज़िम्मेदारी तो ली, परंतु त्यागपत्र देकर हार के कारणों की पूरी ज़िम्मेदारी लेने की बजाए वे पार्टी के अन्य नेताओं को भी त्यागपत्र का पाठ पढ़ाते दिखाई दिए। पिछलग्गू कांग्रेसियों ने राहुल के बाद त्यागपत्रों की बाढ़ लगा दी, परंतु शीर्ष नेतृत्व ही जब अपरिपक्व हो, तो हार का ठीकरा अधीनस्थ नेताओं पर फोड़ने से कांग्रेस को क्या मिलता। 23 मई, 2019 को मिली हार के बाद राज्यों में भी कांग्रेस में लगातार बिखराव का सिलसिल शुरू हुआ और फिर आया 23 जुलाई, 2019 का वह दिन, जब 23 मई, 2018 को पैदा हुए मोदी पर पहली और बड़ी जीत के भ्रम के ताबूत में आख़िरी कील लग गई। जिस बेंगलुरू में 23 मई, 2018 को कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में मोदी विरोधी एकता के दिखावे का गुब्बारा फूँक मार-मार कर फुलाया गया, वह गुब्बार ठीक 14 महीने बाद 23 जुलाई, 2019 को कुमारस्वामी के त्यागपत्र के साथ पूरी तरह फूट गया। कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के ज़रिए कर्नाटक में भाजपा को सत्ता पर आने से रोकने में मिली जिस सफलता को राहुल ने मील का पत्थर माना था, वह मील का पत्थर राहुल, कांग्रेस और कुमारस्वामी तीनों के लिए बोझ बन कर डूबोने वाला सिद्ध हुआ।

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