भारत से 8,655 किलोमीटर दूर भी गूँज रहा है, ‘गणपति बप्पा मोरया’

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 8 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत में गणेश उत्सव बड़े ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। परंतु क्या आप जानते हैं कि भारत से हज़ारों मील दूर परदेश में भी गणेश उत्सव उतने ही उल्लास और धूमधाम से मनाया जाता है, जितना कि भारत में। आज हम आपको भगवान गणेश के ऐसे ही भक्तों से मिलाने जा रहे हैं, जिनका न तो हिन्दू धर्म से कोई पारंपरिक संबंध है और न ही उनका भारत से सम्बंध है। आपको जान कर हैरानी होगी कि पश्चिमी अफ्रीका के घाना देश, जिसका अर्थ एक लड़ाकू राजा होता है, वहाँ के निवासी भी न सिर्फ हिन्दू धर्म को मानते हैं, अपितु भारत की तरह ही वे भी देवी-देवताओं की विधिवत् पूजा-अर्चना करते हैं। घाना में पिछले 50 वर्षों से भगवान गणपति की भव्य पूजा और मूर्ति विसर्जन की परंपरा चली आ रही है। अफ्रीका में गणेश उत्सव मनाने की परम्परा कहाँ से आई ? वह कौन था जिसने भारत से 8,655 किलोमीटर दूर अफ्रीका में हिन्दू धर्म की अलख जगाई ? इस लेख में हम आपको इन्हीं सब सवालों के उत्तर देंगे।

कौन थे घाना के घनानंद ?

सबसे पहले आपका परिचय कराते हैं, अफ्रीका के प्रथम हिन्दू धर्म प्रचारक स्वामी घनानंद सरस्वती (घाना) से। स्वामी घनानंद ही वह धर्म प्रचारक थे, जो हिन्दू मूल के न होते हुए भी हिन्दू धर्म के स्वामी कहलाए। उन्होंने ही हिन्दुओं की आस्था और धार्मिक गौरव को पश्चिम अफ्रीकी महाद्वीप के घाना देश में ज्योति की भाँति प्रज्वलित और प्रकाशित किया। घनानंद का जन्म घाना के मध्य क्षेत्र में एक सेन्या बेराकू गाँव में 12 सितंबर 1937 को हुआ था। वह एक देशी घानावासी परिवार के सदस्य थे। उनके माता-पिता धर्म परिवर्तन करके ईसाई बन गए थे, परंतु घाना बहुत कम उम्र से ही ब्रह्मांड के रहस्यों में रुचि रखते थे और इसीलिए उन्होंने अपने सवालों का जवाब धार्मिक ग्रंथों में ढूँढना शुरू किया था। इसी दौरान घनानंद सिंधियों के संपर्क में आए। ये सिंधी जन 1947 में भारत के विभाजन के समय घाना में आकर बस गए थे। दरअसल, विभाजन के दौरान लोगों से कहा गया था कि वह भारत और पाकिस्तान में से किसी भी देश में रह सकते हैं। उस समय के हालात देखते हुए हिन्दू धर्म से संबंध रखने वाले सिंधी वंश के कुछ परिवारों ने न भारत को अपना देश माना और न पाकिस्तान को, अपितु वह सिंधी परिवार दक्षिण अफ्रीका के घाना देश में चले गए थे। घाना भारत से 5 महीने पहले ही यानी 6 मार्च 1947 को ही अंग्रेजी हुकूमत की ग़ुलामी की बेड़ियाँ काट चुका था। अफ्रीकी लोगों ने सिंधी परिवार के लोगों का दिल से स्वागत किया और उन्हें घाना में रहने की मंजूरी दी। तभी से पहली बार अफ्रीका के निवासियों का हिन्दू धर्म से परिचय हुआ। धीरे-धीरे हिन्दू धर्म घाना के लोगों में प्रचलित होने लगा। घनानंद की उम्र उस समय मात्र 10 वर्ष थी। वह छोटी-सी उम्र से ही हिन्दू धर्म में रुचि लेने लगे थे। हिन्दू धर्म से आकर्षित घनानंद, भगवान की पूजा-अर्चना में समय बिताने लगे थे। यहीं से अफ्रीका में हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं की पूजा का प्रचलन शुरू हुआ। धीरे-धीरे घाना में सभी देवी-देवता गणेश, शिव-पार्वती और भगवान श्री कृष्ण आदि पूजे जाने लगे।

प्रथम अफ्रीकी हिन्दू मठ की स्थापना

1962 में मात्र 25 वर्ष की आयु में स्वामी घनानंद घाना की राजधानी अकरा चले गए। 24 नवंबर को स्वामी घनानंद डिवाइन मिस्टिक पाथ सोसाइटी का गठन करके ईश्वर-भक्ति में लीन हो गए, परंतु उनका मन सदैव हिन्दू धर्म की गहराइयों को जानने के लिए व्याकुल रहता था। हिन्दू धर्म की ओर झुकाव के कारण स्वामी घनानंद सदैव हिन्दू धर्म के रहस्यों की खोज़ में लगे रहते थे और एक दिन हिन्दू धर्म से जुड़े अपने प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए वह उत्तर भारत चले गए। घनानंद ने 1975 में हिमालय की तलहटी में स्थित ऋषिकेश के डिवाइन लाइफ सोसाइटी के साथ मिल कर हिंदू जीवन पद्धति (सनातन धर्म) का पत्राचार पाठ्यक्रम शुरू किया। इसी दौरान पहली बार घनानंद की मुलाकात भारत के स्वामी कृष्णानंद से हुई। स्वामी कृष्णानंद के व्यक्तित्व से घनानंद इतने प्रभावित हुए कि उनके शिष्य बन गए। स्वामी कृष्णानंद ने स्वामी के रूप में घनानंद को दीक्षा दी। दीक्षा के बाद घनानंद घाना लौट आए। घाना में स्वामी घनानंद सरस्वती ने पाँच नए मंदिरों की स्थापना की, जो एएचएम की आधारशिला बने। स्वामी घनानंद सरस्वती ने 1975 में अफ्रीका के घाना में पहले अफ्रीकी हिन्दू मठ की स्थापना की थी।

हिन्दू धर्म के महान प्रचारक और धर्मगुरू स्वामी घनानंद 18 जनवरी 2016 को दुनिया को अलविदा कह गए। 78 वर्षीय स्वामी घनानंद द्वारा प्रचारित हिन्दू मान्यताएँ आज भी घाना में प्रचलित हैं। 10,000 से अधिक घानावासी हिंदू धर्म का पालन करते हैं, जिनमें से अधिकांश स्वैच्छिक धर्मान्तरित हैं। घाना की राजधानी अकरा में भगवान शिव का सबसे बड़ा मंदिर है, जहाँ हर वर्ष गणेश चतुर्थी, रथ यात्रा, और अन्य हिंदू त्योहार मनाए जाते हैं।

हर वर्ष गणेश चतुर्थी के दिन घाना के निवासी और घाना में रहने वाले हिन्दू समुदाय के लोग भी गणेश स्थापना करते हैं। इसके बाद तीन दिन तक भगवान गणेश की पूजा की जाती है और गणेश मूर्ति को समुद्र में विसर्जित कर दिया जाता है। यहाँ के लोगों की मान्यता है कि समुद्र हर जगह होते हैं और भगवान गणेश समुद्र के माध्यम से सभी पर अपनी कृपा बनाए रखेंगे।

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