आ अब लौट चलें : ‘दादा’ के सीने को ‘लहुलुहान’ करने वाला प्रश्न आज भी क्यों ‘प्रश्न’ ही है ?

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मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 19 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। वैचारिक क्रांति के मंच ‘युवाPRESS’ की ओर से गत 9 अक्टूबर, 2019 आश्विन शुक्ल एकादशी यानी पापांकुशा एकादशी के दिन ‘एकादशी से एकावशेषी’ उप स्तंभ के साथ आरंभ किया गया ‘आ अब लौट चलें’ स्तंभ की आज दूसरी कड़ी की ओर अग्रसर हो रहा है। ‘एकादशी से एकावशेषी’ उप स्तंभ प्रत्येक एकादशी को प्रकाशित होगा, जबकि ‘आ अब लौट चलें’ एक निरंतरिक स्तंभ है, जो समय-समय पर पाठकों को अपने पुरातन-प्राचीन इतिहास (जिसे आधुनिक वैज्ञानिक युग में प्रमाण को ही सत्य मानने वाले लोग MYTHOLOGY यानी पौराणिक मान्यता कह कर झुठलाने का प्रयास करते हैं) से अवगत कराने का प्रयास है। इसी प्रयास के तहत ‘आ अब लौट चलें’ की दूसरी कड़ी में आज हम 99 वर्ष पूर्व भारतीय भूमि पर अवतरित हुए प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु, समाज सुधारक तथा दार्शनिक पाण्डुरंग शास्त्री अठावले के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालेंगे और साथ ही अपने पाठकों को यह संदेश देने का प्रयास करेंगे कि वे अंतरजाल (इंटरनेट) के जाल से थोड़ा बाहर निकले और आंतरिक जाल की ओर प्रयाण करें। यह प्रयाण अंतरजाल में उलझ कर शांति और आनंद पाने का प्रयास करने वालों को वह वास्तविक मूल शांति प्रदान करेगा, जिसकी उन्हें तलाश है। दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति हर कार्य केवल और केवल शांति, संतोष व आनंद के लिए करता है, परंतु वह यह नहीं जानता कि जिस शांति की उसे तलाश है, वह बाहर या बाह्य भौतिक सुखों, संसाधनों और सुविधाओं में नहीं, अपितु उसके स्वयं के भीतर ही है। यही संदेश पाण्डुरंग शास्त्री अठावले का भी था।

‘स्वाध्याय’ परिवार के प्रणेता पाण्डुरंग शास्त्री अठावले, जो अपने अनुयायियों के बीच ‘‘दादा’’ के नाम से प्रसिद्ध थे, का जन्म 19 अक्टूबर, 1920 को मुंबई के पास रोहा में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। परिवार में धार्मिक प्रवृत्तियों की परम्परा थी। विद्वता की इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए अठावले ने संस्कृत भाषा सीखी और सनातन धर्म से जुड़े ग्रंथों वेद-पुराण-उपनिषद्-गीता आदि ग्रंथों के अध्ययन में लग गए। उन्होंने समाज में स्वाध्याय के माध्यम से आत्म चेतना जगाने का आदर्श स्थापित करने की कोशिश की तथा समाज सुधार आंदोलन भी चलाया। अठावले ने युक्तिपूर्वक वेदों, उपनिषदों तथा हिंदू संस्कृति की आध्यात्मिक शक्ति को पुनर्जागृतत किया तथा आधुनिक भारत के सामाजिक रूपांतरण में उस ज्ञान तथा विवेक का प्रयोग सम्भव बनाया। वर्ष 1999 में भारत सरकार ने ‘दादा’ पाण्डुरंग को ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया।

उस ‘बाण प्रश्न’ ने झकझोरा और आरंभ हुआ ‘स्वाध्याय’

परिवार से प्राप्त सनातन धर्म की ज्ञान परम्परा को आगे बढ़ाने का काम कर रहे पाण्डुरंग शास्त्री अठावले ने भारतीय वेद-पुराणों, उपनिषदों, महाभारत-गीता आदि ग्रंथों के इस सार को काफी हद तक समझ लिया था कि मानव जीवन केवल और केवल मोक्ष प्राप्ति के लिए मिला है। भारतीय दर्शन के बारे में अठावले ने अत्यंत गूढ़ अध्ययन कर चुके अठावले का जीवन 1954 में घटी एक घटना ने बदल डाला। उस समय अठावले 34 वर्ष के युवा थे। इसी दौरान अठावले को जापान के शिम्त्सु में आयोजित द्वितीय विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिला। इस सम्मेलन में अठावले ने पूरे विश्व के समक्ष वैदिक ज्ञान और जीवन दर्शन के महत्व पर सारगर्भित व्याख्यान दिया और उसे अपनाने पर बल दिया। इसी सम्मेलन में एक श्रोता ने अठावले से प्रश्न किया, ‘आपके देश में क्या कोई एक भी सम्प्रदाय ऐसा है, जो इन आदर्शों तथा जीवन दर्शन को जीवन व्यवहार में अपनाए हुए है ?’ यह प्रश्न अठावले के सीने में बाण की तरह उतरा और उन्हें लहुलुहान कर गया। 200 वर्षों की अंग्रेजी दासता और पाश्चात्य संस्कृति के आक्रमण के चलते भारत अपनी प्राचीन सनातन-वैदिक धर्म संस्कृति से पहले ही भटक चुका था। जब अठावले जापान में द्वितीय विश्व धर्म सम्मेलन में भाषण देने पहुँचे थे, तब भारतीय स्वतंत्रता को मात्र 7 वर्ष ही हुए थे। ऐसे में विदेशियों की दृष्टि में भारत के प्रति हीनता, निर्धनता और अज्ञानता की भावना थी। यही कारण था कि इस सम्मेलन में इसी कठोर भावना और कटाक्षपूर्ण व्यंग्य के साथ एक विदेशी श्रोता ने अठावले से प्रश्न किया, जिससे अठावले क्षोभ में पड़ गए, क्योंकि वे स्वयं जानते थे कि भारत में तेजी से बदलती युवा पीढ़ी और पाश्चात्य संस्कृति के आक्रमण के चलते पुरातन-प्राचीन-वैदिक संस्कृति के प्रति घोर अवहेलना और अज्ञानता है। इसी कारण अठावले को एक विदेशी श्रोता का यह प्रश्न तीखे बाण की तरह लगा और वे एक ‘संकल्प’ के साथ स्वदेश लौट आए। भारत लौटते ही अठावले ने भारत में भारतीय जीवन की वर्तमान और प्रासंगिक स्थिति पर विचार-विमर्श और चर्चा का सिलसिला प्रारंभ किया और इसके साथ ही ‘स्वाध्याय आंदोलन’ की नींव पड़ी।

तत्वज्ञान से ऊँचा कोई ज्ञान नहीं

पाण्डुरंग शास्त्री अठावले भारतीय दर्शन को भली-भाँति समझ चुके थे। इसीलिए उन्होंने विश्व धर्म सम्मेलन में जो भारतीय दर्शन की बातें रखी थीं, उनसे विमुख हो चुके अपने ही भारत देश के लोगों को पुन: जोड़ने की दिशा में कार्यारंभ किया। अठावले जानते थे कि तत्वज्ञान यानी स्वयं को जानने से ऊँचा, ऊपर या बड़ा कोई और ज्ञान नहीं है। इसीलिए उन्होंने 1956 में तत्व ज्ञान विद्यापीठ की स्थापना की। भारतीय दर्शन वास्तव में कोई धर्म नहीं है, जिसे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, यहूदी, जैन आदि सम्प्रदायों तक सीमित रखा जा सके, अपितु भारतीय दर्शन किसी भी प्रकार की धार्मिक कट्टरता से पूर्णत: मुक्त है और यह समस्त जीवों के कल्याण यानी मोक्ष, मुक्ति, स्वयं-साक्षात्कार, आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर का साक्षात्कार, जीवनमुक्ति, तत्वज्ञान, परमात्म प्राप्ति की ओर ले जाता है। यही बात भारत के लोगों को समझाने के लिए अठावले ने तत्व ज्ञान विद्यापीठ की स्थापना की, जिसमें भारत के आदिकालीन ज्ञान तथा पाश्चात्य ज्ञान दोनों का समन्वय रखा। इसके साथ ही अठावले भारतीय सनातन ज्ञान परम्परा के लिए भारत भ्रमण पर चल पड़े, लोगों से मिले, डॉक्टरों, इंजीनियरों, वक़ीलों, उद्योगपतियों जैसे शिक्षित लोगों को ही नहीं, अपितु निर्धन, निरक्षर व धार्मिक आडंबरों को ही भक्ति समझने वालों तक यह बात पहुँचाई कि वे अपने व्यस्त जीवन से कुछ समय नकाल कर ईश्वर का ध्यान करें तथा भक्ति भाव अपनाएँ, आत्म-चेतना जगाएँ और बाह्य दौड़ त्याग कर स्वयं की ओर यानी भीतर की ओर यात्रा करें।

अठावले बने ‘दादा’ और स्वाध्याय बना आंदोलन

अठावले ने स्वाध्याय के माध्यम से आत्म-चेतना को जागृत करने को अपने जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य बनाया। स्वाध्याय यानी स्वयं को जानने का अभ्यास। धीरे-धीरे अठावले के स्वाध्याय को लोग समझने लगे और यह स्वाध्याय 1958 में एक आंदोलन बन गया, जब अठावले के आह्वान पर उनके अनुयायियों ने गाँव-गाँव घूमकर अठावले का संदेश प्रसारित करते हुए स्वाध्याय की महिमा सबको बतानी शुरू की और उन्होंने अपने गुरु का यह विवेक सबको दिया कि स्वाध्याय के मार्ग में किसी भी धर्म, जाति या स्त्री, पुरुष का कोई भेद नहीं है और धर्म मानव जाति की बराबरी में विश्वास करता है। अठावले के इस स्वाध्याय आंदोलन ने लगातार विकास किया और उसके अनुयायियों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई और पाण्डुरंग अठावले शास्त्री अपने भक्तों के बीच ‘दादा’ (बड़ा भाई) कह कर सम्बोधित किए जाने लगे। 1964 में पोप पॉल चतुर्थ भारत आए और उन्होंने ‘दादा’ से उनके दर्शन को लेकर चर्चा की। स्वाध्याय की महिमा इतनी बढ़ गई कि अठावले के अनुयायियों का स्वाध्याय परिवार बन गया।

सनातन धर्म ने हजारों लोगों का जीवन बदला

‘दादा’ के आंदोलन में समाज सुधार की जबरदस्त शक्ति देखने को मिली। कितने ही लोगों ने मद्यपान छोड़ दिया, जुआ खेलना बंद कर दिया, इससे घर परिवार में पत्नियों को प्रताड़ित करना भी रुका। छोटे-मोटे अपराधों में लिप्त लोग सामुदायिक बेहतरी के कामों में रुचि लेने लगे। पाण्डुरंग अठावले शास्त्री के इस आंदोलन ने एक मनोहारी दृश्य उपस्थित किया और यह दैनिक संस्कृति बन गई। स्थानीय मछुआरे संस्कृत के श्लोक गाते हुए काम कर जाते तथा जितनी भी मछलियाँ मिलतीं, उसमें से ग़रीबों का अंश निकाल कर बाँट देते। उनके लिए उनकी नावें मंदिर की संज्ञा पा गईं। गाँव वालों ने बड़े विस्तार में वृक्षारोपण किया और उन वृक्षों को मंदिर वृक्ष कहा गया। इससे बंजर धरती कुछ समय में हरियाली से भर गई। ‘दादा’ के स्वाध्याय व्यवहार से गाँवों की संस्कृति बदलने लगी। गाँवों में सफाई की चेतना आई। परिवारों के बीच पास-पड़ोस तक में सद्भावना का पुनर्संचार हुआ। बच्चे प्रसन्नचित स्कूल जाने लगे। गाँवों में अस्पृश्यता जैसी भावना खत्म कहा गया और उसकी उपज ज़रूरत मंदों को दिए जाने के लिए रखी गई। यहाँ तक कि विभिन्न धर्मों के पूजा स्थल एक स्थान पर आ गए। पाण्डुरंग अठावले शास्त्री ने गाँव-गाँव में जाकर यह संदेश दिया कि स्वाध्याय का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। इसे दुनिया की मुश्किलें हल करने की चाबी नहीं समझा जाना चाहिए, स्वाध्याय के जरिए तो हम बस, प्रेम, पारम्परिक, शांति तथा निस्वार्थ भाव की संस्कृति फैला रहे हैं। पाण्डुरंग ईश्वर को सर्वविद्यमान होने का संदेश देते हैं तथा आध्यात्मिक एकता उनका अभिष्ट है। वह पुरातन कालीन हिंदू ज्ञान सम्पदा की बात तथा उसका महत्त्व उसी श्रद्धा से बताते हैं, जिससे वह पाश्चात्य विचारकों का जिक्र करते हैं। वह अपने श्रोताओं को खुद से मुक्त करने की प्रेरणा देते हैं। वह कहते हैं, स्वबंधन जटिल है।

राजकोट में विशाल सभा, पुरस्कार व सम्मान

‘दादा’ पाण्डुरंग को वर्ष 1988 में ‘महात्मा गांधी पुरस्कार’ दिया गया। 19 मार्च, 1995 में उन्होंने गुजरात के राजकोट में अपने भक्तों की विशाल जनसभा को सम्बोधित किया। वेदों और उपनिषदों में भारत की अकूत ज्ञान सम्पदा निहित है तथा हिंदू संस्कृति उससे इस सीमा तक समृद्ध है कि उसके माध्यम से आधुनिक भारत का निर्माण किया जा सकता है। अठावले पाण्डुरंग शास्त्री ने इस तथ्य को समझा तथा उन कारणों की खोज की, जिनको उन ग्रंथों की सामर्थ्य की अपेक्षा के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। अठावले ने युक्तिपूर्वक वेदों, उपनिषदों तथा हिंदू संस्कृति की आध्यात्मिक शक्ति को पुनर्जाग्रत किया तथा आधुनिक भारत के सामाजिक रूपांतरण में उस ज्ञान तथा विवेक का प्रयोग सम्भव बनाया। अठावले पाण्डुरंग शास्त्री को सामुदायिक नेतृत्व के लिए 1999 का मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया। वर्ष 1999 में ही भारत सरकार ने ‘दादा’ पाण्डुरंग को ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया था। सन 1997 में उन्हें धर्म के क्षेत्र में उन्नति के लिये ‘टेम्पल्टन पुरस्कार’ (Templton Prize) से सम्मानित किया गया। ‘दादा’ पाण्डुरंग शास्त्री अठावले 25 अक्टूबर, 2003 को मुम्बई में इस संसार से अंतर्ध्यान हो गए।

‘दादा’ को लहुलुहान करने वाला प्रश्न आज भी प्रश्न क्यों ?

अब शीर्षक पर आते हैं। 1954 में दादा को एक विदेशी श्रोता के जिस प्रश्न ने लहुलुहान किया था, वह प्रश्न तो आज आधुनिक भारत में और भी विकराल होकर यक्षप्रश्न बन चुका है, क्योंकि आज का भारत विशेषकर युवा पीढ़ी न तो हमारे पुरातन-प्राचीन इतिहास को जानती है और न ही जानने में दिलचस्पी रखती है। इंटरनेट, मोबाइल, वॉट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम के इस युग में विज्ञान की ओर से दी गई सुविधाओं को ही सुख और शांति समझने वाली आज की युवा पीढ़ी केवल और केवल बाह्य भौतिक दौड़ लगा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अक्सर कहते हैं, ‘जो अपना इतिहास नहीं जानते, वे भूगोल नहीं बदल सकते।’ यह बात मोदी इसलिए इतनी सटीकता से कह सकते हैं, क्योंकि वे न केवल भारत के भव्य व गौरवशाली प्राचीन-पुरातन इतिहास से अवगत हैं, अपितु अपने जीवन, व्यवहार व आचरण में भी इसे आत्मसात् करते हैं। मोदी ने अपना यह महावाक्य सत्य भी सिद्ध कर दिखाया, जब उन्होंने धारा 370 के इतिहास जानते हुए उसे हटा कर जम्मू-कश्मीर का भूगोल बदल डाला। प्रश्न यह उठता है कि आज की युवा पीढ़ी स्वयं की ओर कब प्रयाम करेगी ? अठावले ने तो अपने जीवनकाल में जितने संभव थे, प्रयास किए, परंतु आज की युवा पीढ़ी को क्या हो गया है ? क्यों उसे केवल मुग़लों का इतिहास पता है, जबकि वे उससे भी पुरातन-प्राचीन सनातन धर्म, वैदिक ज्ञान परम्परा, आत्म-ज्ञान, तत्व-ज्ञान जैसे शब्दों से अनभिज्ञ है ? अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। कुछ समय पूर्व ही कौन बनेगा करोड़पति (KBC) में आईं बॉलीवुड अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा का ही उदाहरण ले लीजिए, जो रामायण से जुड़े इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकी थीं कि हनुमान संजीवनी बूटी किसके लिए लाए थे ? सोनाक्षी, जिनका घर-परिवार सब कुछ रामायण और उसके पात्रों से जुड़ा हुआ है, जब इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकीं, तो इसके लिए उत्तरदायी कौन है ? वास्तव में हमारी शिक्षा पद्धति ही सबसे बड़ी उत्तरदायी है, जिसमें इतिहास को प्रमाणों की सीमाओं में बांध दिया गया है। इतना ही नहीं, कुछ संकीर्ण बुद्धिजीवियों ने हमारी शिक्षा पद्धति से हमारे कई गौरवशाली इतिहास के पन्नों को स्थान देने में बाधा डाली और सरकारें भी मौन रहीं।

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