विशुद्ध मन का स्वरूप ही कृष्ण हैं- श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज

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मन ही कृष्ण हैं। मन में कृष्ण हैं ये अलग बात है। विशुद्ध मन का स्वरूप ही कृष्ण हैं। जिस क्षण भगवान की लीला चिंतन करने से सत्संग के द्वारा जब तृष्णायुक्त भक्ति प्राप्त होती है जो प्रेमलक्षणाभक्ति है उत्साह और अभिप्सा से युक्त भक्ति है। केवल हम भक्त हैं इस बात से नहीं जहाँ सेवा की इच्छा हो। कभी जाके दर्शन करें कभी माला बनाई जाय। श्रीठाकुरजी को प्रसन्न करने की तीव्र इच्छा। भगवत् प्राप्ति कि तीव्र तृष्णा से युक्त भक्ति। उसके द्वारा चित्त की विशुद्धता स्थापित होती है। उस विशुद्ध मन में विशुद्ध चित्त में उस तत्व का स्वतः प्राकट्य हो जाता है।

स्वरूप को मिलना लाना ये सब अलग बात है स्वरूप को पाना ये अलग बात है। किसी के द्वारा दिया जा सकता है वो मिलना है कहीं जाके खरीदा जा सकता है वो लेना है और स्वतः रूप से प्राप्त कर लेना स्वप्न देकर गोविन्ददेव जी ईशारा कर दें मैं यहाँ बेठा हूँ।

एक दिन भाव से विह्वल होकर अनन्त अश्रुओं से आँखों से अनन्त अश्रुओं का विगलन श्रीपाद को ऐसे विप्रलम्भ को प्रदान करता है कि रोते-रोते श्रीपाद जब सबेरे उठते हैं तो देखते हैं शालिग्राम शिलोद्भूत श्रीराधारमणलाल प्रकट हो गए हैं। ये कोई सामान्य बात नहीं है।

किसी ने दिए नहीं कहीं से खरीदे नहीं गए प्रह्लाद की भक्ति ने खम्बा फाड़ कर नृसिंह प्रगट कर दिए। ये कैसी दिव्यता है। जिस क्षण हृदय विशुद्ध हो जाएगा उसपर चढ़े मल के पर्दे हट जाएँगे तब अज्ञान्तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनसलाकया।।

श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी पाद बताते नहीं हैं दिखाते हैं। किसी सेवायत से पूछो भगवान कौन हैं? बोले- इधर आना अभी पर्दा खोलता हूँ देख सामने बैठै हैं। कोई लम्बी बात नहीं है। सामने बैठे है लीला पुरुषोत्तम है। मूड में आ जाए तो किसी को दाँत दिखाए कभी आँख टेढ़ी कर ले कभी लकुटी इधर कर ले। आप कहोगे बस इतनी सी लीला ही? बस इतनी ही बहुत है ज्यादा कर दी तो प्रलय आ जाएगी। यही पच जाय।

अभी इसी पर भी बहुतों को सन्देह हो सकता है। जब तक कोई विदेह नहीं हुआ तब तक सन्देह खड़े रहते हैं।
अगर विग्रह की सजीवता उसकी स्पष्टता नहीं है फिर उसमें ब्रह्मता का अनुभव कैसे होगा? इसलिए वो हमारी तरह उठे, बैठे, चले, खड़ा हो ये तो मात्र उसकी सजीवता है ये गुण तो जीव का है। वो न हिले उससे सब हिले, वो न चले उससे सब चले, वो न बोले उससे सब बोले, वो न सुने उससे सब सुने ये उसका ब्रह्म गुण है। ये उसकी ऐश्वर्यता है।
एकौ साधे सब सधै।। राधारमण जी सब लीला सम्पादित कर देते हैं।
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।

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Life · News

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