नागरिकता संशोधन बिल पर सुलगते पूर्वोत्तर की आग को ऐसे बुझाएगी मोदी सरकार

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 12 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। नागरिकता संशोधन बिल (CITIZENSHIP AMENDMENT BILL) संसद के दोनों सदनों से पारित हो जाने के साथ नरेन्द्र मोदी सरकार (NARENDRA MODI GOVERNMENT) का एक और अत्यंत महत्वपूर्ण काम पूरा हो गया है, जिससे पीएम मोदी और उनके शाह यानी गृह मंत्री अमित शाह (HOME MINISTER AMIT SHAH) ने राहत की साँस ली है। हालाँकि इस बिल को लेकर पूर्वोत्तर (NORTH-EAST) में विशेष कर असम में हिंसक विरोध प्रदर्शन (VIOLENT PROTESTS IN ASSAM) हो रहा है। दूसरी तरफ इसी असम की राजधानी गुवाहाटी (GUWAHATI) में 15 दिसंबर रविवार को पीएम नरेन्द्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे (SHINZO ABE) के बीच शिखर सम्मेलन (SUMMIT) भी आयोजित होना है। ऐसे में अब केन्द्र सरकार के समक्ष असम के मूल निवासियों को बिना कोई सख्ती बरते नरमी से समझाने और उनके आंदोलन को शांतिपूर्वक शांत करने की बड़ी चुनौती है। इतना ही नहीं, यह काम भी सरकार को एक-दो दिन के भीतर ही पूरा करना होगा। अन्यथा हिंसक प्रदर्शनों के बीच शिखर सम्मेलन नहीं हो पायेगा और सरकार को इसकी जगह बदलनी पड़ जाएगी। असम सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में ही इस बिल को लेकर भ्राँतियाँ नहीं हैं। इस बिल को लेकर पूरे देश में भी भ्रम का माहौल है, विशेष कर अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम समुदाय में। इसलिये अब सरकार देश की जनता को इस बिल के निहितार्थ के बारे में विस्तार से समझाने के लिये देश व्यापी जागरूकता अभियान भी शुरू करने जा रही है।

असम में कौन और क्यों कर रहा है विरोध ?

असम के मूल निवासी नागरिकता संशोधन बिल के विरोध में हिंसक प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे हैं। इस प्रदर्शन के कारण राज्य के 33 में से 7 जिलों में हालात तनावपूर्ण हैं और प्रदेश में कई ट्रेनों को भी रद्द करना पड़ा है। हिंसा के चलते प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित रखने के लिये स्थानीय पुलिस के अलावा उसकी मदद के लिये सेना को भी तैनात किया गया है। प्रदर्शनकारियों की ओर से कहा जा रहा है कि यह बिल उनके मूलाधिकारों पर चोट करने वाला है। यह बिल असम अकॉर्ड यानी असम समझौते का भी उल्लंघन करता है। दरअसल, 1979 में असम में हुए लोक सभा के उपचुनाव के दौरान मंगलदोई सीट पर मतदाताओं की संख्या में अत्याधिक बढ़ोतरी हो गई थी। जाँच करने पर पता चला था कि अवैध रूप से प्रदेश में घुसपैठ करने वाले बांग्लादेशियों के कारण ऐसा हुआ था। इसके बाद असम के मूल निवासियों ने अवैध घुसपैठ के विरुद्ध बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया, जिसे दबाने के लिये सख्ती बरती गई तो आंदोलन और हिंसक हो गया था। यह प्रदर्शन और विरोध 6 साल तक चलता रहा, जिसके दौरान 885 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद केन्द्र में सत्तारूढ़ तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने 1985 में असम अकॉर्ड यानी असम समझौता करके इस आंदोलन को शांत किया था। इस समझौते में कहा गया था कि 25 मार्च 1971 के बाद असम में आये बांग्लादेशी घुसपैठियों को शरणार्थी नहीं माना जाएगा और उन्हें असम में या देश में नहीं रहने दिया जाएगा। अर्थात् देश से निकाल दिया जाएगा। इसी प्रकार इस समझौते में देश के अन्य राज्यों से असम में आने वाले लोगों के लिये 1951 की डेडलाइन तय की गई थी। जबकि नये नागरिकता संशोधन बिल में बांग्लादेश से आये घुसपैठियों के लिये नई डेडलाइन 2014 सुनिश्चित की गई है। यही वह प्रावधान है जिसका असम के मूल निवासी विरोध कर रहे हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि घुसपैठियों के कारण उनकी अपनी मूल सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान तथा धरोहरों (विरासतों) के संरक्षण और संवर्धन की संवैधानिक, कार्यकारी और प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होती है। समझौते में कहा गया था कि असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (NRC) लागू किया जाएगा, ताकि विदेशी नागरिकों की पहचान की जा सके और उन्हें असम सहित देश से बाहर निकाला जा सके। हालाँकि इस समझौते के 35 साल तक एनआरसी पर कोई अमल नहीं हुआ। जब 31 अगस्त-2019 को असम में एनआरसी पर काम हुआ तो 40 लाख लोग नागरिकता से बाहर हो गये। जो लोग बाहर हुए उनमें अधिकांश हिंदू और मूल आदिवासी समुदाय के लोग थे। केन्द्र सरकार इन हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिये यह बिल लेकर आई है, परंतु असम अब और शरणार्थियों का बोझा ढोने के लिये तैयार नहीं है।

आंदोलन को शांत करने की चुनौती

ऐसे में केन्द्र सरकार के समक्ष असम के मूल निवासियों को समझाने की बड़ी चुनौती है। सरकार इन लोगों पर सख्ती बरतने के मूड में भी नहीं है, क्योंकि जानती है कि वे अपनी जगह सही हैं। ऐसे में नरमी बरतते हुए ही उनके आंदोलन को शांत करना आसान नहीं है। इसलिये प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल (NSA AJIT DOVAL) ने अब इसके लिये मोर्चा सँभाल लिया है। पीएमओ के अधिकारी असम के हालात की पल-पल की जानकारी ले रहे हैं और उन्होंने असम सरकार से भी हर घण्टे राज्य के अलग-अलग हिस्सों से मिल रही फीडबैक के बारे में पीएमओ को अपडेट करने के लिये कहा है। अजित डोभाल भी सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर बैठकें कर रहे हैं। पीएमओ और अजित डोभाल तब भी सक्रिय रहे जब नागरिकता संशोधन बिल लोकसभा और राज्य सभा में पेश किया गया और उस पर दोनों सदनों में बहस हो रही थी। संसद के बाहर भी देश में विभिन्न स्थलों पर बिल के विरोध में प्रदर्शन हो रहे थे।

मोदी-आबे के शिखर सम्मेलन पर सवाल

एक तरफ असम में लोग नागरिकता संशोधन बिल को लेकर हिंसक तथा उग्र विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। दूसरी ओर गुवाहाटी में आगामी 15 दिसंबर रविवार को पीएम नरेन्द्र मोदी का जापान के पीएम शिंजो आबे के साथ शिखर सम्मेलन का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम है, जिसके लिये पूरे गुवाहाटी शहर को सजाया जा रहा है। हालाँकि विरोध प्रदर्शन के कारण इस शिखर सम्मेलन को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। पीएमओ और अजित डोभाल पर एक-दो दिन में ही आंदोलनों को शांतिपूर्वक समाप्त करने की जिम्मेदारी है। यदि शीघ्र ही वे यह काम नहीं कर पाये तो हिंसक प्रदर्शनों के बीच शिखर सम्मेलन होने से रहा और फिर सरकार को इसे दिल्ली अथवा भुवनेश्वर में शिफ्ट करने के प्लान बी पर अमल करना पड़ेगा।

CAB को लेकर देश व्यापी जागरुकता अभियान चलाया जाएगा

वैसे सरकार के समक्ष केवल असम के नागरिकों को समझाने की ही नहीं, अपितु देश की भ्रमित जनता को भी विश्वास में लेने की जरूरत महसूस हो रही है। सरकार का मानना है कि नागरिकता बिल को लेकर पूरे देश में और विशेष कर एक समुदाय विशेष में कुछ भ्राँतियाँ या तो हैं अथवा फैलाई जा रही हैं। इसलिये सरकार अब आगामी दिनों में एक देश व्यापी जागरुकता अभियान शुरू करेगी, जिसके तहत देशवासियों को इस बिल के वास्तविक उद्देश्यों के बारे में जानकारी दी जाएगी और लोगों के भ्रम को दूर किया जाएगा। सूत्रों के अनुसार इस अभियान की तमाम तैयारियाँ भी पूरी कर ली गई हैं।

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