20 जून, 1985 : जब ‘माधव’ की बेड़ियाँ भी नहीं रोक सकीं जगन्नाथ को और शासन का ‘अनुशासन’ तोड़ शान से निकली 108वीं रथयात्रा !

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 3 जुलाई, 2019 (YUVAPRESS)। अहमदाबाद की ऐतिहासिक जगन्नाथ रथयात्रा के साथ कई रोचक इतिहास जुड़े हुए हैं। ऐसे ही एक इतिहास के बारे में आज मैं आपको बताने जा रहा हूँ, जिसमें हर बार की तरह फिर एक बार यह सिद्ध हुआ था कि इस संसार में ईश्वर से बड़ी शक्ति कोई नहीं है। अगर ईश्वर से बड़ी शक्ति मानव शक्ति होती, तो अहमदाबाद में आगामी 4 जुलाई को निकलने वाली रथयात्रा का क्रम 142वाँ नहीं, अपितु 141वाँ होता, परंतु ऐसा नहीं है। अहमदाबाद में 2 जुलाई 1878 को निकली प्रथम रथयात्रा से लेकर अब तक अखंड रूप से हर वर्ष अषाढ़ी दूज को रथयात्रा निकलती है और इसी क्रम में गुरुवार को लगातार 142वीं बार जगन्नाथ रथयात्रा निकलने वाली है।

अहमदाबाद में साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से निकलने वाली भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की रथयात्रा 1945 (67वीं रथयात्रा) तक तो अवार गति से और शांतिपूर्ण तथा साम्प्रदायिक सौहार्द-सद्भाव के साथ निकलती रही, परंतु 2 जुलाई, 1946 को निकली 68वीं रथयात्रा पर हिंसा के दाग़ लग गए, क्योंकि देश धर्माधारित विभाजन की आग में झुलस रहा था, जिसके चलते अहमदाबाद का साम्प्रदायिक तानाबाना भंग हो चुका था। इस रथयात्रा में वसंत-रजब नामक दो नवयुवकों को अपना बलिदान तक देना पड़ गया। 1946 से आरंभ हुई रथयात्रा में साम्प्रदायिक दंगों का सिलसिला फिर लगातार वर्ष 2001 तक जारी रहा। कभी बड़े दंगे, तो कभी छिटपुट घटनाएँ होती रहीं। 1992 में तो बुलेटप्रूफ रथों में भगवान जगन्नाथ को नगर परिभ्रमण के लिए निकलना पड़ा। हाँ, जब से गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने सत्ता की कमान संभाली, तब से यानी 2002 से लेकर 2013 तक और उसके बाद भी लगातार रथयात्रा शांतिपूर्वक निकल रही है।

शासन की ‘कायरता’ से संकट में पड़ी परम्परा

बात वर्ष 1985 की है। गुजरात में कांग्रेस का शासन था। मुख्यमंत्री थे माधवसिंह सोलंकी। इसी दौरान अहमदाबाद सहित समूचे गुजरात में आरक्षण विरोधी आंदोलन आरंभ हो गया और यह आंदोलन कब साम्प्रदायिक दंगों में परिवर्तित हो गया, सरकार को पता ही नहीं चला। दंगों का मुख्य केन्द्रबिंदु अहमदाबाद ही था। साम्प्रदायिक दंगों की आग के बीच अषाढ़ी दूज का दिन भी निकट आने लगा, जब अहमदाबाद में जमालपुर स्थित जगन्नाथ मंदिर में महंत रामहर्षदास महाराज के नेतृत्व में 108वीं रथयात्रा की तैयारियाँ आरंभ हो गईं, परंतु शहर के बिगड़े हुए हालात को देखते हुए गांधीनगर में बैठी माधवसिंह सोलंकी सरकार, उनकी पुलिस और प्रशासन जहाँ बहुसंख्यकों की आस्था के पर्व रथयात्रा को सुरक्षा प्रदान करने की गारंटी देने को तैयार नहीं था, वहीं मंदिर प्रशासन 107 वर्षों से चली आ रही अक्षुण्ण और अखंड परम्परा को तोड़ने को तैयार नहीं था। शासन की कायरता के कारण अहमदाबाद की रथयात्रा की ऐतिहासिक परम्परा पर संकट मंडराने लगा।

‘माधव’ का कर्फ्यू, पर जगन्नाथ अडिग

1985 में जगन्नाथ रथयात्रा 20 जून को निकलने वाली थी। गांधीनगर में बैठी माधवसिंह सोलंकी सरकार ने रथयात्रा से ऐन पहले पूरे अहमदाबाद महानगर में कर्फ्यू लगा दिया। शहर के अशांत माहौल को देखते हुए सरकार की सलाह पर मंदिर प्रशासन ने एक बार तो यह मान लिया कि इस वर्ष 108वीं रथयात्रा नहीं निकाली जाएगी, परंतु महंत रामहर्षदास महाराज व्याकुल हो उठे और सोचने लगे, ‘भगवान जगन्नाथजी तो सबका कल्याण करने वाले हैं। भक्तों को दर्शन देने के लिए नगर भ्रमण को जाना चाहते हैं, उनके दु:ख-दर्द दूर करने के लिए निज मंदिर से नगर भ्रमण को निकलते हैं।’ महंत को पिछली दो-तीन रातों से नींद नहीं आ रही थी। 19 जून, 1985 को जगन्नाथ मंदिर के प्रासक महेन्द्र झा महंत की वेदना समझ गए। झा सरकार से बातचीत करने के लिए गांधीनगर गए। उन्होंने गृह मंत्री के साथ बैठक की। काफी समझाने के बावजूद गृह मंत्री रथयात्रा को अनुमति देने पर सहत नहीं हुए। महेन्द्र झा खाली हाथ मंदिर लौटे। इस पर महंत रामहर्षदासजी महाराज ने कहा, ‘गांधीनगर में विराजित सरकार से कहीं बड़ी श्री जगन्नाथजी की सरकार है। सग्र जगत के नाथ को अपने भक्तों से मिलने नगर यात्रा पर निकलना होगा, तो जगत की कोई भी शक्ति उन्हें रोक नहीं सकेगी। महेन्द्र, कल (20 जून, 1985) सुबह नियमानुसार भगवान जगन्नाथ, दाऊ बलराम और बहन सुभद्रा की रथयात्रा अवश्य निकलेगी। जा, हमेशा की तरह तैयारियाँ शुरू कर दे। यह मेरा नहीं, अपितु भगवान श्री जगन्नाथ का आदेश है।’

सरकारी की घेराबंदी पर भारी पड़े जगन्नाथ के गजराज

इधर मंदिर प्रशासन ने रथयात्रा निकालने के निर्णय की घोषणा की, उधर सरकार ने पूरे जगन्नाथ मंदिर की घेराबंदी कर दी। मंदिर के बाहर आसपास पूरा इलाका छावनी में बदल गया। अर्धसैनिक बलों की टुकिड़याँ तैनात कर दी गईं। सभी के मन में प्रश्न गूंज रहे थे कि अब क्या होगा ? रथयात्रा निकलेगी या नहीं ? सरकार रथयात्रा रोकेगी तो ? सरकार बल प्रयोग कर रथयात्रा महोत्सव पर पानी तो नहीं फेर देगी ? अषाढ़ी दूज यानी 20 जून, 1985 को सुबह चार बजे नियमानुसार मंगला आरती आदि विधि-विधान हुए और सात बजे रथों में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को विराजित किया गया। जगन्नाथजी ने हंत का आर्तनाद सुन लिया। रथ पर प्रतिष्ठा पूर् होते ही वहाँ उपस्थित हाथियों ने अपने दंतशूल से रथों को खींच कर मंदिर परिसर के बाहर ला खड़ा किया। इस अद्भुत दृश्य को मंदिर की घेराबंदी किए बैठे पुलिस अधिकारी, दर्शनार्थी और सेवक आदि दिग्मूढ़ बने देखते ही रह गए। गजराजों ने रथों के मार्ग में बाधा बनी पुलिस की दो जीपों को अपनी सूँढ़ से खिलौने की तरह घुमा कर दूर धकेल दिया। जगन्नाथ की कृपा से कोई जीप को नुकसान नहीं हुआ और रथयात्रा मंदिर परिसर से अपने परम्परागत मार्ग की ओर चल निकली। जब भगवान जगन्नाथ और उनके गजाननों के आगे सरकारी घेराबंदी की एक न चली, तो अंतत: माधव सरकार भी जगन्नाथ सरकार के आगे झुक गई और 108वीं रथयात्रा आन-बान-शान के साथ सम्पन्न हुई।

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