चराडवा के हरगोविंद कैसे बने डॉ. एच. एल. त्रिवेदी से ‘फादर ऑफ किडनी ट्रांसप्लांटेशन’ ?

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 2 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। जाने माने गुर्दा (किडनी) सर्जन तथा अहमदाबाद में किडनी यूनिवर्सिटी-अस्पताल के संस्थापक पद्मश्री डॉ. एच. एल. त्रिवेदी का बुधवार को निधन हो गया। वे 87 वर्ष के थे और देश व दुनिया में गुर्दा प्रत्यारोपण के पितामह कहलाते थे। डॉ. त्रिवेदी पिछले एक महीने से बीमार चल रहे थे और अहमदाबाद के सिविल अस्पताल परिसर में उन्हीं के द्वारा संस्थापित इंस्टीट्यूट ऑफ किडनी डिसीज़ एंड रिसर्च सेंटर (IKDRC) में डायालिसिस पर थे। यहीं पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका पार्थिव शरीर भी गुरुवार को सुबह 8 से 11 बजे के दौरान इसी आईकेडीआरसी परिसर में अंतिम दर्शन के लिये रखा जाएगा। इसके बाद दोपहर 2 बजे दूधेश्वर श्मशान गृह में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

कैसे एक डॉक्टर से बने किंग ऑफ किडनी ट्रांसप्लांटेशन ?

गुजरात के झालावाड़ यानी सुरेन्द्र नगर जिले की हलवद तहसील के चराडवा गाँव में 31 अगस्त 1932 को जन्मे हरगोविंद लक्ष्मीशंकर त्रिवेदी की प्रारंभिक शिक्षा जिले के वांकानेर के लुणसर में हुई। इसके बाद राजकोट तथा मेंगलुरु में अध्ययन करने के बाद अहमदाबाद के बी. जे. मेडिकल कॉलेज से मेडिकल की शिक्षा ग्रहण की थी। 1960 में इसी बी. जे. मेडिकल कॉलेज में अध्यापक के तौर पर करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद वे 1970 में विदेश चले गये थे। अमेरिका के क्लीवलैंड क्लिनिक में दो वर्ष की हायर ट्रेनिंग लेने के बाद उन्होंने केनेडा के हेमिल्टन शहर में 8 साल तक डॉक्टर के रूप में प्रेक्टिस की। अमेरिका, जापान, रशिया, स्वीडन, भारत और यूरोपीय देशों में मेडिकल क्षेत्र पर उनके शोध पत्रों को काफी गंभीरता से लिया जाता था। इस बीच वे अक्सर अपनी जन्म भूमि गुजरात आते-जाते थे। तभी उनके अंदर देश भक्ति की भावना जागृत हुई और 1990 में विदेश से लौटने के बाद उन्होंने अहमदाबाद के सिविल अस्पताल परिसर में किडनी यूनिवर्सिटी की स्थापना की थी। 1992 से इस अस्पताल में किडनी के ऑपरेशन शुरू किये थे। वे किडनी के रोगों से ग्रसित रोगियों के भी भीष्म इसलिये कहलाते थे, क्योंकि उनके द्वारा संस्थापित यह अस्पताल लाखों गरीब रोगियों का मुफ्त में इलाज करने वाला विश्व का एक मात्र अस्पताल है। डॉ. त्रिवेदी ने किडनी के विविध रोगों से पीड़ित हजारों रोगियों का उपचार करके उन्हें नवजीवन प्रदान किया था। डॉ. त्रिवेदी ने अपना पूरा जीवन किडनी के रोगों से पीड़ित लोगों की सेवा करते हुए बिताया था।

गुर्दा प्रत्यारोपण के 5 हजार से अधिक ऑपरेशन

वे गुजरात ही नहीं, अपितु विश्व में किडनी ट्रांसप्लांटेशन के पिता कहलाते हैं। उनके खुद के नाम 400 से अधिक सफलतम गुर्दा प्रत्यारोपण का रिकॉर्ड है। इसके अलावा उनके इस अस्पताल में 5 हजार से भी अधिक किडनी रोगियों का गुर्दा प्रत्यारोपण हुआ है। इस अस्पताल की एक और खासियत यह है कि यहाँ 2013 से रोबोट की मदद से किडनी ट्रांसप्लांट का ऑपरेशन किया जाता है। 400 से अधिक ऑपरेशन रोबोट की मदद से भी किये जा चुके हैं। स्टेमसेल की मदद से ट्रांसप्लांट व ऑपरेशन के बाद दवा की आवश्यकता नहीं होने सम्बंधी उनके संशोधन मेडिकल क्षेत्र में खूब चर्चित रहे। इस तरह के ऑपरेशन के कारण भी उनके अस्पताल को विश्व स्तर पर ख्याति मिली है।

उपलब्धियों के लिये मिला पद्मश्री सम्मान

उनकी इन्हीं उपलब्धियों के कारण 8 अप्रैल 2015 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन में उन्हें देश के चतुर्थ सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया था। इसके अलावा डॉ. त्रिवेदी को अवतार फाउण्डेशन की ओर से 28 मई 2017 को ‘गुरु द्रोणाचार्य अवार्ड’ से सम्मानित किया गया था। श्री चौवीसी मोढ़ ब्राह्मण समाज, अहमदाबाद की ओर से भी उन्हें 4 नवंबर 2017 को सम्मानित किया गया था। डॉ. त्रिवेदी वयोवृद्ध अवस्था में भी अत्यंत सक्रिय थे और नियमित रूप से अस्पताल आने के साथ-साथ रोगियों की जाँच भी करते थे। हालाँकि बढ़ती उम्र के साथ-साथ उनके मस्तिष्क के ज्ञान तंतु सूख गये थे। इसके अलावा वे पार्किन्सन्स नामक रोग के साथ ही यकृत (लीवर) की समस्या से भी ग्रस्त थे। वे एक भारतीय नेफ्रोलॉजिस्ट थे और उपरोक्त जी. आर. दोषी एंड के. एम. मेहता इंस्टीट्यूट ऑफ किडनी डिसीज़ एंड रिसर्च सेंटर के निदेशक व बी. जे. मेडिकल कॉलेज के फैकल्टी के पूर्व सदस्य थे। पिछले लगभग 2 वर्ष से वे बीमार चल रहे थे। जुलाई 2017 में उन्हें आईकेडीआरसी में भर्ती भी किया गया था, तब कुछ समय के लिये उन्हें वेंटीलेटर पर भी रखा गया था। पिछले 1 महीने से वे आईकेडीआरसी में ही उपचाराधीन थे और डायालिसिस पर थे।

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