पाकिस्तान ने भारतीय सिखों के लिए खोले 500 वर्ष पुराने इस गुरुद्वारे के द्वार

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 2 जुलाई 2019 (YUVAPRESS)। एक तरफ भारतीय सिखों के लिये करतारपुर कॉरिडोर खोलने को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच पेंच फँसा हुआ है । इसी बीच पाकिस्तान ने सियालकोट में स्थित 500 वर्ष पुराने एक प्राचीन गुरुद्वारे के द्वार भारतीय सिखों के लिये खोल कर पॉजिटिव अप्रोच दिखाया है।

भारतीय सिखों के लिये पाकिस्तान में खुले बाबे दी बेर के द्वार

आतंकवाद के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण सम्बंधों के बीच पाकिस्तान से एक अच्छी खबर आई है । पाकिस्तान ने उसके पंजाब प्रांत के सियालकोट में स्थित 16वीं सदी में बने प्राचीन गुरुद्वारा ‘बाबे दी बेर’ के द्वार भारतीय सिखों के लिये खोल दिये हैं । पाकिस्तान में लाहौर से लगभग 140 कि.मी. दूर स्थित सियालकोट शहर में स्थित इस प्राचीन गुरुद्वारा में देश-विदेश के भारतीयों को जाने की अनुमति थी, परंतु भारतीय सिखों को ही जाने की अनुमति नहीं थी।

अब खबर है कि पंजाब के गवर्नर मोहम्मद सरवर ने प्रांत के औकाफ विभाग को भारतीय सिख तीर्थयात्रियों को भी बाबे दी बेर गुरुद्वारे में आने वाले तीर्थयात्रियों की सूची में शामिल करने का निर्देश दिया । इसके बाद अब यह गुरुद्वारा भारतीय सिक्ख तीर्थयात्रियों के लिये भी खुल गया है।

16वीं सदी में सरदार नत्था सिंह ने बनवाया था गुरुद्वारा

उल्लेखनीय है कि सिख परंपरानुसार सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानकदेव जब 16वीं शताब्दी में कश्मीर से सियालकोट गये थे, तब वह वहाँ एक बेरी के वृक्ष के नीचे विश्राम करने के लिये रुके थे । यहाँ उन्होंने अपने एक शिष्य को जीवन के बारे में महत्वपूर्ण शिक्षा देने के लिये उसे 2 पैसे देकर एक पैसे का सत्य और एक पैसे का झूठ खरीदने के लिये भेजा था। शिष्य एक खत्री की दुकान पर गया, यह खत्री भी गुरु नानक का ही शिष्य था। जब नानकदेव के शिष्य ने खत्री को पैसे देकर एक पैसे का सत्य और एक पैसे का झूठ देने के लिये कहा तो खत्री ने उससे पूछा कि यह सत्य और झूठ खरीदने के लिये किसने भेजा है ? नानकदेव के शिष्य ने जब खत्री को बताया कि उसके गुरु नानकदेव वहाँ आए हुए हैं और बेरी के वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे हैं, उन्होंने ही उसे यह खरीदने के लिये भेजा है तो खत्री समझ गया । उसने दो अलग-अलग कागज़ लिये और एक कागज पर लिखा ‘जीवन झूठ है’ तथा दूसरे कागज़ पर लिखा ‘मृत्यु सत्य है ।’ दोनों कागज़ शिष्य को देकर कहा कि यह लो एक सत्य है और झूठ है । शिष्य ने जब दोनों कागज़ पढ़े तो उसे गुरुदेव की वाणी का तत्वार्थ ज्ञात हुआ और उसे जीवन-मृत्यु के सत्य का बोध हो गया । इसके बाद उसी शिष्य ने गुरुनानक की स्मृति में उस बेरी के वृक्ष के समीप बाबे दी बेर गुरुद्वारे का निर्माण कराया । गुरु नानकदेव के इस शिष्य का नाम था सरदार नत्था सिंह । सरदार नत्था सिंह का उद्देश्य था कि इस गुरुद्वारे में आकर अन्य लोग भी सत्य का दर्शन करें ।

विभाजन के बाद से भारतीयों के लिये बंद था गुरुद्वारा

1947 में भारत का विभाजन होने के बाद पाकिस्तान का निर्माण हुआ और यह गुरुद्वारा पाकिस्तान के हिस्से में चला गया । विभाजन के दौरान दोनों देशों के लोगों के बीच हुए गदर के कारण पाकिस्तान ने भारतीयों के लिये इस गुरुद्वारे के द्वार बंद कर दिये थे । देखभाल के अभाव में गुरुद्वारा खस्ताहाल हो गया था । धीरे-धीरे स्थिति सामान्य होने पर पाकिस्तान में बसे सिख समुदाय के लोगों ने इस गुरुद्वारे की मरम्मत करवाई तथा धीरे-धीरे इसके अन्य भागों का भी निर्माण करवाया । अब यह गुरुद्वारा काफी बड़े भूखंड में फैला हुआ है और इसमें कई भाग भी निर्मित किये जा चुके हैं । धीरे-धीरे गुरुद्वारे की लोकप्रियता बढ़ती गई और पाकिस्तान ने देश-विदेश के सिख दर्शनार्थियों को आकर्षित करने के लिये उन्हें वीजा देना शुरू किया । अब यह भारतीय सिखों के लिये भी दर्शनार्थ उपलब्ध होने से भारतीय सिख समुदाय में भी खुशी की लहर दौड़ गई है ।

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