आसमान के सितारों ने 19 वर्षीय युवक की किस्मत के सितारे बदल दिए…

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 15 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। किसी ने क्या ख़ूब कहा है, ‘परिंदों को नहीं दी जाती, तालीम उड़ानों की, वो खुद ही तय करते हैं, मंज़िल आसमानों की’। इस बात से तो आप भी सहमत होंगे कि विश्व की हर चीज़ ठोकर लगने से टूट जाया करती हैं, परंतु सफलता ही है एक ऐसी चीज़ है, जो ठोकर खाने के बाद ही मिलती है। कड़े परिश्रम और दिल में कुछ बनने की चाह लिए सफलता के शिखर पर पहुँचने वाले आर्यन मिश्रा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। इनके सपने इतने बड़े थे कि उसके आगे इनकी आकाश जैसी परेशानियाँ भी छोटी लगने लगीं। आइए जानते हैं, कौन हैं ये आर्यन ?

दिल्ली के एक गंदी बस्ती रहने वाले आर्यन को बचपन से ही आसमान को छूने का सपना था और चांद, सितारों तथा अंतरिक्ष को जानना उनका एक मात्र लक्ष्य, परंतु घर की आर्थिक स्थिति इतनी प्रबल न थी। पिता दिन में अख़बार बाँटते थे और रात को चौकीदारी करते थे। पर वो कहते हैं न सपनों को पंख की आवश्यकता नहीं होती, वो तो हौसलों के हवाओं में स्वयं उड़ना सीख जाते हैं। आर्यन बचपन में अपने बस्ती के एक निजी स्कूल में पढ़ाई करते थे। आर्यन कहते हैं, ‘जहाँ वे अपने माता-पिता के साथ रहते थे, वहाँ न तो कोई स्ट्रीट लाइट थी और न ही ऊँची-ऊँची इमारतें। इसका सबसे पड़ा लाभ ये था कि वह खुली आँखों से खुले आसमान और उसमें चकमते सितारों को देख सकते थे। किसी प्रेमी-जोड़े, कवि या शायर के लिए ये सितारे कई रचनाओं और कल्पनाओं का आधार हो सकते हैं, परंतु आर्यन ने इन चमकते सितारों में अपने उज्ज्वल और चमकते भविष्य के सपने संजोए। आकाश में सितारों को देखने का सिलसिला यूँ ही चलता रहा और जब वह 10 वर्ष के हुए तब आर्यन को सितारों को देखने में नहीं, अपितु उन्हें जानने में रुचि होने लगी। आर्यन ने अपने इस जिज्ञासा को दूर करने के लिए अपने स्कूल की ‘एस्ट्रोनॉमी वर्कशॉप’ में दाखिला लिया।

वर्कशॉप में जब आर्यन ने पहली बार टेलीस्कोप से शनि ग्रह के खूबसूरत रिंग्स देखे, तो उन्होंने तय कर लिया की जीवन में उन्हें खगोल विज्ञानी (Astronomer) बनना है। आर्यन ने जब ये बात अपने पिता को बताई, तो निर्धन पिता को आर्यन की बात अपने सामर्थ्य से बाहर की लगी, परंतु आर्यन ने तो एस्ट्रोनॉमर बनने की ठान ली थी। ठान तो ली, पर सपना पूरा करने के लिए ज़रूरत थी पैसों की, जो उनके पिता या परिवार के पास पर्याप्त नहीं थे। इसीलिए आर्यन ने भोजन कम करने की युक्ति अपनाई, पैदल चल कर स्कूल जाना शुरू किया, ताकि वे 5 हज़ार का टेलीस्कोप ख़रीद सकें। अपने कई कठिन त्याग और परिश्रम के बाद अंततः आर्यन ने टेलीस्कोप ले ही लिया। घर की माली हालत के बीच 5 हज़ार रुपए का टेलीस्कोप खरीदने पर पिता कई दिनों तक आर्यन से कर नाराज़ भी रहे।

आर्यन ने अब खुली आँखों के बजाय टेलीस्कोप से आकाशीय परिभ्रमण शुरू कर दिया और जब वह 14 वर्ष के थे, तब उन्होंने आकाश में एक एस्टरॉइड (Asteroid) यानी छोटा तारा ढूँढ निकाला। आर्यन की इस खोज़ की चर्चा जब अख़बारों में छपी, तो अख़बार बाँटने वाले आर्यन के पिता अचंभित रह गए और प्रसन्नता से उनकी आँखों से छलक उठीं। आर्यन अपनी बस्ती का पहला युवक था, जिसकी चर्चा अख़बारों तक पहुँची थी। इसके बाद आर्यन ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और उनकी बुंलंदी के सितारे चमक उठे। उन्हें विश्वविद्लयों में व्याख्याता के रूप बुलाया जाने लगा। आर्यन ने अपने कमाए पैसों से अपने माता-पिता को हवाई जहाज से खुले आकाश की यात्रा कराई। सबसे बड़ा और विशेष कार्य उन्होंने अपने माता-पिता को उस होटल में खाना खिला कर पूरा किया, जहाँ कभी उसके पिता चौकीदार थे। आर्यन ने अपने अथक प्रयायों से न केवल स्वयं का, अपितु अपने माता-पिता का जीवन भी सँवार दिया। 19 वर्षीय आर्यन काम के साथ-साथ पढ़ाई भी कर रहा है। वह वास्तव में आधुनिक पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा है।

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