आधार सर्वाधार नहीं : जानिए क्यों इस बांग्लादेशी महिला को जाना पड़ा जेल ?

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रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 13 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। नागरिकता संशोधन बिल (CAB) के पारित होने से जहाँ एक तरफ बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफग़ानिस्तान से आए हिन्दुओं समेत सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लाखों लोगों के लिए भारतीय नागरिकता लेने का रास्ता आसान हो गया है, वहीं आधार को आधारभूत पहचान मानने वाले लोगों का भ्रम तोड़ने वाली एक ख़बर मुंबई से आई है। मुंबई में जब एक बांग्लादेशी महिला को कोर्ट ने उसके आधार कार्ड को अवैध मान कर उसे 1 वर्ष की सजा सुनाई, तो यह स्पष्ट हो गया कि आधार कार्ड भारतीय नागरिक होने का सर्वोच्च प्रमाण नहीं है। दरअसल मुंबई की रहने वाली एक महिला पर अवैध तरीके से भारत में प्रवेश करने का आरोप है, जिसकी सुनवाई मुंबई के मजिस्ट्रेट कोर्ट में हुई। महिला बीते 10 वर्षों से आधार कार्ड को पहचान बता कर मुंबई के पूर्वी दहिसर में नाम बदल कर रह रही थी। ज्योति गाज़ी के नाम से रहने वाली इस महिला का मूल नाम तस्लीमा रबीउल है। हालाँकि महिला ने माना है कि वह बांग्लादेश की रहने वाली है, परंतु उसके पास से कोई भी ठोस दस्तावेज पाप्त नहीं हुए।

35 वर्षीय ज्योति को मुंबई मजिस्‍ट्रेट कोर्ट (Mumbai Magistrate Court) ने भारत में प्रवेश के लिए पासपोर्ट रूल्स एंड फॉरेनर्स ऑर्डर के तहत दोषी पाया है। अदालत में ये प्रमाणित हो चुका है कि ज्योति एक बांग्लादेशी नागरिक हैं, परंतु उसके पास से भारत में प्रवेश करने के लिए कोई भी वैध पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज प्राप्त नहीं हुआ, जिसके चलते कोर्ट ने महिला को देश के अंदर अवैध तरीके से प्रवेश करने का दोषी ठहराया और उसे 1 वर्ष की जेल की सजा सुनाई है। कोर्ट का कहना था कि पैन कार्ड, आधार कार्ड या सेल डीड जैसे दस्तावेज किसी भी व्यक्ति की नागरिकता को प्रमाणित नहीं करते हैं। किसी व्यक्ति की नागरिकता को प्रमाणित करने के लिए जन्मतिथि का प्रमाण, जन्म स्थान, माता-पिता का नाम या फिर दादा-दादी के जन्म का स्थान जैसे दस्तावेज होना नागरिकता को प्रमाणित करने के लिए अनिवार्य है। अदालत ने अपनी टिप्पणी में ये भी कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी पर सबूत या दस्तावेज पेश करने की बाध्यता है, जिससे यह साबित हो सके कि वह विदेशी नागरिक नहीं है।

यह मामला 2009 का है, जिसमें ज्योति समेत 16 लोगों पर अवैध दस्तावेज के साथ भारत में प्रवेश करने का मुकदमा चलाया गया था। 10 वर्ष बाद केस की सुनवाई तो हुई, परंतु सजा केवल ज्योति को ही मिली, क्योंकि बाकी के सारे आरोपी फ़रार हैं। अदालत ने महिला होने के आधार पर ज्योति को छूट देने की दलील को भी ख़ारिज कर दिया है। कोर्ट का मानना है कि यदि ऐसे मामलों में इस तरह की ढील दी जाती रही, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा और यहाँ के भारतीय नागरिकों के वैध अधिकारों के लिए ख़तरा बन सकता है और ऐसी अनधिकृत प्रविष्टियों के कारण विदेशी भारत की अर्थव्यवस्था पर बोझ बन सकते हैं। फिलहाल कोर्ट ने ज्योति को 1 वर्ष जेल की सजा पूरी करने के बाद बांग्लादेश वापस भेजने का निर्देश दिया है।

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