जब कलेक्टर ने दिए ‘दिव्यांग’, तो वामन हो गई विधाता की विखंडता…

अहमदाबाद, 20, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। जीव सृष्टि में प्राण लेकर विचरण करने वाले सभी प्राणियों को जो शरीर मिला है, वह कैसे बनता है ? इस प्रश्न का उत्तर तो विज्ञान ने खोज लिया है, परंतु शरीर के निर्माण का मूल आधार क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर कदाचित विज्ञान नहीं खोज पाया है। यही कारण है कि विश्व में अनेक जीव ऐसे विचित्र शरीरों के साथ जन्म लेते हैं, जो उसके जैसे अन्य जीव से भिन्न होते हैं। बात यदि मानव की करें, तो एक साधारण मानव का शरीर सिर, धड़ और पैर से बनता है, जिसमें पाँच इंद्रियाँ होती हैं। इन्हें शारीरिक अंगों के रूप में देखें, तो प्रत्येक साधारण व्यक्ति के शरीर में दो आँखें, दो कान, दो हाथ, दो पैर, नर-नारी संबंधी अंग और आंतरिक संरचना में एक हृदय, दो वृक्क (गुर्दे), एक यकृत, फेफड़ा आदि का समावेश होता है, परंतु जब कोई व्यक्ति इन विशिष्ट अंगों में से किसी एक या उससे अधिक अंगों की अनुपस्थिति के साथ जन्म लेता है, तब वह कमी उसके साधारण जीवन निर्वाह में बाधक बन जाती है।

विज्ञान किसी व्यक्ति में रही शारीरिक अपूर्णता का कारण विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं में गड़बड़ी बताता है, परंतु यदि विज्ञान से हट कर धर्म व अध्यात्म के दृष्टिकोण से देखें, तो हर जीव का जब जन्म होता है, तो उसके प्रारब्ध के साथ होता है। इसी प्रारब्ध के अनुसार उसे देह और सारे कर्म मिलते हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति किसी शारीरिक कमी के साथ जन्म लेता है, तो हमारा अध्यात्म केवल प्रारब्ध और विधाता को ही उत्तरदायित्व मानता है, परंतु कुछ बुरे लोग ऐसे लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं, उनका मज़ाक उड़ाते हैं, तो कुछ अच्छे लोग इन शारीरिक अपूर्णता से ग्रस्त व्यक्तियों के प्रति दया, करुणा, सहानुभूति और सहायता का भाव रखते हैं, परंतु आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे असामान्य व्यक्तियों को न किसी का उपहास पसंद आता है और न ही किसी सहानुभूति या सहायता।

पहली बार मोदी ने दी सबसे बड़ी उपाधि

भारत में वर्षों से शारीरिक अपूर्णता को आम जनमानस में उपहास और सहानुभूति दोनों ही मिलते रहे, परंतु शासकीय स्तर पर ऐसे लोगों को विकलांग कह कर संबोधित किया जाता था। यद्यपि शारीरिक अपूर्णता से ग्रस्त व्यक्ति को यह विकलांग शब्द भी चुभता था और इस बात की अनुभूति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी हुई। इसीलिए उन्होंने 27 दिसम्बर, 2015 को पहली बार विकलांगों की एक गरिमापूर्ण उपाधि ‘दिव्यांग’ प्रदान की। मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में पहली बार विकलांगों को दिव्यांग कह कर संबोधित किया, जिसने देश के लगभग 3 करोड़ विकलांगों को गौरव से भर दिया। मोदी ने विकलांगों को दिव्यांग की उपाधि इस तर्क के साथ दी कि जब किसी व्यक्ति के शरीर में कोई एक अंग कम होता है, तो विधाता उसके अन्य कई अंगों को एक आम व्यक्ति से अधिक शक्ति प्रदान कर देता है, जो उस व्यक्ति के लिए दिव्य अंग की तरह काम करते हैं। मोदी की दी गई दिव्यांग उपाधि न केवल शासकीय रिकॉर्ड में भी शामिल की गई, अपितु आम जनमानस में भी अब विकलांगों को सम्मानपूर्ण दृष्टि से देखा जाता है और उन्हें दिव्यांग कहा जाता है। इतना ही नहीं, प्रशासनिक स्तर पर भी अधिकारियों के मन में दिव्यांगों के लिए कुछ ऐसा करने की भावना जागृत हुई, जिससे हर दिव्यांग स्वयं को दीन-हीन नहीं, अपितु सम्मानित और गौरवान्वित अनुभव करे।

कलेक्टर संदीप ने बदल दिया इन दिव्यांगों का जीवन

अब मूल बात पर आते हैं, जिसमें भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के एक अधिकारी की दिव्यांगों के प्रति गरिमापूर्ण सोच ने ऐसा रंग दिखाया कि विधाता का विखंडन वामन सिद्ध हो गया। इस अधिकारी का नाम है संदीप नंदूरी, जो तमिलनाडु में तुतुकुड़ी जिला कलेक्टर हैं। वास्तव में हुआ यूँ कि तुतुकुड़ी के 12 दिव्यांगों ने कलेक्टर संदीप नंदूरी को आवेदन पत्र देकर नौकरी देने की मांग की। ये ऐसे लोग थे, जिनमें से किसी के हाथ नहीं हैं, तो किसी के दोनों पैर ही नहीं हैं। संदीप नंदूरी नियमों के अधीन इन दिव्यांगों को कोई सरकारी नौकरी तो दे नहीं सकते थे, परंतु उन्होंने इन दिव्यांगों को निराश नहीं किया। संदीप नंदूरी ने एक निर्णय किया कि भले ही इन दिव्यांगों को नौकरी नहीं दी जा सकती, परंतु रोजगार की व्यवस्था तो की ही जा सकती है। इसी सोच को साकार करते हुए उन्होंने कलेक्टर कैम्पस में ही ‘Cafe Able’ नाम से एक रेस्टोरेंट खुलवा दिया। इस कैफे एबल की विशेषता यह है कि यहाँ हेड शेफ से लेकर जूस मास्टर, टी मास्टर, बिलिंग क्लर्क, सफाईकर्मी सभी दिव्‍यांग हैं।

कौन हैं संदीप नंदूरी ?

संदीप नंदूरी तमिलनाडु में एक जनसेवक अधिकारी के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनकी कार्यशैली और गहरी दूर्दशी विचारधारा उन्हें अन्य अधिकारियों से अलग बनाती है। संदीप ने अपने 5 वर्ष के कार्यकाल में कई चौंकाने वाले काम किए हैं। इनका पूरा नाम थिरु संदीप नंदुरी है। संदीप नंदूरी का जन्म 31 मई, 1982 को आंध्र प्रदेश में हुआ था। संदीप 2009 की बैच के तमिलनाडु कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। संदीप ने उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद से इंजीनियरिंग में स्नातक किया और भारतीय प्रबंध संस्थान, बैंगलोर (IIM-B) से एमबीए किया। उन्होंने पहले विरुधुनगर जिले में सहायक कलेक्टर के रूप में कार्य भार संभाला और प्रशिक्षण लेने लगे। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद तमिलनाडू में स्थित कृष्णगिरी जिले के होसुर में पहली बार सह-कलेक्टर के रूप में नियुक्त हुए। उन्होंने तुतुकुड़ी जिला (Thoothukudi District) में अतिरिक्त कलेक्टर के रूप में भी कार्य किया। ग्रामीण विकास एजेंसी, सलेम और चेन्नई मेट्रो जल बोर्ड के कार्यकारी निदेशक के रूप में उन्हें 2016 में मदुरै निगम के निगम आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया। संदीप 5 जून, 2017 को जिला कलेक्टर और तिरुनेलवेली जिले के जिला मजिस्ट्रेट के रूप में नियुक्त हुए। 24 मई, 2018 को संदीप ने तुतुकुड़ी जिला कलेक्टर व मजिस्ट्रेट के रूप में पदभार ग्रहण किया, तब से वह अनेक कार्यों को पूरा कर रहे हैं।

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