न होतीं कॉर्नेलिया, तो भारत को नहीं मिलतीं मेनका, मिनाक्षी, वृंदा…

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 15 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारतीय महिलाओं ने सदियों से कई बड़े बदलावों और संघर्षों का सामना किया है। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक निम्न स्तरीय जीवन और साथ ही कई सुधारकों द्वारा समान अधिकारों को बढ़ावा दिए जाने तक भारत में महिलाओं का इतिहास अत्यंत गतिशील और प्रगतिशील भी रहा है। आधुनिक भारत में आज महिलाएँ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, प्रतिपक्ष की नेता, डॉक्टर, वक़ील, जज आदि जैसे शीर्ष पदों पर विद्यमान हैं। युगों-युगों से महिलाओं ने अपने अटूट विश्वास और बुलंद हौसलों से समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। ऐसी ही एक महान महिला थीं कॉर्नेलिया सोराबजी, जो इस धरती पर जन्म न लेतीं, को कदाचित भारत में आज निचले न्यायालयों से लेकर उच्चतम् न्यायालय तक में सैकड़ों महिलाएँ वक़ील के रूप में कार्यरत् न होतीं, न्यायाधीश बनना तो बहुत दूर की बात है। कॉर्नेलिया ने एक ऐसे क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति दर्ज कराई, जिसे सदैव से पुरुष प्रधान ही माना जाता था अर्थात क़ानून का क्षेत्र, जहाँ यह मान्यता थी कि महिला क़ानूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं, क्योंकि उनकी उन दिनों महिलाओं की समझ पुरुषों से कम आँकी जाती थी। कॉर्नेलिया सोराबजी ने न केवल क़ानून के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई, अपितु भारत की महिलाओं के लिए क़ानून के क्षेत्र में जाने के द्वार भी खोले। यदि कॉर्नेलिया सोराबजी ना होतीं, तो आज मेनिका गुरुस्वामी, वृंदा ग्रोवर, मिनाक्षी लेखी, मिनाक्षी अरोड़ा और फ्लाविया एग्नेस जैसी सुप्रसिद्ध महिला वक़ील भारत को नहीं मिल पातीं। हम कॉर्नेलिया सोराबजी को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 153वीं जयंती है। कॉर्नेलिया सोराबजी को ही भारत की प्रथम महिला बैरिस्टर बनने का श्रेय जाता है। प्रथम महिला बैरिस्टर होने के साथ-साथ समाज सुधारक और लेखिका कॉर्नेलिया नेअपनी प्रतिभा के दम पर महिलाओं के लिए वक़ालत का पेशा खोलना। आइए जानते हैं, कॉर्नेलिया के संघर्ष की उस महान गाथा को, जिसने उन्हें भारत की प्रथम महिला वक़ील बनाया।

महिला उत्थान के संकल्प के साथ बनीं प्रथम वकील

कॉर्नेलिया सोराबजी का जन्म 15 नवम्बर, 1866 को महाराष्ट्र में नासिक के देवलाली में एक पारसी परिवार में हुआ था। वह अपने माता-पिता की नौ संतानों में से एक थीं। कॉर्नेलिया के पिता रेवरेंड सोराबजी करसादजी एक ईसाई मिशनरी थे। कॉर्नेलिया न केवल भारत की प्रथम महिला वक़ील थीं, अपितु लंदन में लॉ की प्रैक्टिस करने वाली पहली भारतीय बैरिस्टर भी थीं। कॉर्नेलिया को समाज सेवा विशेष कर महिला सशक्तीकरण की प्रेरणा उनकी माँ से विरासत में मिली थी। उनकी माँ फ्रांसिना फोर्ड नारी शिक्षा की प्रबल पक्षधर थीं। उन्होंने पुणे में लड़कियों की पढ़ाई के लिए कई स्कूल भी खोले। उनका बचपन बेलगाम और पुणे में बीता। कॉर्नेलिया नेअपनी शिक्षा घर और मिशन स्कूलों दोनों में प्राप्त की और उसके बाद डेक्कन कॉलेज-पुणे में आगे की शिक्षा के लिए दाखिला लिया। उन्होंने प्रेसिडेंसी परीक्षा में टॉप किया और आगे की पढ़ाई इंग्लैंड में करने के लिए सरकारी छात्रवृत्ति प्राप्त की, परंतु माना जाता है कि एक महिला होने के कारण कॉर्नेलिया सोराबजी को इस छात्रवृत्ति से वंचित कर दिया गया। उन्हें गुजरात के एक पुरुष कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में अस्थायी पद संभालने के लिए नियुक्त किया गया, क्योंकि वे एक महिला थीं। उस समय कॉर्नेलिया को समाज में महिलाओं की दैन्य (दयनीय) स्थिति का आभास हुआ। उन्होंने देखा कि महिलाओं को अपने ही अधिकारों के लिए कुछ कहने की अनुमति नहीं है। यहीं से उन्होंने महिला उत्थान का संकल्प लिया और वक़ील बनने की ठानी। कॉर्नेलिया ने अंग्रेजी के प्रोफेसर की नौकरी को ठोकर मारी और आगे की पढ़ाई करने के लिए बॉम्बे विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया।

बॉम्बे विश्वविद्यालय से स्नातक किया और वहाँ की प्रथम महिला स्नातक बनने का गौरव प्राप्त किया। 1888 में सोराबजी ने इंग्लैण्ड के ब्रिस्टल स्थित नेशनल इंडियन एसोसिएशन (National Indian Association) यानी INA को एक पत्र लिख कर अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए सहायता माँगी। इस पर आईएनए के मैरी हॉबहाउस, फ्लॉरेंस नाइटिंगल, सर विलियम वेडरबर्न, एडिलेड मैनिंग आदि ने कॉर्नेलिया को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई। इसके बाद 1889 में कॉर्नेलिया इंग्लैंड पहुँचीं और मैनिंग और हॉबहाउस के साथ रह कर पढ़ने लगीं। अपने अंग्रेजी मित्रों की याचिकाओं पर उन्हें कांग्रैजेशनल डिक्री से ऑक्सफोर्ड के सोमरविले कॉलेज में बैचलर ऑफ सिविल लॉ की परीक्षा देने की विशेष अनुमति मिल गई। इसके साथ ही कॉर्नेलिया यह परीक्षा देने वाली प्रथम भारतीय महिला बनीं। 1890 में सर विलियम एन्सन के निमंत्रण पर सोराबजी ऑल सोल्स कॉलेज, ऑक्सफोर्ड के कोडरिंगटन लाइब्रेरी में एक पाठक के रूप में भर्ती हो गईं।

पर्दा प्रथा के विरुद्ध महिलाओं की सलाहकार बनीं

1894 में वक़ालत करने के बाद कॉर्नेलिया भारत वापस लौटीं। सोराबजी पर्दा प्रथा के विरुद्ध कार्यरत् पर्दानशीन्स (Purdahnashins) नामक संस्था की ओर से सामाजिक और सलाहकार कार्यों में शामिल हो गईं। जिन महिलाओं के पास काफी संपत्ति थी, परंतु उनके पास बचाव करने के लिए आवश्यक क़ानूनी विशेषज्ञता नहीं थी और जिन पर बाहरी पुरुष के साथ संवाद करने की पाबंदी थी। कॉर्नेलिया उन महिलाओं की सलाहकार बनीं। कॉर्नेलिया को काठियावाड़ और इंदौर रियासतों के ब्रिटिश एजेंटों के समक्ष अपनी ओर से दलील दर्ज करने की विशेष अनुमति तो मिल गई, परंतु वे अदालत में उनका बचाव करने में असमर्थ रहीं। एक महिला के रूप में उन्होंने भारतीय क़ानूनी प्रणाली में अभी पेशेवर पकड़ नहीं थी। इस स्थिति को सुधारने के लिए सोराबजी ने 1897 में बॉम्बे विश्वविद्यालय की एलएलबी परीक्षा और 1899 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के याचिकाकर्ता की परीक्षा दीं और उत्तीर्ण भी हुईं। उनकी सफलताओं के बावजूद सोराबजी को एक बैरिस्टर के रूप में तब तक मान्यता नहीं दी गई, क्योंकि वे एक महिला थीं।

महिलाओं और नाबालिगों का किया प्रतिनिधित्व

सोराबजी ने 1902 में एक महिला क़ानूनी सलाहकार के रूप में प्रांतीय अदालतों में महिलाओं और नाबालिगों का प्रतिनिधित्व करना शुरू किया। 1904 में उन्हें बंगाल के वार्ड ऑफ कोर्ट में लेडी असिस्टेंट नियुक्त किया गया और 1907 तक इस तरह के प्रतिनिधित्व की आवश्यकता के कारण सोराबजी बंगाल, बिहार, उड़ीसा और असम के प्रांतों में काम करने लगीं। 20 वर्षों की सेवा में सोराबजी ने 600 से अधिक महिलाओं और अनाथों को क़ानूनी लड़ाई लड़ने में सहायता की। कभी-कभी तो वह बिना किसी शुल्क के केस लड़ा करती थीं। इसी दौरान उन्होंने महिलाओं के लिए वक़ालत का पेशा खोलने की आवाज़ बुलंद की। लगभग दो दशकों के अथक प्रयासों के बाद तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार ने 1923 में क़ानून में संशोधन किया और 1924 में भारत में महिलाओं के लिए व़कालत कापेशा खुल गया। कॉर्नेलिया सोराबजी ने कोलकाता में भारत की प्रथम महिला वक़ील के रूप में वक़ालत शुरू की। यद्यपि पुरुष पक्षपात और भेदभाव के कारण वह कई मामलों पर अपनी राय निर्बाध रूप से नहीं रख पाती थीं। बाद में धीरे-धीरे वक़ालत यानी न्यायपालिका का क्षेत्र महिलाओं के लिए खुलता गया। महिलाओं के लिए न्यायपालिका में वक़ालत के दरवाजे खोलने वालीं कॉर्नेलिया 1929 में जब सेवानिवृत्त हुईं, तब वे उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करती थीं। सेवानिवृत्ति के बाद कॉर्नेलिया भारत छोड़ लंदन में जा कर बस गईं। 6 जुलाई, 1954 को लंदन के मैनर हाउस में ग्रीन लैन्स पर नॉर्थम्बरलैंड हाउस में 87 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

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