जन से गण और गण से मन तक यूँ हर भारतीय के हृदय में बस गया, ‘जन गण मन’…

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रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 27 दिसंबर, 2019 युवाPRESS। 27 दिसंबर का दिन भारत के इतिहास में बहुत ही विशिष्ट स्थान रखता है, क्योंकि आज ही के दिन हृदय की गहराईयों में तुरने वाली एक ऐसी धुन बजाई गई थी, जो आज भी हर भारतीय को गर्व से भर देती है। इस धुन के बोल सुनते ही एक सच्चा भारतीय नागरिक सावधान की मुद्रा में खड़ा हो जाता है। हृदयस्पर्शी इस धुन को हम जन गण मन कहते हैं। 13 लाइनों में लिखा गया यह गान भारतीय संविधान और भारत के अस्तित्व की पहचान है, इसलिए इस गीत को राष्ट्र गान की उपाधी ने नवाज़ा गया है। राष्ट्रगान के गायन की अवधि लगभग 52 सेकेण्ड है, जिसे 20 सेकण्ड में गाया जाता है। पूरे गान में 5 पद हैं। आइए जानते हैं हमारे राष्ट्रगान की क्या है विशेषताएँ ?

जन-गण-मन अधिनायक, जय हे
भारत-भाग्‍य-विधाता,
पंजाब-सिंधु गुजरात-मराठा,
द्रविड़-उत्‍कल बंग,
विन्‍ध्‍य-हिमाचल-यमुना गंगा,
उच्‍छल-जलधि-तरंग,
तव शुभ नामे जागे,
तव शुभ आशिष मांगे,
गाहे तव जय गाथा,
जन-गण-मंगल दायक जय हे
भारत-भाग्‍य-विधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे।

1905 में सर्वप्रथम जन गण मन रवीन्द्रनाथ टैगौर ने बांग्ला भाषा में लिखी और उसे अपने सुरीले संगीत से सजाया। सर्वप्रथम राष्ट्रगान को 27 दिसंबर, 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कोलकाता (तब कलकत्ता) अधिवेशन में बंगाली और हिन्दी में गाया गया था। हालाँकि इससे पहले रवींद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रगान को आंध्र प्रदेश के एक छोटे से जिले मदनपिल्लै में गाया गया था। इसके बाद 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा में ‘जन गण मन’ के हिन्दी संस्करण को भारत के राष्ट्रगान के रूप में मान्यता दी गई। जन गण मन को इसके अर्थ की वजह से राष्ट्रगान बनाया गया। इस गान में उन अधिनायकों की जय बोली गई है, जो भारत के भाग्यविधाता हैं और जिनका नाम सुनते ही पंजाब सिन्ध गुजरात और मराठा, द्राविड़ उत्कल व बंगाल एवं विन्ध्या हिमाचल व यमुना और गंगा पे बसे लोगों के हृदयों में मनजागृतकारी तरंगें भर उठती हैं। भारत का पवित्र नाम सुनते ही सब जाग उठते हैं और उसका आशीर्वाद पाने की अभिलाषा करते हैं, साथ ही भारत की विजय गाथा गाते हैं।

1960 के दशक में इसे फिल्म के अंत में बजाया जाता था। परंतुलोग सिनेमा खत्म होने पर सीधे लाइन में बाहर निकल जाते थे, इसलिए इसे बंद कर दिया गया। 2003 में महाराष्ट्र की विधान सभा ने एक आदेश पारित कर फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाना एक बार फिर अनिवार्य कर दिया। राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण कानून, 1971 कहता है, ”जो कोई भी जानबूझ कर जनगण को गाने से रोकता है या इसके लिए जमा हुए लोगों के गाने में बाधा डालता है, उसे जेल की सजा या आर्थिक दंड या दोनों के जरिए दंडित किया जाएगा। जबकि 2015 में गृह मंत्रालय का एक आदेश कहता है, ”जब भी राष्ट्रगान गाया या बजाया जाएगा, दर्शक सावधान की मुद्रा में खड़ा होगा। परंतुकिसी न्यूज़रील या डाक्यूमेंटरी के दौरान अगर राष्ट्रगान फिल्म के हिस्से के रूप में बजाया जाता है तो दर्शक से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की जाती है क्योंकि यह फिल्म के प्रदर्शन में अवश्य बाधा डालेगा और राष्ट्रगान के सम्मान को बढ़ाने के बदले अशांति तथा गड़बड़़ी पैदा करेगा।”

दुर्भाग्य से, किसी स्पष्ट आदेश की अनुपस्थिति में, विभिन्न उच्च न्यायालयों ने इस मामले पर अलग−अलग ढंग से विचार किया है। उदाहरण के तौर पर, अगस्त 2014 में केरल की पुलिस ने दो औरत समेत सात लोगों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्रोह) लगा दिया था क्योंकि वे तिरूवनंतपुरम के एक थियेटर में राष्ट्रगान के समय खड़े होने में विफल रहे थे। उनमें से एक, एम सलमान (25) को कथित तौर पर राष्ट्रगान बजते समय ”बैठे रहने तथा तिरस्कार करने” के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। फेसबुक पर कथित तौर पर राष्ट्रीय झंडे के खिलाफ एक अपमानजनक पोस्ट डालने के लिए उसके खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 66 भी लगाई गई थी।

सबसे पुराना राष्ट्रगान ग्रेट ब्रिटेन का ‘गॉड सेव दि क्वीन’ है, जिसे 1825 में राष्ट्रगान के रूप में वर्णित किया गया था, हालांकि 18वीं सदी के मध्य से ही यह देश प्रेम के गीत के रूप में लोकप्रिय रहा तथा राजसी समारोहों में गाया जाता था। 19वीं तथा 20वीं सदी के आरंभ में अधिकांश यूरोपीय देशों ने ब्रिटेन का अनुसरण किया, कुछ राष्ट्रगान खास उद्देश्य से लिखे गए, जबकि अन्य को पहले से मौजूद धूनोन से अपनाया गया। कुछ ही राष्ट्रगान विख्यात कवियों या रचयिताओं द्वारा लिखे गए हैं। प्रथम ऑस्ट्रियाई राष्ट्रगान गॉड एरहाल्ते फ़्रेंज़ डेन कैसर (ईश्वर सम्राट फ़्रांसीसी की रक्षा करे) इसका विशिष्ट अपवाद है। इसकी रचना 1797 में जोज़ेफ़ हेडन ने की थी तथा बाद में (1929) पाठ को बदलकर सेई गेसनेट ओन एन्डे (हमेशा सौभाग्यशाली रहें) गाया गया। हेडन की धुन का जर्मन राष्ट्रगान ड्युश्लैंड, ड्युश्लैंड ऊबर ऐले जर्मनी, में भी उपयोग किया गया था। जिसे 1922 में अंगीकार किया गया था। इसके तीसरे छंद ईनिकी अंड रेश अंड फ्रीही (एकता, अधिकार और स्वतंत्रता) से आरंभ करके इसका नाम बदलकर ड्यूश्लैंडलेड के नाम से जर्मनी के राष्ट्रगान के रूप में उपयोग जारी है। 1922 के पूर्व जर्मनी का राष्ट्रगान हील डिर इम सीगक्रांज़ (विजय की माला धारण करने वालों का अभिवाद) था। यह गॉड सेव द क्वीन की धुन पर गाया जाता था।

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