क्या आज भी अंत:सलिला बन कर बह रही है सरस्वती नदी ?

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रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 9 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। आज की पीढ़ी ने सरस्वती नदी के बारे में केवल सुना होगा। प्रयाग में गंगा-यमुना-सरस्वती के त्रिवेणी संगम के बारे में भी सुना ही होगा, परंतु प्रत्यक्ष रूप से आज न तो सरस्वती नदी को किसी ने देखा है और न ही त्रिवेणी संगम तट पर उसे गंगा-यमुना के साथ मिलते ही देखा है। आख़िर कहाँ चली गई इतनी विशाल नदी ? आज हम जिस जलवायु परिवर्तन (CLIMATE CHANGE) और ग्लोबल वॉर्मिंग (GLOBAL WARMING) के दुष्परिणाम झेल रहे हैं, वह आज से नहीं हैं। सदियों से प्रकृति के अप्राकृतिक दोहन ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ने का काम किया और उसी की भेंट चढ़ गई भारत की एक महान माता समान नदी सरस्वती।

भारत में उत्तराखंड के हिमालय पर स्थित शिवालिक पर्वतमाला में रुपण हिमनद (Glacier) से निकलने वाली सरस्वती नदी को पौराणिक हिन्दू ग्रन्थों और ऋग्वेद में मुख्य नदियों में से एक बताया गया है। ऋग्वेद में सरस्वती को अन्नवती और उदकवती के रूप में परिभाषित किया गया है अर्थात सरस्वती सदा जल से भरी हुई और अन्न की उपज के लिए उत्तम बताई गई है। वेदों के अनुसार सरस्वती पंजाब में सिरमूर राज्य के पर्वतीय भाग से निकलकर अंबाला तथा कुरुक्षेत्र होती हुई कर्नाल जिला और पटियाला राज्य में प्रविष्ट होकर सिरसा जिले की दृशद्वती (कांगार) नदी में मिल गई थी। उत्तर प्रदेश के प्रयाग में आकर सरस्वती नदी गंगा और यमुना में मिल कर त्रिवेणी बन गई। वर्तामन में सरस्वती तिरोहित यानी लुप्त हो गई है, परंतु आज भी लोगों का मानना है कि सरस्वती अंत:सलिला होकर अर्थात् गंगा और यमुना में मिल कर वहाँ विद्यमान है।

कैसे और क्यों लुप्त हुई सरस्वती ?

ताण्डय और जैमिनीय ब्राह्मण जैसे उत्तर वैदिक ग्रंथो में सरस्वती नदी को मरुस्थल में सूखा हुआ बताया गया है, वहीं महाभारत में सरस्वती नदी के ‘विनाशन’ नामक मरुस्थल पर विलुप्त होने का वर्णन किया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) विभाग के अनुसार सरस्वती का उद्गम उत्तरांचल में रूपण नामक हिमनद (Glacier) से होता था। रूपण ग्लेशियर को अब सरस्वती ग्लेशियर भी कहा जाने लगा है। नैतवार में आकर यह हिमनद जल में परिवर्तित हो जाता था, फिर जलधार के रूप में आदिबद्री तक सरस्वती बहकर आती थी और आगे चली जाती थी। महाभारत में मिले वर्णन के अनुसार सरस्वती नदी हरियाणा में यमुनानगर से थोड़ा ऊपर और शिवालिक पहाड़ियों से थोड़ा-सा नीचे आदिबद्री नामक स्थान से निकलती थी। आज भी लोग इस स्थान को तीर्थस्थल के रूप में मानते हैं। वैज्ञानिक और भूगर्भीय खोजों से पता चला है कि किसी समय इस क्षेत्र में भीषण भूकम्प व भारी भूगर्भीय हलचलें हुईं, जिसके कारण ज़मीन के नीचे के पहाड़ ऊपर उठ गए और सरस्वती नदी का जल पीछे की ओर चला गया और सरस्वती नदी लुप्त हो गई।

क्या कहता है नया शोध ?

सरस्वती नदी के तट पर बसी सभ्यता को ही हड़प्पा सभ्यता या सिन्धु-सरस्वती सभ्यता कहा जाता है। सरस्वती नदी तट पर बसी बस्तियों से मिले अवशेष हड़प्पा सभ्यता से जुड़े प्रमाण है। हड़प्पा सभ्यता की 2600 बस्तियों में से वर्तमान पाकिस्तान में सिन्धु तट पर केवल 265 बस्तियाँ हैं, जबकि शेष बस्तियाँ सरस्वती नदी के तट पर मिलती हैं। हड़प्पा सभ्यता को सिर्फ सिन्धु नदी की देन माना जाता रहा है, परंतु अब नये शोधों से सिद्ध हो गया है कि सरस्वती का सिन्धु सभ्यता के निर्माण में बहुत बड़ा योगदान था। वहीं शोध नेचर पब्लिशिंग (Nature Publishing) की पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स (Scientific Reports) के नवीनतम अंक में प्रकाशित एक नये वैज्ञानिक शोध के अनुसार घग्गर नदी के जलमार्ग में सरस्वती नदी के रेत मिलने का दावा किया जा रहा है। घग्गर के जलमार्ग में जलोढ़ मिट्टी के 3 से 10 मीटर नीचे मौजूद बड़े दानों वाली सफेद रेत के जमाव मिलने से वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि यहीं से सरस्वती नदी बहा करती थी। भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (Physical Research Laboratory) यानी PRL अहमदाबाद और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्‍बे (IIT Bombay) के शोधकर्ताओं के अनुसार उत्तर पश्चिमी भारत के मैदानी क्षेत्रों में एक बारहमासी नदी थी, जो आधुनिक घग्गर के रास्ते से बहती थी। इसी नदी को ऋग्वेद में सरस्वती नदी कहा गया है। शोधकर्ता इस बात का प्रमाण दे रहे हैं कि सरस्वती बारहमासी नदी थी और उच्च हिमालय से 7,000 ईसा पूर्व व 2,500 ईसा पूर्व के बीच बहती थी। साथ ही हड़प्पा वासियों ने 3,800 ईसा पूर्व और 1,800 ईसा पूर्व के बीच इस विशाल नदी के साथ अपनी प्रारंभिक बस्तियों का निर्माण किया था। शोध के अनुसार सरस्‍वती नदी और हड़प्‍पा सभ्यता का पतन लगभग मेघालय चरण की शुरुआत के साथ माना जाता है। मेघायल चरण वैश्विक जलवायु में आया एक सूखे का दौर था, जो आज से 4,200 वर्ष पूर्व शुरू हुआ और अब तक चल रहा है। वैज्ञानिक पीआरएल के अनिर्बान चटर्जी, जे एस रे, अनिल शुक्ला और आईआईटी-बॉम्बे की कंचन पांडे का कहना है कि सरस्वती का स्रोत भी गंगा, यमुना और सतलुज के समान उच्च हिमालय के बर्फ से ढँके क्षेत्रों में था, परंतु आधुनिक घग्गर का उच्च हिमालय से कोई सीधा संबंध नहीं मिलता। घग्गर हिमालय की तलहटी शिवालिक से निकलती है।

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