सियाचिन : हड्डियाँ गल जाएँ, पर नज़र नहीं हटाते जवान, तूफ़ानों ने ली 873 की जान

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 19 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। सियाचिन हिमनद (Siachen Glacier) वह क्षेत्र है, जहाँ प्रति वर्ष बिना युद्ध किये भारत के कितने की लाल अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं। जी हाँ, सही पढ़ा आपने बिना युद्ध किये, क्योंकि सियाचिन बहुत ही ठंडा क्षेत्र है। यहाँ तापमान माइनस 70 डिग्री तक होता है। ऐसी कड़ाके ठंड में भारत के वीर जवान भारत की सुरक्षा का बीड़ा उठाये 24 घंटे यहाँ तैनात रहते हैं।

‘सिया’ का अर्थ एक प्रकार का जंगली गुलाब है और ‘चिन’ का अर्थ ‘बहुतायत’। ‘सियाचिन’ नाम का अर्थ ‘गुलाबों की भरमार’ है, परंतु सियाचिन ग्लेशियर कोई गुलाब की फुलवाड़ी नहीं है, अपितु यहाँ हड्डियों को गला देने वाले बर्फीले पहाड़ों से घिरा हुआ क्षेत्र है। इसे सियाचिन हिमानी या सियाचिन ग्लेशियर भी कहते हैं। यह हिमालय के पूर्वी काराकोरम पर्वतमाला की एक श्रृंखला है और भारत-पाक नियंत्रण रेखा के पास स्थित है। इसे विश्व का सबसे ऊँचा युद्ध क्षेत्र (Highest War zone) भी माना जाता है। यह काराकोरम की पाँच सबसे बड़े ग्लेशियर्स में से एक है। यह तज़ाक़िस्तान की फ़ेदचेन्को ग्लेशियर के बाद विश्व का दूसरी सबसे बड़ा हिमनद है, जो समुद्रतल से इसकी ऊँचाई लगभग 5,753 मीटर है।

1984 से सियाचिन ग्लेशियर पर भारत का नियंत्रण रहा है और भारत इसे लद्दाख खण्ड के लेह जिले के अधीन प्रशासित करता है, जहाँ 3 हज़ार सैनिक सदैव तैनात रहते हैं। पाकिस्तान ने इस क्षेत्र से भारत का नियंत्रण समाप्त करने के कई विफल प्रयत्न भी किये हैं, जो वर्तमान में भी जारी है। इस युद्ध क्षेत्र में भारतीय सेना के जवान 16 से 20 हजार फीट की ऊँचाई तक सीमा की सुरक्षा में तैनात हैं, जहाँ आयेदिन आने वाले बर्फीले तूफान से उनकी जान चली जाती है। सोमवार यानी 18 नवंबर, 2019 को भी भारतीय सेना की पोस्ट बर्फीले तूफान की चपेट में आ गई। इसमें 4 जवान शहीद हो गए और 2 स्थानीय नागरिकों की भी मौत हो गई। एक अनुमान के अनुसार भारत और पाकिस्तान के अब तक 2500 जवानों ने ठंड के कारण अपनी जान गँवा दी है, वहीं अकेले भारत के अब तक 873 सैनिक केवल ख़राब मौसम, बर्फीले तूफान और हिमस्खलन के कारण अपनी जान गँवा चुके हैं।

भारत सरकार प्रति दिन 5 करोड़ रुपये सियाचिन में तैनात सैनिकों की सुरक्षा के लिए खर्च करती हैं, ताकि हमारे जवान सुरक्षित रह कर देश की रक्षा कर सकें, परंतु यहाँ की प्राणघातक ठंड से बच पाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। यहाँ ठंड का कहर इतना अधिक है कि केवल गन शॉट फायर करने या मेटल को छूने से भी उंगलियाँ अकड़ जाती हैं, जिन्हें कभी-कभी काटना पड़ जाता है। इतना ही नहीं दिन के समय में भी देखने और सुनने में मुश्किलें आती हैं और याददाश्त भी कमज़ोर होने लगती है।

1972 के शिमला समझौते में इस इलाके को बेजान और बंजर करार दिया गया अर्थात् यह इलाका इंसानों के रहने के लायक नहीं है। इस समझौते में यह नहीं बताया गया कि भारत और पाकिस्तान की सीमा सियाचिन में कहाँ होगी। उसके बाद से इस क्षेत्र पर पाकिस्तान ने अपना अधिकार जताना शुरू कर दिया। 13 अप्रैल, 1984 को भारत ने ऑपरेशन मेघदूत चला कर सियाचिन ग्लेशियर पर अपना अधिकार कर लिया। 2003 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम संधि हो गई। तब से इस क्षेत्र में फायरिंग और गोलाबारी होनी बंद हो गई। फिलहाल सियाचीन ग्लेशियर के ऊपरी भाग पर भारत और निचले भाग पर पाकिस्तान का अधिकार है।

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