IPS सूरज सिंह परिहार, जिन्होंने विफलताओं की हर चोट को बनाया चोटी की सीढ़ी

* बैंक व IRS की नौकरी से नहीं हुए संतुष्ट

* अब दंतेवाड़ा में नक्सलियों से ले रहे हैं लोहा

* ‘नई सुबह का सूरज’ से दिया शांति संदेश

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 19, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। सपने तो हर वो इंसान देखता है, जिस पर कुछ कर दिखाने की धुन सवार होती है। होता है, परंतु अपने सपने वही पूरे कर पाता है, जिसने उन सपनों को बुनने से लेकर साकार होने तक स्वयं को मिटा डाला हो। फिर ऐसे इंसान के आड़े हिमालय भी खड़ा हो जाए, तो भी उसे रोका नहीं जा सकता। आज हम आपको एक ऐसे ही व्यक्ति से परिचित कराने जा रहे हैं, जिनके बारे में जान कर देश के उन हजारों युवाओं को प्रेरणा मिलेगी, जो सर्वोच्च भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) या भारतीय पुलिस सेवा (IPS) से जुड़ने की अभिलाषा रखते हैं, परिश्रम कर रहे हैं और सफल होना चाहते हैं।

हम जिस व्यक्ति से साक्षात्कार कराने जा रहे हैं, उनका नाम है सूरज सिंह परिहार। सूरज 2015 की बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और इस समय छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद प्रभावित जिले दंतेवाड़ा में सहायक पुलिस अधीक्षक (ASP) के रूप में तैनात हैं। भारत के लिए नक्सलवाद वह विष है, जो अब तक अर्धसैनिक बलों व पुलिस के हजारों जवानों को काल का ग्रास बना चुका है। दंतेवाड़ा में एएसपी के रूप में कार्यरत् सूरज सिंह परिहार भी नक्सलवादियों से लोहा ले रहे हैं, परंतु साथ ही साथ उनका एक सकारात्मक और मानवीय पहलू यह भी है कि वे नक्सलवाद से जुड़े गुमराह लोगों को देश की मुख्य धारा में लाने का प्रयास कर रहे हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने ‘नई सुबह का सूरज’ लघु फिल्म का भी निर्माण किया है।

जाजमऊ का होनहार बालक, राष्ट्रपति ने किया सम्मान

सूरज सिंह परिहार का जन्म उत्तर प्रदेश में जौनपुर के एक छोटे से गाँव में हुआ था। जब सूरज जौनपुर के एक स्थानीय विद्यालय में 5वीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब उनके माता-पिता उन्हें लेकर कानपुर के उप-महानगर जाजमऊ चले आए। सूरज का दाखिला कानपुर के सरस्वती विद्या मंदिर, डिफेंस कॉलोनी में कराया गया। सूरज पढ़ाई के साथ-साथ खेल-कूद और लेखन में भी निपुण थे। पढ़ाई के दौरान वर्ष 2000 में सूरज ने अपने स्कूल में एक लेखन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। प्रतियोगिता में सूरज ने एक सुन्दर कविता लिखी, जिसके लिए सूरज के तत्कालीन राष्ट्रपति कोच्चेरील रामन नारायणन ने सूरज को ‘राष्ट्रीय बाल श्री पुरस्कार’ से सम्मानित किया। सूरज ने सरस्वती विद्या मंदिर से 75 प्रतिशत अंकों के साथ 10वीं और फिर 81 प्रतिशत के साथ 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सूरज ने कानपुर के दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) कॉलेज से बीए और एमए किया।

निर्धनता के बीच पनपा आईपीएस बनने का सपना

सूरज बचपन से ही आईएएस ऑफिसर बनना चाहते थे, परंतु घर की माली हालत ठीक नहीं थी और पिता भी प्राइवेट सेक्टर की अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त हो चुके थे। बड़ा बेटा होने के कारण घर का सारा उत्तरदायित्व सूरज के कंधों पर था। घर चलाने के साथ-साथ आईएएस बनने का सपना पूरा करने के लिए सूरज को धन की आवश्यकता थी। इसी कारण वे ग्रेजुएशन करने के बाद दिल्ली से न्यू ओखला इंडस्ट्रियल ऑथोरिटी (NOIDA) यानी नोएडा पहुँचे। सबसे पहले सूरज ने हिन्दुस्तान यूनिलीवर में मार्केटिंग कर्मचारी के रूप में नौकरी की, परंतु यह काम उन्हें रास नहीं आया। उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद सूरज ने 2005 से 2007 तक ईएक्सएल बीपीओ में कॉल सेंटर एक्ज़ीक्यूटिव के पद पर कार्य किया। 2008 से 2012 तक उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ महाराष्ट्र में Probationary Officer (परिवीक्षाकालीन अधिकारी) यानी PO की नौकरी की। परिवीक्षाकालीन किसी भी नौकरी का प्रारंभिक काल होता है, जो छह माह का होता है। उसके बाद उसे स्थायी (PERMANANT) किया जाता है, परंतु सूरज के लिए नौकरी के साथ-साथ आईपीएस परीक्षा की तैयारी करना मुश्किल हो रहा। दूसरी तरफ वे नौकरी छोड़ भी नहीं सकते थे। वे नौकरी के साथ स्पर्धात्मक परीक्षाओं (COMPETITION EXAMS) की तैयारियाँ करते है, जिसके अंतर्गत 2012 में उन्होंने कर्मचारी चयन आयोग (SSC) की परीक्षा दी। वे उत्तीर्ण हुए। उनका सीमा एवं उत्पाद शुल्क विभाग में निरीक्षक के पद पर चयन हो गया।

जब विफलताएँ रंग लाईं और सूरज बने आईपीएस

सीमा एवं उत्पाद शुल्क विभाग की इस नौकरी के दौरान मिलने वाली एक दिन की छुट्टी को अब सूरज ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की तैयारी के लिए समर्पित कर दिया, जो आईपीएस बनने का सपना पूरा करने का माध्यम था। सूरज ने 2011 में पहली बार यूपीएससी की परीक्षा दी, परंतु सफलता मानो कोसों दूर रही। फिर 2012 में उन्होंने दोबारा प्रयास किया, परंतु इस बार भी वे मेन्स परीक्षा से आगे नहीं बढ़ सके। अब सूरज अगली बार के लिए और अधिक परिश्रम में जुट गए। तीसरे प्रयास में उन्हें भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी बनने में सफलता मिली, परंतु सूरज का लक्ष्य आईआरएस नहीं, वरन आईपीएस बनना ही था। सूरज ने 2015 में एक बार फिर यानी चौथी बार यूपीएससी की परीक्षा दी और 189 रैंक के साथ पूर्णतः सफल रहे। सूरज आज एक आईपीएस अधिकारी हैं, और अपने कर्तव्य को पूर्ण निष्ठा से निभा रहे हैं। परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने के बाद भी सूरज के सिविल सेवा परीक्षा में पास होने का दृढ़ निश्चय ही उनको इस मुक़ाम तक ले आया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि इरादों के आगे हर बड़ा सपना बौना बन सकता है। एक दृढ़ संकल्प से सपनों को पूरा किया जा सकता है।

‘नई सुबह का सूरज’ से शांति का संदेश

सूरज सिंह परिहार की नियुक्ति जब दंतेवाड़ा में हुई, तो वहाँ के नक्सलियों की स्थिति देख कर वे व्याकुल हो उठे। उन्होंने नक्सलियों के जीवन की असली तसवीर सबके सामने लाने का निर्णय किया। इसी उद्देश्य से सूरज ने एक शॉर्ट फिल्म बनाई।। यह शॉट फिल्म नक्सलवाद की सच्ची घटनाओं पर आधारित है। फिल्म का नाम ‘नई सुबह का सूरज’ है। फिल्म की खास बात यह है कि फिल्म की कहानी सूरज सिंह परिहार ने ही लिखी है। फिल्म के डायलॉग, गीत और कविताएँ भी सूरज ने ही लिखे हैं। फिल्म में एएसपी सूरज की आवाज़ भी है। लगभग 10 मिनट की इस शॉर्ट-फिल्म की शूटिंग दंतेवाड़ा में हुई है। फिल्म में दंतेवाड़ा जिला पुलिस बल और जिला आरक्षी गार्ड (DRG) के 100 जवानों ने ही नक्सलियों की भूमिका निभाई है। इस फिल्म में दंतेवाड़ा में सरेंडर कैडर के नक्सली भी हैं।
लीजिए, आप भी देखिए सूरज सिंह परिहार की शांति का संदेश देने वाली फिल्म..

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