VIDEO : बलिदान के बाद भी जब ‘वरदान’ बन गए बदलूराम, तो असम रेजिमेंट ने उन्हें ही बना डाला ‘मार्च गीत’

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 17, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। असम रेजिमेंट पिछले 70 वर्षों से अपना मार्चिंग गीत ‘बदलूराम का बदन…’ गाती आ रही है। यह उसका रेजिमेंटल गीत है। असम रेजिमेंट हर वर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर मेघालय में राजधानी शिलॉङ्ग स्थित हैप्पी वैली रेजिमेंटल सेंटर में रंगरूटों का समारोह आयोजित करती है, जिसमें रेजिमेंट के सैनिक यह गीत गा कर बदलूराम को श्रद्धांजलि देते हैं। आखिर कौन था बदलूराम और क्या है उसका असम रेजिमेंट से संबंध ?

‘बदलूराम का बदन…’ गीत सोशल मीडिया पर इन दिनों वायरल हो रहा है, क्योंकि वॉशिंगटन स्थित मैककॉर्ड एयफोर्स बेस में भारत और अमेरिका की सेना के बीच संयुक्त युद्धाभ्यास के दौरान असम रेजिमेंट और अमेरिकी सैनिकों ने मिल कर ‘बदलूराम का बदन…’ गीत गाया। बदलूराम के बारे में बताने से पहले गीत सुनिए और साथ ही पंक्ति भी पढ़िए :

एक खूबसूरत लड़की थी…
उसको देख के राइफलमैन…
चिंदी खींचना भूल गया…
हवलदार मेजर देख लिया…
उसको पिट्टू लगाया…
बदलूराम एक सिपाही था…
जापान वॉर में मर गया…
क्‍वॉर्टर मास्‍टर स्‍मार्ट था…
उसने राशन निकाला…
बदलूराम का बदन जमीन के नीच रह गया…
तो हमें उसका राशन मिलता है…
शाबाश…हल्‍लेलुजाह…
तो हमें उसका राशन मिलता है…

वास्तव में ‘बदलूराम का बदन…’ एक अमेरिकी महाकाव्य की धुन पर बना है, जो निम्नानुसार है :

ओल्ड जॉन ब्राउन का शरीर धूल में मिला हुआ है,
पुराने जॉन ब्राउन के रक्त-धब्बों के साथ लाल रंग की राइफलें जंग में बदल गईं,
पुराने जॉन ब्राउन के पाइक ने अपना अंतिम, अधूरा जोर दिया,
उसकी आत्मा मार्च कर रही है!

कौन थे जॉन ब्राउन विन्सेंट ?

दरअसल यह अमेरिकी फौज़ का वह गीत है, जिसकी तर्ज़ पर असम रेजिमेंट ने ‘बदलूराम का बदन जमीन के नीच रह गया…’ गीत गाना शुरू किया। जॉन ब्राउन की बॉडी (1928) स्टीफन विन्सेंट बेनेट द्वारा लिखित एक अमेरिकी महाकाव्य है। इसका शीर्षक कट्टरपंथी उन्मूलनवादी जॉन ब्राउन के संदर्भ में है, जिन्होंने 1859 के पतन में वर्जीनिया में हार्पर्स फेरी पर छापा मारा था। बाद में उसे पकड़ लिया गया और उसे फांसी दे दी गई। बेनेट की कविता में अमेरिकी गृह युद्ध का इतिहास भी शामिल है। इसके लिए स्टीफन को 1929 में पुलित्ज़र पुरस्कार से भी स्मानित किया गया था।

कौन थे बदलूराम ?

दरअसल यह गीत इसलिए चर्चा में आया, क्योंकि 5 सितंबर से अमेरिका के वॉशिंगटन स्थित मैककॉर्ड एयफोर्स बेस में भारतीय और अमेरिकी सैनिकों का 19वाँ संयुक्‍त युद्धाभ्‍यास चल रहा है, इस दौरान दोनों देशों के सैनिकों ने ‘बदलूराम का बदन…’ गीत गाकर एक नए जोश और साहस का अनुभव किया। यह युद्धाभ्यास 18 सितंबर तक चलेगा। भारत और अमेरिका के बीच यह सबसे बड़ा युद्धाभ्यास है। ये युद्धाभ्यास एक साल भारत में, तो दूसरे साल अमेरिका में आयोजित किया जाता है। दोनों सेनाओं की ओर से एक वीडियो जारी किया गया है, जिसमें सैनिक पैरों को हिलाते, ताली बजा कर एक गाना गा रहे हैं। यह गीत ‘बदलूराम का बदन…’ है, जो असम रेजिमेंट का मार्चिंग गीत है। गीत में बदलूराम कोई काल्पनिक व्यक्ति नहीं, अपितु माँ भारती के लिए द्वितीय विश्व युद्ध में स्वयं को बलिदान करने वाला एक वीर सैनिक है, जिसने अपनी मृत्यु के बाद भी अपने भारतीय सैनिकों की सेवा की।

बलिदान के बाद भी देते रहे राशन !

दरअसल दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बदलूराम नामक एक सैनिक असम रेजिमेंट का हिस्सा थे। उसी समय 1944 में ‘कोहिमा की लड़ाई’ हुई। यहाँ ब्रिटिश साम्राज्य के लिए जापान के विरुद्ध युद्ध लड़ते हुए बदलूराम शहीद हो गए। द्वितीय विश्व युद्ध में 30 से अधिक देशों के 100 मिलियन से अधिक लोग सैनिक शामिल थे, जिसमें सैनिकों को राशन मिलता था और उनके शहीद हो जाने पर उनके हिस्से का राशन आना बंद हो जाता था, परंतु बदलूराम की मौत के बाद उनका क्‍वार्टर मास्‍टर उनका नाम लिस्ट से हटाना भूल गया और उसकी जानकारी सेना को नहीं दे सका, इसके फलस्‍वरूप लगातार उनके नाम से राशन आता रहा। बदलूराम की मृत्यु के बाद कई दिनों तक भारतीय सैनिकों को उनके नाम पर अतिरिक्त राशन मिलता रहा और यही अतिरिक्‍त राशन उनकी रेजिमेंट के लिए वरदान साबित हुआ। हुआ यूँ कि द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान जब जापानी सेना ने भारतीय जवानों की सप्‍लाइ रोक दी, तो ऐसे में भारतीय बटैलियन को राशन और अन्य जरूरी सामग्री मिलना बंद हो गया, जिसके बाद बदलूराम के नाम से आए अतिरिक्‍त राशन से भारतीयों सैनिकों ने काम चलाया। बदलूराम की मृत्यु के बाद भी उनके नाम से आए राशन ने सैकड़ों अन्य जवानों को जीवनदान दिया था।

क्या है असम रेजिमेंट का इतिहास ?

असम रेजिमेंट (Assam Regiment) भारतीय सेना (Indian Army) की एक पैदल सेना रेजिमेंट है। 15 जून 1941 को शिलॉन्ग में लेफ्टिनेंट कर्नल रॉस हॉमैन ने असम के तत्कालीन अविभाजित राज्य के दावे से लड़ने के लिए और भारत के जापानी आक्रमण के खतरे का मुकाबला करने के लिए इसकी स्थापना की। वर्तमान में असम रेजिमेंट में कुल 25 बटालियन हैं, जिसमें 15 नियमित बटालियन (Regular battalion), 3 राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन (National Rifles Battalion), 5 प्रादेशिक पैदल सेना (Territorial infantry), पारिस्थितिक बटालियन (Ecological Battalion) और अरुणाचल स्काउट्स ( Arunachal Scouts) की 2 बटालियन शामिल है। असम रेजिमेंट का आदर्श वाक्य ‘असम विक्रम’ और युद्धघोष ‘राहीनो चार्ज” है। असम रेजिमेंट को शिलांग में एलिफेंट फॉल्स का क्षेत्र पहली बटालियन को चुनने के लिए चुना गया था और ब्रिटिश प्रशिक्षकों के तहत पहले सैनिकों को प्रशिक्षित किया गया। रेजिमेंट का प्रारंभिक मसौदा अविभाजित असम से तैयार किया गया था, और इसमें धनी अहोम, मिज़ोस, कुकिस, ग्रास, मीटिस और उनकी मार्शल को शामिल किया गया, बाद में निशि, मोनपा, अरुणाचल प्रदेश के अन्य जनजातियों, आदिवासियों, गोरखाओं और सिक्किमियों को भी रेजिमेंट में शामिल किया गया। असम रेजिमेंट पूर्वोत्तर के सात राज्यों और सिक्किम से संबंधित विविध रीति-रिवाजों, संस्कृतियों, भाषाओं, परंपराओं और लोकाचारों से बना है।

द्वितीय विश्व युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका

असम रेजिमेंट को अपनी स्थापना के छह महीने के बाद ही तेल क्षेत्रों की रक्षा के लिए डिगबोई में स्थानांतरित करने का आदेश दिया गया। 1942 की शुरुआत में यह लेडो में चली गई और प्रसिद्ध स्टिलवेल रोड के लिए संरेखण को फिर से जोड़ने में शामिल हई। 1944 में जब जापान द्वारा ब्रिटिश भारत पर आक्रमण किया गया, तब जापानियों की 31वें मंडल (31st division initially) या (Japan Ground Self-Defense Force) को रोकने के लिए असम रेजिमेंट को जेसमी और खारसोम (Jessami and Kharasom) में स्थानांतरित किया गया। युवा रेजिमेंट ने अपनी स्थापना के तीन साल के भीतर जल्द ही अपनी क्षमताओं को साबित कर दिया। जेसीमी की लगातार लड़ाइयों में, कोहिमा की महाकाव्य रक्षा और अराधुरा पर कब्जा करना असम रेजिमेंट की सबस बड़ी उपलब्धि थी, जिसके लिए असम रेजिमेंट को युद्ध सम्मान (अब पूर्व-स्वतंत्रता युद्ध सम्मान) से सम्मानित किया गया। असम रेजिमेंट ने द्वितीय विश्व युद्ध में अपने युद्ध कौशल के लिए उच्च प्रशंसा अर्जित की, अपने पहले ऑपरेशन में, रेजिमेंट ने 71 वीरता पुरस्कार जीते, इसके अलावा, रेजिमेंट ने जेसमी, कोहिमा, अरादुरा, टौंगगो, क्युकम्यांग पुल-प्रमुख और मवालिक सहित छह युद्ध सम्मान जीते। 1942-45 में असम रेजिमेंट को बर्मा थियेटर सम्मान से भी सम्मानित किया गया। रेजिमेंट का प्रतीक राइनो (गैंड़ा) है, जिसे सौनिक बेल्ट पर पहनते हैं। भारत में गैंडे आम तौर पर असम राज्य में पाए जाते हैं। भारतीय सेना में “टैगरा कहो” (“मजबूत रहो / फिट रहो”) का रेजिमेंटल का सलाम शब्द है, जिसकी शुरूआत 1960 में रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर स्वर्गीय मेजर जनरल एस.सी. बारबोरा द्वारा पहला बार प्रयोग किया गया था। जनरल एस.सी. बारबोरा अपने सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने के लिए उनसे “टैगरा हो” कहकर पूछते थे कि क्या आप मजबूत हैं ?”

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