18 सितंबर, 1615 : वह मनहूस दिन, जो भारत को 200 वर्षों की दासता दे गया…

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* सूरत में 404 वर्ष पहले पड़ी थी भारत की दासता की नींव

* थॉमस रो पहली बार अजमेर में मिले सुलतान जहाँगीर से

* जहाँगीर ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संबंध बनाए

* ईस्ट इंडिया कंपनी को मिली सूरत में व्यापार की अनुमति

* और 149 वर्षों में पूरे भारत को अंग्रेजों ने बना लिया ग़ुलाम

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 18, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। हर इंसान के जीवन में कोई ऐसी घटना, परिस्थति या हालात से जुड़ा एक ऐसा दिन अवश्य होता है, जिसे वह अपनी पूरी ज़िंदगी के मनहूस दिन के रूप में जीवन पर्यंत याद करता-रखता है। किसी मनुष्य के जीवन का वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन कोई भी हो सकता है, जिसके दुष्परिणाम उसे ही नहीं, अपितु उसकी आने वाली पीढ़ी तक को भुगतने पड़ते हैं, परंतु ऐसा यह केवल इंसानों के साथ ही नहीं होता, किसी स्थल या देश विशेष के साथ भी ऐसा हो सकता है, जब किसी शासक या सरकार के एक त्रुटिपूर्ण निर्णय का परिणाम पूरे देश को वर्तमान और भविष्य में वर्षों तक भुगतने पड़ते हैं। सबसे ताज़ा उदाहरण है धारा 370। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा तत्कालीन परिस्थितियों में जम्मू-कश्मीर में लागू की गई धारा 370 भावी भारत व जम्मू-कश्मीर दोनों के लिए बड़ी भूल बन गई, जिसे सुधारने में 72 वर्ष लग गए।

वैसे, आज हम धारा 370 पर चर्चा करने नहीं जा रहे। लौटते हैं मनहूस दिन के विषय पर। आज 18 सितंबर है। इस दिन के इतिहास पर नज़र डालें, तो विश्व व भारत के दृष्टिकोण से कई अच्छी घटनाएँ भी घटी थीं, परंतु एक घटना ऐसी भी घटी थी, जो भारत के लिए मनहूस सिद्ध हुई। हमारे देश भारत के इतिहास के साथ 404 वर्ष पूर्व 18 सितंबर, 1615 को एक ऐसी ही मनहूस घटना घटी थी, जिसने भारत को 200 वर्षों की दासता में धकेल दिया। अगर यह घटना न घटी होती, तो हमें न तो अंग्रेजों की 200 साल की दासता भोगनी पड़ती और न ही उनसे स्वतंत्रता के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ता तथा हजारों वीर सपूतों को बलिदान करना पड़ता। 18 सितंबर, 1615 के उस इस मनहूस दिन की नींव 441 वर्ष पहले यानी 1578 में पड़ी थी, जब इंग्लैंड के नाविक सर फ्रांसिस ड्रेक और उसके साथियों ने पुर्तगाल की वर्तमान राजधानी लिस्बन जाने वाले एक जहाज को लूटा। इस जहाज से सर फ्रांसिस ड्रेक को भारत जाने वाले रास्ते का मानचित्र मिला। सर फ्रांसिस ड्रेक ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ के समय के एक जहाज कप्तान, समुद्री लुटेरा, खोजी और राजनीतिज्ञ था। महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने 1581 में ड्रेक को नाइटहुड प्रदान किया था। वह स्पेनिश अरमाडा के खिलाफ अंग्रेज जहाज बेड़े के दूसरा प्रमुख व्यक्ति था। 1578 में जब ड्रेक को भारत का जो मानचित्र मिला, उसी मानचित्र ने ब्रिटिश शासकों के मन में भारत आने का विचार पैदा किया। इसी विचार को क्रियान्वित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 31 दिसम्बर, 1600 को ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की, जिसका उद्देश्य भारत के साथ व्यापार करना था।

भारत की समृद्धि ने अंग्रेजों को ललचाया

वर्ष 1606 में ब्रिटिश नाविक विलियम हॉकिन्स ईस्ट इंडिया कंपनी के कुछ जहाज लेकर भारत की ओर रवाना हुआ। उस समय भारत में मुग़ल शासक अकबर का शासन था। भारत एक संपन्न राष्ट्र था। उसे किसी विदेशी से व्यापार की आवश्यकता नहीं थी, परंतु भारत की समृद्धि से लालायित ब्रिटिश सरकार भारत के साथ व्यापार करने को आतुर थी। इसी मंसूबे को अंजाम देने के लिए 24 अगस्त, 1608 को विलियम हॉकिन्स भारत में समुद्री रास्ते से सूरत (अब गुजरात का महानगर) बंदरगाह पहुँचा, परंतु तब तक उससे पहले 27 अक्टूबर, 1605 को अकबर की मौत हो चुकी थी और उसका पुत्र नूरुद्दीन सलीम जहाँगीर दिल्ली का सुल्तान बन चुका था। सूरत में ईस्ट इंडिया कंपनी की ब्रिटिश फैक्ट्री खोलने आए हॉकिन्स को अब इसके लिए जहाँगीर से अनुमति लेनी थी। हॉकिन्स जब सूरत पहुँचा, तब जहाँगीर आगरा में था। हॉकिंस अप्रैल-1609 में वह आगरा पहुँचा, जहाँ उसने जहाँगीर के दरबार में अपनी फैक्ट्री खोलने की इच्छा व्यक्त की, परंतु जहाँगीर ने हॉकिन्स के प्रस्ताव को सिरे से ठुकरा दिया। यद्यपि हॉकिन्स जहाँगीर के दरबार में जगह पाने में सफल हो गया। हॉकिन्स ने तीन वर्षों तक जहाँगीर के दरबार में नौकरी की, व्यापार करने की मंजूरी नहीं ले पाया। अंतत: हॉकिन्स खाली हाथ इंग्लैंड लौट गया।

अब अंग्रेजों ने थॉमस रो को भेजा

विलियम हॉकिन्स की विफलता ने ब्रिटिश सरकार के इरादों पर पानी फेर दिया। इसके चलते ब्रिटिश सरकार ने अब भारत को तोड़ने के षडयंत्र की नीति अपनाई। उस समय पुर्तगाल और भारत मित्र देश थे और आपस में उनके व्यापारिक संबध भी थे। ब्रिटिश सरकार को पता था कि अगर भारत में व्यापार करना है, तो भारत के व्यापारी मित्रों को भारत से अलग करना होगा और ब्रिटिश सरकार ने ऐसा ही किया। 1611 में ब्रिटिश ने पुर्तगालियों पर सूरत में स्थित नवागाम बंदरगाह (जावली) पर हमला कर दिया। इस युद्ध में अंग्रेजों के हाथों पुर्तगालियों की हार हुई। इसके बाद इंग्लैंड के शासक जेम्स प्रथम ने 1615 में सर थॉमस रो को 600 पाउण्ड वार्षिक वेतन पर अपना राजदूत बनाकर जहाँगीर के दरबार में भेजा। थॉमस रो अपने जहाज पर सवार होकर भारत में अंग्रेजी फैक्ट्री डालने के उद्देश्य रवाना हुआ।

थॉमस की एक सलामी बन गई ग़ुलामी

शुक्रवार, 18 सितंबर, 1615 वह मनहूस दिन था, जब सर थॉमस रो ने भारत की धरती पर सूरत बंदरगाह पर अपना पहला कदम रखा। उधर जहाँगीर को सूचना मिला कि जेम्स प्रथम का राजदूत भारत आया है, तो उसने थॉमस को मिलने के लिए अपने राज दरबार में बुलाया। जहाँगीर ने थॉमस रो को सुरक्षित तरीके से राज दरबार में पेश करने का आदेश दिया। 4 महीने बाद 23 दिसंबर, 1615 को थॉमस अजमेर पहुँचा, जहाँ जहाँगीर ने दरबार लगा हुआ था। इस यात्रा के दौरान वह बेहद बीमार और कमज़ोर हो गया था। तीन हफ़्ते बाद यानी 10 जनवरी, 1616 को शाम 4 बजे उसे जहाँगीर के दरबार में जाने की अनुमति मिली। दरबार में पहुँचने पर थामस रो ने देखा कि जहाँगीर एक ऊँचे से आसन पर बैठा हुआ है और नीचे हाथियों पर दो सेवादार पंखा कर रहे हैं। थॉमस मुग़लिया तौर-तरीकों का जानकार था। इसलिए उसने तहज़ीब के मुताबिक़ जहाँगीर को झुक कर सलाम किया। जहाँगीर नें प्रसन्न होकर उसे सूरत में अंग्रेजी फैक्ट्री खोलने की अनुमति दो दी। इसके बाद 1617 में जहाँगीर के बेटे ख़ुर्रम (शाहजहाँ) ने थॉमस रो को बंगाल के रास्ते व्यापार करने के लिए आसान शर्तों पर मंज़ूरी दे दी। एक तरह से थॉमस को सब कुछ मुफ़्त में मिल गया। मौका मिलते ही ब्रिटिश सरकार ने अपने पैर पसारने शुरू किए और एक के बाद एक कई नई फैक्ट्रियों का निर्माण करना शुरू कर दिया। बालासोर (बालेश्वर), हरिहरपुर, मद्रास (1633), हुगली (1651) और मुम्बई (1688) में अंग्रेज फैक्ट्रियाँ स्थापित की गईं। भारत से व्यापारिक संबंध बिगड़ने के चलते पुर्तगालियों ने सूरत बंदरगाह पर हमला किया, तो मुग़लों ने अंग्रेज़ी नौसेना से सहायता मांगी। थॉमस रो ने यहाँ भी अपनी कूटनीति का प्रयोग करते हुए शाहजहाँ (1627-1658) को इस बात पर राज़ी कर लिया कि सहायता के बदले ईस्ट इंडिया कंपनी पर किसी प्रकार का व्यापारिक प्रतिबंध या टैक्स नहीं लगाया जाए। इस बीच भारत में अंग्रेजों की बढ़ती उपस्थिति और उनके द्वारा अपने सिक्के चलाने से मुग़ल शासक नाराज हुए। अंग्रजों को हुगली, कासिम बाज़ार, पटना, मछलीपट्टनम्, विशाखापत्तनम और बम्बई से निकाल दिया गया। 1690 में अंग्रेजों ने तत्कालीन मुग़ल बादशाह औरंगजेब (1655-1707) से क्षमा याचना की और अर्थदण्ड का भुगतान कर नई फैक्ट्रियाँ खोलने और किलेबंदी करने की अनुमति प्राप्त करने में सफल रहे। सर थॉमस रो लगभग तीन साल भारत में रहा और सूरत के अलावा बंगाल से भी ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापार करने की छूट दिलाने में कामयाब हुआ।

बक्सर युद्ध बना मुग़ल शासकों पर अंतिम चोट

सर थॉमस रो के 18 सितंबर, 1615 के दिन भारत की धरती पर पड़े पहले कदम अब अंग्रेजी व्यापार के रूप में पूरे भारत में फैल चुके थे। अंग्रेजों ने ‘फूट डालो’ की नीति अपना कर भारत के राजाओं को शाम-दाम-दंड-भेद के जरिए साध लिया और पूरे देश में फैल गए। इसी के चलते अब मुग़ल राजाओं ने अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए उनके विरुद्ध युद्ध शुरू कर दिए। 23 जून, 1757 को अंग्रेजों के विरुद्ध मुर्शिदाबाद के प्लासी में पहला युद्ध हुआ, जिसे हम प्लासी का युद्ध के नाम से भी जानते हैं। इसके बाद भी देश के अलग-अलग हिस्सों में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध हुए, परंतु 22 अक्टूबर, 1764 को हुआ ‘बक्सर का युद्ध’ भारत पर पूर्ण अंग्रेजी शासन में निर्णायक साबित हुआ। बक्सर के युद्ध में ब्रिटिशरों ने अपनी कूटनीतियों और चालबाजियों से युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व ही अवध के नवाब की सेना से ‘असद ख़ाँ’, ‘साहूमल’ और जैनुल अबादीन को धन का लालच देकर अलग कर दिया और मात्र 7 दिनों में ही युद्ध समाप्त हो गया। इस युद्ध में अंग्रेजों को एक बड़ी जीत मिली और इसके साथ ही भारत के शासन की बागडोर ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में चली गई। अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने पूरे भारत को ग़ुलाम बना लिया। 93 वर्ष बाद भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध 1857 का पहला विप्लव (विद्रोह) हुआ। इस विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से अपने हाथों में ले लिया। इसके बाद 1857 से लेकर 1947 तक यानी 90 वर्षों तक भारत पर अंग्रेजों का शासन रहा। कुल 200 वर्षों तक अंग्रेजों ने भारत को अपने अधीन रखा, जिसकी नींव 404 साल पहले थॉमस रो और जहाँगीर की मुलाक़ात से पड़ी थी। यदि 18 सितंबर, 1615 में थॉमस रो भारत न आया होता, यदि जहाँगीर ने ईस्ट इंडिया कंपनी को सूरत में फैक्ट्री खोलने की मंज़ूरी न दी होती, तो कदाचित भारत ग़ुलाम न बनता। इसीलिए भारत के लिए 18 सितंबर, 1615 का दिन मनहूस दिन बना।

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