हर ‘वाद’ कांग्रेस के खिलाफ, फिर कैसे बनेगी मोदी विरोधियों की बात ? आपको सोचने पर मजबूर कर देगी यह खबर, जरूर पढ़ें

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भारत स्वतंत्र हुआ और कांग्रेस को विरासत के रूप में सीधे देश की बागडोर मिली। एक पार्टी को विरासत में मिली सत्ता की बागडोर जब धीरे-धीरे एक परिवार की विरासत बनने लगी, तो समय-समय पर उसे चुनौतियाँ दी गईं।

कांग्रेस और उसके परिवारवाद के विरुद्ध देश में समय-समय पर आवाजें उठीं। कांग्रेस के विरुद्ध नए-नए वादियों ने मोर्चा खोला और उन्हें सफलता भी मिली। स्वतंत्रता के बाद जितने भी वादों का जन्म हुआ, वे सारे वाद कांग्रेस के विरुद्ध थे, लेकिन आज ये सारे वाद सिर्फ एक व्यक्ति के विरुद्ध उसी कांग्रेस की गोद में जाने को लालायित हैं, जिसके विरुद्ध उन्होंने अपनी और अपने वाद तथा दल की नींव रखी।

सबसे पहले बात करते हैं अंबेडकरवाद की। बेशक डॉ. बाबासाहब अंबेडकर कांग्रेस नेता थे और भारतीय संविधान निर्माता थे, परंतु कांग्रेस में ही कुछ लोगों को लगा कि कांग्रेस ने अंबेडकर को हासिये पर धकेल कर नेहरू-गांधी परिवार को ही सत्ता की विरासत देने की नीति अपनाई है, तो ऐसे लोगों ने अंबेडकरवाद अपनाया और अंबेडकर के नाम पर कई राजनीतिक दल बने। इसी प्रकार समाजवाद का नारा भी कांग्रेस के खिलाफ था, तो लोहियावाद तथा वामपंथवाद का जन्म भी कांग्रेस की खिलाफत के नाम पर हुआ। बहुजनवाद, जनता दल भी कांग्रेस के विरोध के रूप में जन्मे, तो शरद पवार ने तो सोनिया गांधी के विदेश मूल को ही मुद्दा बना कर कांग्रेस के विरुद्ध राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई। इन तमाम कांग्रेस विरोधी वादों ने देश में वामपंथी दल, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, एनसीपी, जनता दल, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस सहित कई ऐसे राजनीतिक दल पैदा किए, जिनका एजेंडा केवल और केवल कांग्रेस तथा उसके परिवारवाद के खिलाफ लड़ना था।

आज समय की बलिहारी देखिए कि देश के तमाम छोटे-बड़े कांग्रेस विरोधी दल केवल एक व्यक्ति यानी नरेन्द्र मोदी को सत्ता से हटाने के नाम पर अपने सिद्धांतों के साथ नापाक समझौता करने को तैयार हो गए। मोदी को हटाने के लिए हर वह दल कांग्रेस की गोद में बैठने को तैयार है, जिसकी नींव ही कांग्रेस विरोध के नाम पर रखी गई।

ऐसे में मतदाताओं को स्वयं ही सोचना होगा कि देश के हित में क्या अच्छा होगा और क्या बुरा होगा ? सत्ता के नाम पर और सत्ता के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता करने वाले तथाकथित कांग्रेस विरोधी ‘वादों’ पर कितना भरोसा करना चाहिए ? यह बात स्वयं मतदाता को सोचनी होगी और चुनाव में अपना निर्णायक मत देना होगा।

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