प्रीतिलता वादेदार : एक ऐसी स्वतंत्रता सेनानी, जिन्हें अंग्रेजों के हाथों मरना भी गँवारा न था

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* साथी क्रांतिकारियों की हत्या का लिया प्रतिशोध

* यूरोपियन क्लब में जमा अंग्रेजों पर की बमबारी

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 24, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। भारत की 200 वर्षों की अंग्रेजी दासता के विरुद्ध लगभग 90 वर्षों तक चले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अनेक सपूतों ने अपना प्राणों की आहूति दी, परंतु जब हम सपूत लिखते हैं, तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे केवल पुरुष ही थे। भारत को अंग्रेजों से आज़ाद कराने के लिए युवतियों-महिलाओं ने भी बड़ी संख्या में न केवल संघर्ष किया, अपितु वीरांगनाओं की तरह लड़ते हुए अपने जीवन का बलिदान भी कर दिया।

भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध पहला विद्रोह वर्ष 1857 में हुआ था, जो विफल रहा था। इसके बाद छोटे-छोटे स्तरों पर अंग्रेजों के विरुद्ध भारत में चिनगारियाँ भड़कती रहीं, परंतु वर्ष 1905 में जब अंग्रेजों ने तत्कालीन बंगाल (वर्तमान में पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बांग्लादेश) का विभाजन करने का निर्णय किया, तब 48 वर्षों के बाद फिर एक बार अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीयों ने विद्रोह का बिगुल फूँका और बंग भंग विरोधी आंदोलन आरंभ हुआ। बंगाल क्रांति के नाम से प्रसिद्ध हुए इस आंदोलन में जहाँ सैकड़ों भारतीयों ने अंग्रेजी हुक़ूमत को चुनौती दी, वहीं इस आंदोलन में महिलाओं, विशेषकर बंगाल की युवतियाँ और महिलाएँ भी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में कूद पड़ीं। ऐसी ही एक स्वतंत्रता सेनानी थीं क्रांतिकारिणी प्रीतिलता वादेदार।

झाँसी की रानी का नया अवतार बनीं प्रीतिलता

प्रीतिलता वादेदार एक ऐसी स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्हें अंग्रेजों के शासन में जीना तो दूर, उनके या उनकी पुलिस के हाथों मरना तक गँवारा नहीं था। यही कारण है कि प्रीतिलता वादेदार बंगाल क्रांति के दौरान शहीद तो हुईं, परंतु अंग्रेजों की गोली या फाँसी से नहीं, अपितु उन्होंने स्वयं मृत्यु का वरण किया। उनके प्यार का नाम यानी बचपन का नाम रानी था। अपने नाम के ही अनुरूप प्रीतिलता वादेदार झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से बहुत प्रभावित थीं, जिन्होंने 1857 के विप्लव में अंग्रेजों के विरुद्ध एक वीरांगना की तरह लड़ते हुए अपने प्राणों की आहूति दी थी। प्रीतिलता भी बंगाल क्रांति के दौरान झाँसी की रानी के नए अवतार के रूप में अंग्रेजों के विरुद्ध संग्राम में कूद पडी थीं। आज हम इस महान व्यक्तित्व को इस लिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज़ादी की इस वीरांगना की आज 87वीं पुण्यतिथि है। प्रीतिलता वादेदार ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए केवल 21 वर्ष की आयु में 24 सितंबर, 1932 को अपने प्राणों की आहुति दी थी।

अभी चिनगारी थीं प्रीतिलता, पर डर गए अंग्रेज

प्रीतिलता वादेदार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महान क्रांतिकारिणी, मेधावी छात्रा और एक निर्भीक लेखिका थीं। उनका जन्म 5 मई, 1911 को तत्कालीन ब्रिटिश बंगाल (अब बांग्लादेश) में स्थित चटगाँव के एक ग़रीब परिवार में हुआ था। उनके पिता चटगाँव नगर पालिका के लिपिक (Clerk) थे। प्रीतिलता की प्रारम्भिक शिक्षा चटगाँव के डॉ खस्तागिर शासकीय कन्या विद्यालय (Dr. Khastagir Government Girls’ High School) से हुई। वह बचपन से ही पढ़ने में तेज़ थीं। 17 वर्ष की आयु में 1928 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की। इसके बाद 1929 में ढाका के इडेन कॉलेज (Eden College) से बारवीं की परीक्षा दी, जिसमें वह पूरे ढाका कॉलेज में 5वें स्थान पर आईं। 2 वर्ष बाद यानी 1931 में प्रीतिलता ने कोलकाता के बेथुन कॉलेज (Bethune College) से दर्शन शास्त्र (Philosophy) से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की, परंतु उन्हें डिग्री नहीं मिली। दरअसल किसी महिला की शिक्षा के दिशा में इतनी बड़ी उपलब्धि और स्वतंत्रता कार्यों में अग्रसर रहने वाली प्रीतिलता से ब्रिटिश सरकार को भय हो गया था कि कहीं आगे चल कर प्रीतिलता उनके मार्ग की बाधा न बन जाएँ। इसलिए कोलकाता विश्वविद्यालय के ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रीतिलता की डिग्री को रोक दिया, हालाँकि 80 वर्ष बाद 2012 में मरणोपरांत प्रीतिलता को उनके प्रमाण पत्र से सम्मानित किया गया।

बालचरी में पनपे क्रांति के बीज

प्रीतिलता स्कूल से ही बालचरी (Scouting) संस्था की सदस्या थीं, जहाँ उन्होंने सेवाभाव और अनुशासन का पाठ सीखा। बालचरी संस्था में बालचर सदस्यों को ब्रिटिश सम्राट के प्रति एकनिष्ठ रहने की शपथ लेनी पड़ती थी, जो प्रीतिलता को खटकती थी और उन्हें बेचैन कर देती थी। इसी संस्थान से उनके मन में क्रांति के बीच उत्पन्न हुए। बेथुन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही वह क्रांतिकारियों के संपर्क में आ चुकी थीं। शिक्षा उपरान्त उन्होंने परिवार की आर्थिक सहायता करने के लिए एक पाठशाला में नौकरी कर ली, परंतु उनका लक्ष्य माँ भारती के स्वतंत्र करना था, जिस दिशा में आगे बढ़कर उन्होंने क्रांतिकारी निर्मल सेन से युद्ध का प्रशिक्षण लिया। पाठशाला में नौकरी के दौरान करते हुए उनकी भेंट प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्य सेन से हुई। सूर्य सेन उस समय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारियों में से एक थे। सूर्य सेन ने इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (Indian Republican Army) की स्थापना की और चटगाँव विद्रोह का सफल नेतृत्व किया। वे नेशनल हाईस्कूल में सीनियर ग्रेजुएट शिक्षक के रूप में कार्यरत थे और लोग प्यार से उन्हें “मास्टर दा” कहकर संबोधित करते थे। प्रीतिलता उनके दल की सक्रिय सदस्य बन गईं। प्रीतिलता बचपन से ही न्याय के लिए निर्भीक विरोध करने से भी पीछे नहीं हटती थीं। स्कूली पढ़ाई के दौरान प्रीतिलता ने शिक्षा विभाग के एक आदेश के विरुद्ध अन्य छात्राओं के साथ मिल कर विरोध किया, जिसके लिए उन सभी छात्राओं को स्कूल से निकाल दिया गया।

प्रीतिलता की बुद्धिमत्ता के आगे अंग्रेज हुए फेल

प्रीतिलता जब सूर्य सेन से मिलीं, तब वे अज्ञातवास में थे। उनका एक साथी रामकृष्ण विश्वास कलकत्ता के अलीपुर जेल में था। उसे फांसी की सज़ा सुनाई गयी थी। रामकृष्ण से मिलना आसान नहीं था। इसके बावजूद प्रीतिलता नें अपनी बुद्धिमत्ता और बहादुरी का परिचय देते हुए रामकृष्ण विश्वास से कारागार में एक-दो बार नहीं, अपितु 40 बार मिलीं और किसी अधिकारी को भनक तक नहीं लगने दी। इसके बाद प्रीतिलता सूर्य सेन के नेतृत्त्व वाली इन्डियन रिपब्लिकन आर्मी में महिला सैनिक के रूप में नियुक्त हुईं और स्वतंत्रता संग्राम में अपना दमखम लगा दिया। तभी एक सभा के दौरान पूर्वी बंगाल के घलघाट में क्रांतिकारियों को ब्रिटिश पुलिस ने घेर लिया, जिसमें अपूर्व सेन, निर्मल सेन, प्रीतिलता और सूर्यसेन भी थे। सूर्य सेन ने अंग्रेजों से लड़ने का आदेश दिया। इस लड़ाई में अपूर्वसेन और निर्मल सेन शहीद हो गये, जबकि सूर्य सेन की गोली से अंग्रेज अधिकारी कैप्टन कैमरान मारा गया। सूर्यसेन और प्रीतिलता अकेले पड़ गए, दोनों ने वहाँ से भाग निकलना ही उचित समझा।

बमबारी कर लिया साथियों की शहादत का बदला

सूर्य सेन ने अपने साथियों के बलिदान का बदला लेने के लिए एक योजना बनाई। इसके तहत बंगाल स्थित चिटगाँव की पहाड़ी के तलहटी में पहराली यूरोपीय क्लब (Pahartali European Club) पर धावा बोलना था। इस क्लब में अंग्रेजों की नाचने-गाने की महफिलें होती थीं। सूर्य सेन ने यूरोपियन क्लब पर आक्रमण करने के लिए 24 सितम्बर 1932 का दिन चुना। प्रीतिलता ने इस योजना का नेतृत्त्व करते हुए क्रांतिकारियों को एकत्र किया। हथियारों से सज्ज प्रीतिलता ने अपने साथ पोटेशियम साइनाइड नामक विष भी रख लिया, क्योंकि वे अंग्रजों के हाथों मरना नहीं चाहती थीं। 24 सितंबर, 1932 को रात होते ही पूरी तैयारी के साथ प्रीतिलता यूरोपीय क्लब पहुचीं और बाहर से क्लब की खिड़की में बम लग दिए। क्लब की इमारत बम के फटने और पिस्तौल की आवाज़ से काँपने लगी। जश्न में डूबे क्लब के वातावरण में एकाएक चीखें सुनाई देने लगी। 13 अंग्रेज घायल हो गये और बाकी भाग निकले। इस घटना में एक यूरोपीय महिला मारी गयी। कुछ देर बाद क्लब से अंग्रेजों ने गोलीबारी करनी शुरू कर दी, जिसमें से एक गोली प्रीतिलता को लगी। प्रीतिलता घायल अवस्था में क्लब से भागीं, परंतु वे अधिक दूर न भाग पाईं और गिर गईं। घायल प्रीतिलता को जब लगा कि वे या तो अंग्रेज पुलिस के हाथों पकड़ी जाएंगी या मार दी जाएंगी या फाँसी पर लटका दी जाएंगी, तो उन्होंने अपने साथ लाया विष यानी पोटेशियम सायनाइड खा लिया और मृत्यु का वरण किया। प्रीतिलता के आत्म बलिदान के बाद अंग्रेज अधिकारियों को तलाशी में एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था, ‘चटगाँव शस्त्रागार काण्ड के बाद जो मार्ग अपनाया जाएगा, वह भावी विद्रोह का प्राथमिक रूप होगा। यह संघर्ष भारत को पूरी स्वतंत्रता मिलने तक जारी रहेगी।’

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