‘मेरी मौत पर रोना मत’ और लोगों ने हँसते हुए ही विदा किया इस महान हास्य हस्ती को

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* एक साधारण प्रभुलाल गर्ग से कैसे प्रसिद्ध हास्य कवि बन गए काका हाथरसी ?

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 18, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। इसे शुभ संयोग कहें या दुर्भाग्य कि किसी व्यक्ति को अपने ही जन्म दिन पर संसार को छोड़ कर जाना पड़े। एक ओर जहाँ किसी व्यक्ति का पूरा परिवार खुशी मनाने जा रहा हो, घर की साज-सजावट में लगा हो, वहीं दूसरी तरफ वह व्यक्ति मौत की नींद सो जाए, तो परिवार और परिजनों पर क्या बीतेगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इस बात की कल्पना मात्र से ही आपके रोंगटे खड़े हो जाएँगे, परंतु देश और दुनिया में कई ऐसे लोग हुए, जिन्होंने इस दुनिया से अपने जन्म दिन वाले दिन ही प्रयाण किया और ऐसे ही व्यक्तित्वों में शामिल थे काका हाथरसी। 18 सितंबर, 1906 को जन्मे काका हाथरसी का निधन 18 सितंबर, 1995 को 90 वर्ष की आयु में निधन हुआ था। आज काका हाथरसी की 113वीं जयंती और 24वीं पुण्यतिथि है। काका हाथरसी ऐसी सख्सियत थे, जो जब तक जीवित रहे, लोगों को हँसाते ही रहे और मृत्यु के बाद भी वे अपने पीछे अपनी रचनाओं का ऐसा ख़जाना छोड़ गए, जो आज भी लोगों को हँसाते हैं। उनकी अनेक रचनाएँ आज भी युवा पीढ़ी के लेखन में एक सहायक मार्गदर्शन का काम कर रही है। आइए जानते हैं कौन थे हास्य जगत के वह महापुरुष, जिन्होंने अपनी वसीयत में लिखा था, ‘मेरी मौत पर रोना मत’। एक हास्य कवि, महान लेखक और दुनिया को अपनी बातों से गुदगुदाने वाले उस महान व्यक्ति का नाम है काका हाथरसी। वैसे तो काका किसी परिचय के मोहताज नहीं है, परंतु आज उनकी जयंती व पुण्यतिथि हम आपके समक्ष उनके जीवन से जुड़े कुछ तत्थ रखने जा रहे हैं।

प्रभुलाल का संघर्षपूर्ण बचपन

काका हाथरसी का जन्म 18 सितंबर, 1906 को उत्तर प्रदेश में स्थित हाथरस में हुआ था, उनका मूल नाम प्रभुलाल गर्ग था। उनके दादा सीताराम गर्ग गोकुल महावन से आकर हाथरस में बस गए और यहाँ बर्तन-विक्रय का काम करने लगे। बर्तन के व्यापारियों को उन दिनों ‘कसेरे’ कहा जाता था। काका के पिता बर्तनों की एक दुकान पर मुनीमगीरी करते थे। काका का जन्म उस दौर में हुआ था, जब देश में ताऊन या प्लेग (Plague) जैसी बीमारी ने हज़ारों घरों को उज़ाड़ दिया था। यह बीमारी भारत में 1815 में मिस्र, लीबिया और सीरिया से चल कर चीन होते हुए 1835-1836 में भारत पहुँची। प्लेग गाँवों और शहरों को वीरान बनाता जा रही था। घर उजड़ रहे थे, बच्चे अनाथ हो गए, महिलाएँ विधवा हो रही थीं। उसी दौरान सीताराम गर्ग प्लेग की चपेट में आ गए और उनकी मौत हो गई। पिता की मौत के समय प्रभुलाल गर्ग मात्र 15 दिनों के थे और उनकी माँ बरफी देवी की आयु 20 वर्ष थी। बरफी देवी अपने बड़े बटे भजन लाला और 15 दिन के पुत्र प्रभुलाल लेकर अपने इगलास-अलीगढ़ स्थित मायके चलीं गईं, परंतु कुछ समय बीतने के बाद बरफी देवी दोनों बच्चों को लेकर हाथरस लौट आईं। अब बड़ा सवाल यह था कि घर कैसे चलाया जाए ? इसी दौरान बरफी देवी के भाई ने 8 रूपए प्रतिमाह बरफी देवी को भेजना शुरू किया, जिससे उनका गुज़ारा होने लगा। प्रभुलाल गर्ग जब 10 वर्ष के हुए, तो मामा ने उन्हें पढ़ने के लिए अपने गाँव इगलास बुला लिया। प्रभुलाल ने इगलास से स्कूल की पढ़ाई पूरी की और बाद में 6 रूपए के मासिक वेतन पर नौकरी करने लगे। उन्होंने बचपन में चाट-पकौड़ी तक बेची।

पहली कविता मामा के वक़ील पर लिखी

प्रभुलाल गर्ग में छिपा भविष्य का काका हाथरसी बचपन में ही झलक दिखाने लगा था। उन्होंने अपनी पहली हास्य कविता का बाण अपने मामा के पड़ोसी वकील लखमी चंद पर ही छोड़ा, जो इस प्रकार है :

एक पुलिंदा बांध कर, कर दी उस पर सील
खोला तो निकले वहाँ, लखमी चंद वकील
लखमी चंद वकील, वज़न में इतने भारी
शक्ल देख कर पंचर हो जाती है लारी
होकर के मज़बूर, ऊँट गाड़ी में जाएँ
पहिए चूँ-चूँ करें, ऊँट को मिरगी आए

और प्रभु बन गए काका हाथरसी

प्रभुलाल गर्ग को बचपन में नाटक में भी काम करने का शौक़ था। एक नाटक में उन्होंने ‘काका’ का किरदार निभाया और बस तभी से प्रभूलाल गर्ग ‘काका’ नाम से प्रसिद्ध हो गए। 14 वर्ष की आयु में प्रभुलाल गर्ग एक कवि के रूप में अपने पैतृक गाँव हाथरस लौट आए और इसी कारण काका हाथरसी के रूप में प्रसिद्ध हुए। यद्यपि अभी प्रसिद्धि की चोटी पर पहुँचने के आड़े संघर्ष शेष था। यही कारण था कि हाथरस लौटने के बाद काका ने एक जगह ‘मुनीम’ की नौकरी कर ली। 16 वर्ष की आयु में काका की शादी रतन देवी से हुई। काका की कविताओं में उनकी पत्नी रतन देवी हमेशा ‘काकी’ बनी रहीं, परंतु दुर्भाग्य ने काका का साथ नहीं छोड़ा। विवाह के कुछ दिनों बाद ही काका की नौकरी छूट गई। धनोपार्जन के लिए काका ने व्यवसाय के रूप में चित्रशाला शुरू कर दी, परंतु वह भी नहीं चल सकी। बाद में काका ने अपने एक मित्र के सहयोग से संगीत कार्यालय की नींव रखी। इसी कार्यालय से उन्होंने 1934 में संगीत पर आधारित ‘संगीत पत्रिका’ प्रकाशित की, जिसका प्रकाशन आज भी काका हाथरसी के बेटे लक्ष्मीनारायण निरंतर प्रकाशित कर रहे हैं। काका ने अब लेखन को अपनी पहचान बनाना शुरू कर दिया। उनकी प्रथम प्रकाशित रचना 1933 में ‘गुलदस्ता’ मासिक पत्रिका में उनके वास्तविक नाम प्रभुलाल गर्ग से छपी थी। उस कविता की पंक्ति थी,‘घुटा करती हैं मेरी हसरतें दिन रात सीने में, मेरा दिल घुटते-घुटते सख़्त होकर सिल न बन जाए’। इसके बाद काका की कई कविताओं का लगातार प्रकाशन होता रहा। उनकी रचनाएँ हास्य से लिप्त समाज पर एक तीखा प्रहार थी। प्रस्तुत है उनकी रचना के कुछ अंश..

“मन मैला, तन ऊजरा, भाषण लच्छेदार
ऊपर सत्याचार है, भीतर भ्रष्टाचार
झूठों के घर पंडित बाँचें, कथा सत्य भगवान की
जय बोलो बेईमान की!”

काका हाथरसी ने हास्य रस से ओत-प्रोत कविताओं के साथ-साथ संगीत पर भी पुस्तकें लिखी, उन्होंने संगीत पर एक मासिक पत्रिका का सम्पादन भी किया। ‘काका के कारतूस’ और ‘काका की फुलझडियाँ’ जैसे स्तम्भों के द्वारा अपने पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देते हुए, काका अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों के प्रति भी सचेत रहते थे। जीवन के संघर्षों के बीच हास्य की फुलझड़ियाँ जलाने वाले काका हाथरसी ने 1932 में हाथरस में संगीत की उन्नति के लिये ‘गर्ग ऐंड कम्पनी’ की स्थापना की, जिसका नाम बाद में ‘संगीत कार्यालय हाथरस’ हुआ। भारतीय संगीत के सन्दर्भ में विभिन्न भाषा और लिपि में किये गये कार्यों को उन्होंने प्रकाशित किया, उनकी लिखी पुस्तकें संगीत विद्यालयों में पाठ्य-पुस्तकों के रूप में पढ़ाई जाती हैं। काका हाथरसी का मंचीय कवियों में एक विशिष्ट स्थान था। सैकड़ों कवि सम्मेलनों में काका ने काव्य पाठ किया और अपनी छाप छोड़।

जब लाल किले से बजाया ‘क्रांति का बिगुल’

काका को 1957 में दिल्ली में लाल किले पर आयोजित कवि सम्मेलन में आमंत्रित किया गया। काका ने अपने अंदाज़ में ‘क्रांति का बिगुल’ कविता सुना कर अपनी एक अलग पहचान बना ली। 1966 में बृजकला केंद्र के कार्यक्रम में काका को सम्मानित किया गया। काका हाथरसी को ‘कला रत्न’ ने भी नवाजा जा चुका है। 1985 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने ‘पद्मश्री’ की उपाधि से भी नवाजा। काका कई बार विदेश में काव्य पाठ करने भी गए और एक अलह ही पहचान बनाकर लौटे। 1989 में काका को अमेरिका के वाल्टीमौर में ‘आनरेरी सिटीजन’ के सम्मान से सम्मानित किया गया, यही नहीं काका ने फ़िल्म ‘जमुना किनारे’ में अभिनय भी किया। काका का कहना था कि हास्य एक टॉनिक है।

ठहाकों के साथ दी गई विदाई

हमेशा अपनी रचनाओं से सबका मनोरंजन करने वाले काका हाथरसी का 18 सितंबर 1995 को दुनिया से अलविदा कह गए। ठहाकों के बादशाह काका हाथरसी की विदाई ठहाकों से ही दी गई, उनकी शवयात्रा ऊंटगाड़ी पर निकली और अंतिम संस्कार के समय श्मशान स्थल पर कवि सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें देश के प्रसिद्ध कवि अशोक चक्रधर मौजूद थे और जिसका संचालन ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवि सुरेश चतुर्वेदी ने किया था। काका ने दूसरो को हंसाने से पहले खुद पर ही कविता पाठ किया। उन्होंने थके-हारे इंसान को हास्य कविता के माध्यम से हंसने, गुदगुदाने व ठहाके लगाने को मजबूर कर दिया। उन्होंने लोगों को यही मंत्र दिया- भोजन आधा पेट कर, दुगना पानी पीउ, तिगुना श्रम, चौगुन हँसी, वर्ष सवा सौ जीउ। काका हिंदी हास्य कवि थे, उनकी शैली की छाप उनकी पीढ़ी के अन्य कवियों पर तो पड़ी ही है, आज भी अनेक लेखक और व्यंग्य कवि काका की रचनाओं की शैली अपनाकर लाखों श्रोताओं और पाठकों का मनोरंजन कर रहे हैं।

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