पूर्ण विराम नहीं है कॉमा : यदि ‘जीवित’ जाग जाएँ, तो अर्थी पर जाता ‘मृतक’ भी बन सकता है ‘वरदान’ !

Written by

अहमदाबाद, 11 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। ‘दान’ का शाब्दिक अर्थ है – ‘देने की क्रिया’। सभी धर्मों में सुपात्र को दान देना परम् कर्तव्य माना गया है। हिन्दू धर्म में दान की बहुत महिमा बतायी गयी है। वर्तमान में दान का अर्थ किसी जरूरतमन्द को सहायता के रूप में कुछ देना माना जाता है। दान का अर्थ है किसी वस्तु पर से अपना अधिकार समाप्त करके उस पर दूसरे का अधिकार स्थापित कर देना। साथ ही यह आवश्यक है कि दान में दी हुई वस्तु के बदले में किसी प्रकार का विनिमय नहीं होना चाहिए। इस दान की पूर्ति तभी कही गई है, जब दान में दी हुई वस्तु के पर उसे पाने वाले का अधिकार स्थापित हो जाए। सात्विक, राजस और तामस, इन भेदों से दान तीन प्रकार का कहा गया है। जो दान पवित्र स्थान में और उत्तम समय में ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जिसने दाता पर किसी प्रकार का उपकार न किया हो वह सात्विक दान है। अपने ऊपर किए हुए किसी प्रकार के उपकार के बदले में अथवा किसी फल की आकांक्षा से अथवा विवशतावश जो दान दिया जाता है वह राजस दान कहा जाता है। अपवित्र स्थान एवं अनुचित समय में बिना सत्कार के, अवज्ञतार्पूक एवं अयोग्य व्यक्ति को जो दान दिया जात है वह तामस दान कहा गया है। कायिक, वाचिक और मानसिक इन भेदों से पुन: दान के तीन भेद गिनाए गए हैं। संकल्पपूर्वक जो सुवर्ण, रजत आदि दान दिया जाता है वह कायिक दान है। अपने निकट किसी भयभीत व्यक्ति के आने पर जौ अभय दान दिया जाता है वह वाचिक दान है। जप और ध्यान प्रकृति को अर्पण किया जाता है, उसे मानसिक दान कहते हैं।

बात आधुनिक युग की करें, तो वर्तमान में भी लोग अनेक प्रकार के दान करते हैं। चूँकि दान देने की प्रक्रिया है, अत: स्पष्ट है कि यह दान कोई भी व्यक्ति जीवित रह कर ही कर सकता है, परंतु आधुनिक चिकित्सा विज्ञान क्षेत्र ने दान की परिभाषा में रक्तदान, नेत्रदान, वृक्क (गुर्दा-किडनी) दान, यकृत (लिवर-जिगर) दान और मरणोपरांत अंगदान को भी जोड़ दिया है। इनमें रक्तदान को छोड़ कर शेष सभी दान ऐसे हैं, जो या तो कोई व्यक्ति अपने जीते-जी अपनी इच्छा से ‘मरणोपरांत दान’ की घोषणा कर सकता है या फिर ऐसा न कर पाने वाले किसी मृत व्यक्ति के जीवित परिजन ही कर सकते हैं और उसके ज़रिए अन्य लोगों को जीवनदान दे सकते हैं। अभी पिछले महीने ही दिल्ली में एक ऐसा ही उदाहरण देखने को मिला, जब 21 वर्षीय जसमान की मृत्यु हो गई। छत से गिरने से सिर में आई गहरी चोट के कारण दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में दम तोड़ देने वाला जसमान तो अब कुछ नहीं कर सकता था, क्योंकि वह कॉमा में जाने के बाद मृत्यु को प्राप्त हो चुका था, परंतु उसके जीवित परिजनों ने जागृति दिखाई और जसमान की दो किडनियाँ और लिवर दान करने का निर्णय किया। जसमान के परिजनों की इस जागरूकता के चलते जसमान की एक किडनी और लिवर को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी AIIMS में भेजा गया, जबकि एक किडनी राम मनोहर लोहिया अस्पताल में ही भर्ती एक ज़रूरतमंद मरीद़ के शरीर में ट्रांसप्लांट कर कर दी गई, जिससे उसे नया जीवन मिल गया। 42 वर्षीय मरीज़, जिन्हें मृतक जसमान की किडनी लगाई गई है, वे 2017 से किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे।

क्या है अंगदान ?

किसी जीवित या मृत व्यक्ति के शरीर का ऊतक या कोई अंग दान करना अंगदान (Organ donation) कहलाता है। यह ऊतक या अंग किसी दूसरे जीवित व्यक्ति के शरीर में प्रत्यारोपित (Transplant ) किया जाता है। इस कार्य के लिये दाता के शरीर से दान किये हुए अंग को शल्यक्रिया (Surgery ) करके निकाला जाता है। भारत में कार्निया (आँख का सबसे सामने वाला पारदर्शी काँच जैसा हिस्सा कार्निया कहलाता है।) दान की स्थिति काफी अच्छी है किन्तु ‘मस्तिष्क मृत्यु’ यानी मस्तिष्क का पूर्णतः काम करना बन्द करना तथा अच्छे होने की कोई सम्भावना न होना मस्तिष्क मृत्यु (Brain death) कहलाता है। जाने वाले देह दान में बहुत धीमी गति से प्रगति हो रही है।

1 अंगदान से 8 जीवनदान, पर केवल 8 राज्य ही जागरूक !

एक अंगदान से 8 लोगों की जान बचाई जा सकती है। अंगदान के जरिए गुर्दा, लिवर, दिल, फेफड़े, आंख, किडनी और चमड़ी दान कर हजारों लोगों की जिन्दगियाँ बचाई जा सकती हैं, परंतु भारत में आज भी भ्रम और अंधविश्वास के कारण ऐसा करने से डरते हैं, उन्हें लगता है कि अगर अंगदान कर दिया तो मोक्ष नहीं मिलेगा या अगला जन्म हुआ तो बिना अंग के ही जन्म होगा। इसके अलावा सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौत के मामले में भी सरकारी नियमों के अनुसार, केवल उन्हीं के अंग निकाले जा सकते हैं, जिनकी मृत्यु अस्पताल में होती है। एक अन्य प्रमुख कारण यह है कि बहुत से लोग अपने जीवनकाल में अपने अंगों को दान करने की इच्छा (निधन होने पर अंगों को दान करने की एक पंजीकृत इच्छा) ही नहीं करते हैं और सबसे बड़ा और प्रमुख कारण है जागरुकता की कमी। भारत की 136 करोड़ जमसंख्या होने का बाद भी अंगदान में वह सबसे पीछे ही है। भारत के 36 राज्यों में केलव 8 राज्य तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, दिल्ली, केरेला और पंजाब हैं जो अंग दान सी सूची में शामिल हैं। वर्ष 2013 में 310 बहु-अंग दाताओं से कुल 845 अंगों प्राप्त किया गया, जो इस साल का प्रति मिलियन 0.26 प्रतिशित राष्ट्रीय अंग दान दर था। 2005 में 30 लाख लोगों की अंग प्रत्यारोपण के अभाव में मृत्यु हो गई, वहीं गुर्दे के जरूरतमंद 2,00,000 मरीजों में से केवल 9,000 मरीजों को ही एक गुर्दा मिल पाता है। भारत में हर साल लगभग 1.5 लाख किडनी की आवश्यकाता पड़ती है, परंतु केवल 5000 किडनी ही दान के रूप में उपलब्ध हो पाती है।

112 वर्ष पूर्व हुआ पहला अंगदान प्रयास

भारत ही नहीँ दुनिया में अंग प्रत्यारोपण की शुरूआत किडनी प्रत्यारोपण से की गई। गुर्दा यानी किडनी (Kidney ) मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है। स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर में सामान्यत: दो किडनी होती है। किडनी की खराबी, किसी गंभीर बीमारी या मौत का कारण भी बन सकता है। किडनी की रचना और उसके कार्य अत्यंत जटिल हैं। वह दो प्रकार से कार्य करती है, हानिकारक अपशिष्ट उत्पादों और विषैले कचरे को शरीर से बाहर निकालना और शरीर में पानी, तरल पदार्थ, खनिजों (इलेक्ट्रोलाइट्स के रूप में सोडियम, पोटेशियम) का नियमन करना। सर्वप्रथम किडनी ट्रांसप्लांट की संभावना के बारे में उल्लेख अमेरिकी चिकित्सक और शोधकर्ता साइमन फ्लेक्सनर ने 1907 में शिकागो विश्वविद्यालय में “पैथोलॉजीज में टेंडर्स” में किया था। 1933 में सोवियत संघ में खेरसन के सर्जन यूरी वोरोनी ने सर्वप्रथम मानव गुर्दा प्रत्यारोपण का प्रयास किया, जिसमें एक मृतक के शरीर से छह घंटे पहले निकाले गए गुर्दे को दूसरे व्यक्ति में प्रत्यारोपित किया गया, परंतु रोगी की दो दिन बाद मृत्यु हो गई। इसके बाद 17 जून, 1950 को एवरग्रीन पार्क, इलिनोइस के मैरी हॉस्पिटल की लिटिल कंपनी में डॉ. रिचर्ड लॉलर ने पॉलीसिस्टिक किडनी की बीमारी से पीड़ित 44 वर्षीय महिला रूथ टकर पर एक सफल प्रत्यारोपण किया और वह पांच साल तक जीवित रहीं। इसके बाद से कई सफल-असफल किडनी प्रत्यारोपण किए गए और फिर 1952 में जीन हैम्बर्गर ने पेरिस के नेकर अस्पताल में एक जीवित व्यक्ति की किडनी एक रोगी के शरीर में ट्रांसप्लांट की, परंतु किडनी 3 सप्ताह के बाद विफल हो गई। इसके बाद जीवित व्यक्तियों का पहला सफल अंग प्रत्यारोपण 23 दिसंबर, 1954 को ब्रिघम हॉस्पिटल बोस्टन किया गया।

भारत में 1965 में हुआ पहला अंग प्रत्यारोपण

विश्व में मानव प्रत्यारोपण की प्रगति को ध्यान में रखते हुए, भारत में भी मानव अंग प्रत्यारोपण की दिशा में प्रयास किए जाने लगे। 1950 के दशक में मुंबई के किंग एडवर्ड सप्तम मेमोरियल अस्पताल के डॉ. पीके सेन और उनकी टीम ने इम्यूनोसप्रेसिव टाइमलाइन में शुरुआती प्रायोगिक किडनी और लिवर प्रत्यारोपण का प्रयास कुत्तों में किया। भारत में पहली बार मानव किडनी प्रत्यारोपण मई 1965 में मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में किया गया था, जिसमें एक गैर-गुर्दे की विफलता वाले पैन में कैडेवर डोनर का उपयोग करके एक गैर-गुर्दे की विफलता वाले रोगी में एक कैडेवर दाता का उपयोग किया गया, जिसे हाइपरनेफ्रोमा कहा गया। अप्रैल 1966 में दूसरा किडनी ट्रांसप्लांट एक बार फिर एक कैडेवर डोनर को क्रोनिक रीनल फेल्योर के मामले में एक ही टीम ने किया। इसके बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) वाराणसी से डॉ. उडुपा और उनकी टीम ने इसी तरह के कैडेवर प्रत्यारोपण किए। इससे पहले हुए दोनों प्रत्यारोपणों के रोगियों की मृत्यु हो गई।

अंग प्रत्यारोपण को लेकर क्या है कानून ?

भारत सरकार ने फ़रवरी 1995 में ‘मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम’ लागू किया गया, जिसके अन्तर्गत अंगदान और मस्तिष्क मृत्यु को क़ानूनी वैधता प्रदान की गई है, परंतु ‘मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम 1994’ के अनुसार अंगों और ऊतकों की बिक्री पूर्णत: प्रतिबंधित किया गया और यदि ऐसा पाया जाता है, तो दोषियों को दंड और जुर्माना देने का प्रावधान किया गया, जबकि अन्य देशों में कानून कुछ अलग ही तरह से काम करते हैं। स्पेन- पूरी दुनिया में अंग दान सबसे ज्यादा स्पेन में होता है। स्पेन अंग दान के लिए ऑप्ट-आउट सिस्टम का अनुसरण करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका- संयुक्त राज्य में अंगों की आवश्यकता तेजी से बढ़ रही है। हालांकि अंग दाताओं की संख्या में वृद्धि हुई है परन्तु अंगों के लिए इंतजार कर रहे मरीजों की संख्या भी बहुत तेजी से बढ़ी रही है। संयुक्त राज्य में अंग दान केवल दाता या उनके परिवार की सहमति से किया जाता है। यहाँ कई संगठन ऑप्ट-आउट अंग दान के लिए जोर दे रहे हैं। यूनाइटेड किंगडम- यूनाइटेड किंगडम में अंग दान स्वैच्छिक है। यहां हर वह व्यक्ति जो मृत्यु के बाद अपने अंगों को दान करना चाहता हैं उसे पंजीकरण करना आवश्यक होता है। ईरान- ईरान एक ऐसा देश है, जो अंगों के प्रत्यारोपण की कमी से उबरने में सक्षम है। ईरान में अंग दान के लिए एक कानूनी भुगतान प्रणाली है। यह एकमात्र देश है,जिसने अंग दान के व्यापार को वैध किया है। जापान- अन्य पश्चिमी देशों की तुलना में जापान में अंग दान काफी कम है। यह मुख्यतः सांस्कृतिक कारणों, पश्चिमी दवाइयों में अविश्वास और 1968 में एक विवादास्पद अंग प्रत्यारोपण के कारण है। कोलंबिया- कोलंबिया में अगस्त 2016 में पारित ‘लॉ 1805’ ने अंग दान के लिए ऑप्ट-आउट पॉलिसी पेश की। चिली- चिली ने अंगदान के लिए ऑप्ट-आउट पॉलिसी के लिए ‘कानून 20,413’ बनाया, जिसमें 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी नागरिक अंगों को दान करेंगे अगर वे मृत्यु से पहले इसे विशेष रूप से अस्वीकार नहीं करते।

Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares