हैफा दिवस : जब भारतीय जवानों ने तीर-तलवारों से कुचला था तोप-गनों से सज्ज तुर्क-जर्मन सेना को

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रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 23, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। सैनिक, सिपाही या योद्धा नाम कोई भी हो ,परंतु इनका काम केवल एक ही होता है, अपने देश और देशवासियों की रक्षा में स्वयं को बलिदान कर देना। भारत का प्रत्येक सैनिक सेना में इसी उद्देश्य से भर्ती होता है कि वह आवश्यकता पड़ने पर अपनी मातृभूमि पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देगा। अपने कर्तव्य पथ से कभी अडिग नहीं होगा और अनुशासन में रहते हुए देश की मिट्टी की रक्षा करेगा। भारतीय सेना के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें विपरीत परिस्थितियों में होते हुए भी भारतीय सैनिकों ने दुश्मनों को नाकों चने चबाने पर विवश कर दिया। भारत ही नहीं, विदेशी धरती पर भी भारतीय सैनिकों ने अपने रक्त से शौर्य गाथाएँ लिखकर माँ भारती की आन बढ़ाई है।

आज हम भारतीय सैनिकों की वीर गाथा की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि 101 वर्ष पहले आज ही के दिन भारत के वीर जवानों ने इज़राइल के हैफा शहर को ओट्टोमन साम्राज्य (उस्मानी साम्राज्य) से मुक्त कराया था। हैफा की स्वतंत्रता के लिए किए गए इस युद्ध में 44 भारतीय सैनिकों ने अपने प्राणों की आहूति दे दी थी। इन सैनिकों श्रद्धांजलि देने के लिए भारत और इज़राइल में प्रति वर्ष 23 सितंबर को हैफा दिवस मनाया जाता है। आज 101वें हैफा दिवस (Haifa Day) के अवसर पर हम आपको उन भारतीय सैनिकों की वीर गाथा से परिचित कराने जा रहे हैं, जिन्होंने 23 सितंबर, 1918 को तुर्की सेना के विरूद्ध लड़ते हुए इज़राइल के हैफा शहर को आज़ाद कराया था। हैफा उत्तरी इज़राइल का सबसे बड़ा और इज़राइल का तीसरा सबसे बड़ा नगर है। इसकी जनसंख्या लगभग 3 लाख है। हैफा में ही बहाई विश्व केन्द्र (Baha’i World Centre) भी है, जिसे संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक व सांस्कृतिक संगठन (United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization) यानी UNESCO ने विश्व विरासत घोषित किया है।

मोदी ने 99वें हैफा दिवस पर किया था नमन

आज भी इज़राइल के सात शहरों (हैफा, यरुशलम, रामलेह और ख्यात बीच) में स्मारक के रुप में मौजूद हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब 2017 में इज़राइल दौरे पर गए थे, उन्होंने वीर भीरतीय सैनिकों के स्मारक पर 99वें हैफा दिवस पर पुष्पांजलि अर्पित करके भारतीय वीरों को नमन किया था। स्मारक पर जाने से पहले पीएम मोदी ने कहा था, यह उन 44 भारतीय सैनिकों की अंतिम विश्रामस्थली है, जिन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान शहर को आज़ाद कराने के लिए अपनी प्राण न्यौछावर कर दिए।

भारतीय सैनिकों ने भाले-तीर और तलवारों से जीता युद्ध

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान उस्मानी तुर्कियों की सेनाओं ने हैफा शहर में घुसपैठ की। सेनाएँ हैफा के यहूदियों पर अत्याचार कर रही थी। ब्रटिश शासन ने तुर्की को सबक सिखाने और उसकी सेना को हैफा से खदेड़ने के लिए भारतीय सैनिकों को हैफा भेजने का निर्णय लिया, जिसने हैफा को तुर्कियों से आज़ाद कराया। हैफा शहर की आज़ादी के लिए ब्रिटिश शासकों ने तीन भारतीय रेजीमेंटों जोधपुर लांसर्स (Jodhpur Lancers), मैसूर लांसर्स (Mysore Lancers) और हैदराबाद लांसर्स (Hyderabad Lancers) को भेजा। हैफा पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए एक तरफ़ मशीन गन और तोपों से लैस तुर्की और जर्मनी की सेनाएँ खड़ी थीं, तो दूसरी तरफ़ अंग्रेज़ों की तरफ़ से भेजे गए 1,50,000 भारतीय जवानों के पास भाले और तलवारें ही थे। भारतीय सेना की इन तीनों रेजीमेंट के जवान 15वीं इम्पीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड (15th Imperial Service Cavalry Brigade) के अंतर्गत अपना रण कौशल दिखा रहे थे। भालों और तलवारों से लैस भारतीय घुड़सवार सैनिक हैफा में मौज़ूद तुर्की मोर्चों और माउंट कारमल पर तैनात तुर्की तोपखाने को तहस-नहस करने के लिए हमले कर रहे थे। तुर्की सेना का वह मोर्चा बहुत मज़बूत था, परंतु भारतीय सैनिकों की घुड़सवार टुकड़ियों, जोधपुर लांसर्स और मैसूर लांसर्स ने वह शौर्य कर दिखाया, जिसका सशस्त्र सेनाओं के इतिहास में कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। खासकर जोधपुर लांसर्स ने अपने सेनापति मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत के नेतृत्व में हैफा मुक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिस सेना के हिस्सा होने के नाते दुश्मन सैनिकों से लड़ते हुए इन भारतीय रेजीमेंटों ने हैफा शहर को 23 सितंबर, 1918 के दिन स्वतंत्र कराने में सफलता प्राप्त कर ली।

ठाकुर दलपत सिंह शेखावत ने दिया बलिदान

हैफा की स्वतंत्रता के लिए लड़े गए युद्ध की अगुवाई जोधपुर लांसर्स के मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत कर रहे थे। यद्यपि इस युद्ध में ठाकुर ने अपना बलिदान देकर एक सच्चे सैनिक का परिचय दिया। ठाकुर दलपत सिंह शेखावत राजस्थान में पाली जिले के देवली पाबूजी के रहने वाले थे। शेखावत 18 साल की उम्र में वे जोधपुर लांसर में बतौर घुड़सवार भर्ती हुए और बाद में मेजर बने। उनकी उसी बहादुरी को सम्मानित करते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें मरणोपरांत मिलिटरी क्रॉस मेडल (Military Cross Medal) से सम्मानित किया। ब्रिटिश सेना के एक बड़े अधिकारी कर्नल हार्वी ने उनकी याद में कहा था, “उनकी मृत्यु केवल जोधपुर वालों के लिए ही नहीं, बल्कि भारत और पूरे ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक बड़ी क्षति है।” मेजर ठाकुर दलपत सिंह के अलावा कैप्टन अनूप सिंह और लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह को भी मिलिटरी क्रॉस पदक दिया गया था। इस युद्ध में कैप्टन बहादुर अमन सिंह जोधा और दफादार जोर सिंह को भी उनकी बहादुरी के लिए इंडियन ऑर्डर ऑफ़ मेरिट (Indian Order of Merit) पदक से सम्मानित किया गया था।

राजधानी दिल्ली में तीन मूर्ति भवन

राजधानी दिल्ली में तीन मूर्ति भवन (Teen Murti Bhavan) के सामने की सड़क के बीच लगी तीन सैनिकों की मूर्तियाँ उन्हीं तीन घुड़सवार रेजीमेंटों की प्रतीक हैं, जिन्होंने अपनी प्राण न्यौछावर करके हैफा शहर को उस्मानी तुर्कों से मुक्त कराया था। तीन मूर्ति भवन में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का आवास था। उनके बाद में उनकी स्मृति में इसे संग्रहालय के रूप में बदल दिया गया है। उनके जीवन की झलक आज भी यहाँ उनके छाया-चित्रों में देखी जा सकती है। सीढ़ीनुमा गुलाब उद्यान एवं एक दूरबीन यहाँ के प्रमुख आकर्षण हैं। इसी गुलाब उद्यान से नेहरू अपनी शेरवानी का गुलाब चुना करते थे।

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