अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस : भारत को आज सेंट जिरोम को नहीं, दारा शिकोह को याद करना चाहिए : जानिए क्यों ?

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 30, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। आज अन्तर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस है। प्रति वर्ष 30 सितंबर को यह दिन वर्ष 342-420 के दौरान हुए से सेंट जिरोम की याद में मनाया जाता है। लैटिन कैथोलिस्ट कन्फेसर, धर्मगुरु, थियोलॉजिन तथा इतिहासविद् सेंट जिरोम ने ईसाइयों के पवित्र धर्म ग्रंथ बाइबल का ग्रीक भाषा में अनुवाद किया था और एक एक नई ही परम्परा को जन्म दिया था। यद्यपि सेंट जिरोम के इस महान कार्य को अविस्मरणीय बनाने का कार्य अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद संघ (International Federation of Translators) यानी IFT ने किया। 1953 से कार्यरत् आईएफटी ने आरंभ में तो दो अलग-अलग भाषाओं के जानकारों के बीच सेतु बनने वाले अनुवादकों और अनुवाद को प्रोत्साहन देने की दिशा में कार्य किया। फिर 1991 में आईएफटी ने बाइबल के अनुवाद सेंट जिरोम की स्मृति में आधिकारिक तौर अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस मनाने का विचार सबके सामने रखा था। इससे दुनिया भर में अनुवाद समुदाय की एकता को बढ़ावा मिला साथ ही विभिन्न देशों में अनुवाद कार्य को महत्व मिला और अनुवाद कार्य तेजी से बढ़ने लगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 24 मई, 2017 को एक अधिनियम पारित किया, जिसमें 30 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस के रूप में घोषित किया गया। इस अधिनियम के तहत राष्ट्रों को व्यवसायिक अनुवाद के तौर पर जोड़ना था। एक अनुवादक जब किसी एक भाषा में लिखी सामग्री को दूसरी भाषा में अनुवाद करता है, तो वे न सिर्फ भाषा के द्वारा एक संस्कृति को दूसरी संस्कृति से परिचित कराता है, अपितु दो अलग-अलग सभ्यता के लोगों के दिलों के भी मिलाने का काम करता है।

आज 30 सितंबर को जब पूरा विश्व सेंट जिरोम की स्मृति में तीसरा अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस मना रहा है, तब यदि भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो आज का दिन प्रसिद्ध मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के पुत्र दारा शिकोह को याद किया जाना चाहिए। इसका कारण यह है कि दारा शिकोह भी एक ऐसे महान अनुवादक थे, जिन्होंने भारतीय सनातन, वैदिक धर्म संस्कृति का अरब जगत से परिचय कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे दारा शिकोह ही थे, जिन्होंने वेदों का फ़ारसी में अनुवाद कर भारत में अनुवाद की परम्परा को मुग़ल शासन में शुरू किया था। उनके अनुवाद के माध्यम से ही वेदों में लिखा ज्ञान विदेशों तक पहुँचा। आइए जानते हैं कौन थे दारा शिकोह, जो एक मुस्लिम होते हुए भी भारतीय वेदांत दर्शन से इतने प्रभावित थे कि शूली पर चढ़ते समय उनके चेहरे पर सिकन तक नहीं थीं।

मोहम्मद दारा शिकोह का जन्म 20 मार्च, 1615 को राजस्थान के अजमेर में हुआ था। वे मुग़ल बादशाह शहाब-उद-दिन मुहम्मद खुर्रम यानी शाहजहाँ (1552-1666) और मुमताज़ महल के सबसे बड़े पुत्र थे। दारा शिकोह शाहजहाँ को बहुत प्रिय थे और उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। दारा शिकोह भी अपने पिता शाहजहाँ का बहुत सम्मान करते थे और उनके प्रत्येक आदेश का पालन करते थे। आरम्भ में दारा शिकोह को पंजाब का सूबेदार बनाया गया, जिसका शासन वे राजधानी से अपने प्रतिनिधियों के ज़रिये चलाते थे। बादशाही ख़ानदान में जन्म लेने के बावजूद दारा शिकोह की अपनी एक पृथक विचारधारा थी। उनके जीवन का महान ध्येय था हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भाईचारा कायम करना। इस कार्य को करने लिए वे कई साधु-संतों और पंडितों के पास गये। दारा शिकोह सर्वप्रथम संत मियाँ मीर के पास गये और उनसे धर्म के विषय में जानकारी ली। वहाँ से उन्हें हिन्दू धर्म के उपनिषदों के विषय जानकारी मिली। दारा शिकोह ने अब अपना लक्ष्य उपनिषदों के विषय में जानना और उसे फ़ारसी में अनुवाद करना बना लिया। वह काशी (वाराणसी) गये और उन दिनों में काशी में रह रहे मालवा प्रांत के बाबा लाल बैरागी से मिले और वेदों की जानकारी ली। उनसे संस्कृत सीखी और उपनिषद, गीता और योग वशिष्ठ का फ़ारसी में अनुवाद किया। उन्होंने 52 उपनिषदों का अनुवाद ‘सिर्र-ए-अकबर’ नाम से अनुवाद किया, जिसका अर्थ है ‘ईश्वरीय शब्द’। 17वीं शताब्दी में उपनिषदों के इसी फारसी अनुवाद से फ्रांसीसी अनुवाद हुआ और फिर लैटिन भाषा में इसका अनुवाद होकर यह 19वीं शताब्दी में जर्मनी के आर्थर शापनहावर तक पहुँचा, जिन्होंने इसे ‘मानवीय ज्ञान की पराकाष्ठा’ कहा। इसके बाद जर्मनी में वैदिक अध्ययन के प्रति 19वीं शताब्दी में दिलचस्पी उत्पन्न हुई। 20वीं शताब्दी के अनेक महान जर्मन वैज्ञानिकों आइंस्टीन, ऑटोहॉन और हाइजनबर्ग के विचारों पर वैदिक ज्ञान और दर्शन के प्रभाव के संकेत अनेक पुस्तकों में उपलब्ध हैं।

दारा शिकोह आगे चलकर एक सूफी बुद्धिजीवी बने, जिनका मानना था कि हर किसी के लिए भगवान की तलाश समान है। उन्होंने अपना जीवन वेदांतिक और इस्लामिक अध्यात्म में समन्वय बैठाने के प्रति समर्पित कर दिया। वे मानते थे कि कुरान में अदृश्य किताब अल-मकनन वास्तव में उपनिषद थे। दारा शिकोह ने भारतीय उपनिषद और भारतीय दर्शन की अच्छी जानकारी प्राप्त कर ली थी, जिसके चलते शाहजहाँ ने ये तय कर लिया कि उनकी गद्दी दारा शिकोह ही संभालेंगे, क्योंकि उन्होंने हिंदुस्तान को और उसकी परम्परा को अच्छे से समझ लिया है और वे ही शासन चलाने के लिए बेहतर साबित होंगे, परंतु औरंगज़ेब को यह बाद रास न आई। शासन और सत्ता के लालच में आकर उसने अपने पिता को क़िला बंद करा दिया और बड़े भाई दारा शिकोह को विद्रोही घोषित कर दिया। औरंगज़ेब को डर था कि अगर दारा शिकोह सफल हुआ, तो इस्लाम खतरे में आ जाएगा। 1657 में जब शाहजहाँ बीमार पड़ गये, उस समय दारा शिकोह वेद की शिक्षा लेने काशी गये हुए थे। औरंगज़ेब के लिए यह बहुत ही अच्छा अवसर था। उसने गद्दी पर कब्ज़ा कर लिया। औरंगज़ेब कट्टर मुसलमान था और दारा के विचारों को इस्लाम के विरुद्ध मानता था। उसने इस्लामिक मौलवियों और उलेमाओं की परिषद् बुलाई। इस परिषद में उसने अपने समर्थकों को भर रखा था। इस परिषद ने दारा शिकोह को शांति भंग करने और इस्लाम के प्रति ग़द्दारी का दोषी घोषित किया और 30 अगस्त, 1659 की रात दारा शिकोह को फ़ांसी पर लटका दिया गया।

इसीलिए भाजपा-आरएसएस को भी भाते हैं दारा शिकोह

दिल्ली में हुई एक गोष्ठी में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (Aligarh Muslim University) ने केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय को दारा शिकोह (Dara Shikoh) की जीवनी को इतिहास की किताबों में शामिल करने का प्रस्ताव भी दिया है। इस गोष्ठी में अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी और आरएसएस (RSS) नेता कृष्ण गोपाल भी शामिल थे। दरअसल बीजेपी और आरएसएस मुस्लिम समुदाय के बीच दारा शिकोह को एक अच्छे मुसलमान (good muslim) के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। ये एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जहाँ एक ओर औरंगज़ेब ने हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं, मान्यताओं को नष्ट करने का काम किया, वहीं उसके भाई दारा शिकोह ने हमेशा सर्वधर्म समभाव की बात कही। दारा शिकोह धार्मिक सहिष्णुता और धर्म निरपेक्षता के पक्षधर रहे। बीजेपी और आरएसएस उनकी इसी छवि को मुसलमानों के बीच अधिक से अधिक प्रचारित करना चाहते हैं।

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