घर से समाज सुधार आरंभ करने वाले इन महापुरुष में ईश्वर, चंद्र, विद्या और सागर के सभी गुण थे…

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आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 26, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। ईश्वर जैसी शक्ति, चंद्र जैसी शीतलता, विद्या जैसे ग्राही और सागर जैसा विशाल व्यक्तित्व रखते थे ईश्वर चंद्र विद्यासागर। ईश्वर चंद्र एक ऐसे महा नायक थे, जिन्होंने घर को ही रण भूमि बना दिया था। अपने ही बेटे की शादी एक विधवा स्त्री से करवा कर उन्होंने उन सभी समाज के ठेकेदारों से जंग छेड़ दी थी, जो उस समय के ऊँचे पदों पर तो आसीन थे, मगर उनकी सोच बहुत छोटी थी। समाज में कमजोर, नीची जाति और विधवा स्त्रियों को समाज का कलंकित अंग माना जाता था। ईश्वर चंद्र ने इन सभी रूढ़ीवादी प्रथा और समाज के बनाये नियमों को नकारते हुए इसे जड़ से मिटा डाला। ईश्वरचंद्र को गरीबों और दलितों का संरक्षक माना जाने लगा। उन्होंने नारी शिक्षा और विधवा विवाह कानून के लिये आवाज उठाई। उन्होंने समाज में फैली कुरीतियों को समाप्त करने के लिये कई कार्य किये, जिस कारण आगे चल कर उन्हें समाज सुधारक के तौर पर पहचान मिली। उन्हें बंगाल में पुनर्जागरण के स्तंभों में से एक माना जाता है। आज हम ईश्वर चंद्र विद्यासागर को इस लिये याद कर रहे हैं, क्योंकि आज इन महान समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की 199वीं जयंती है। आइये जानते हैं कैसे ईश्वर चंद्र “ईश्वर चंद्र विद्यासागर” बने और कैसे उन्होंने समाज को एक नया आइना दिखाया?

ईश्वर चंद्र से ईश्वर चंद्र विद्यासागर का सफर

ईश्वर चंद्र विद्यासागर उन्नीसवीं शताब्दी के बंगाल के एक प्रसिद्ध दार्शनिक, शिक्षाविद, समाज सुधारक, लेखक, अनुवादक, मुद्रक, प्रकाशक, उद्यमी और परोपकारी व्यक्ति थे। उनका जन्म 26 सितंबर, 1820 को बंगाल में मेदिनीपुर जिले के वीरसिंह गाँव में हुआ था। वह एक अति निर्धन दलित परिवार से थे, उनके पिता का नाम ठाकुरदास वन्द्योपाध्याय था। ईश्वर का मूल नाम ईश्वर चंद्र बंद्योपाध्याय था। ईश्वर बचपन से ही तीक्ष्णबुद्धि वाले बालक थे। पिता ने ईश्वर को हमेशा पढ़ने के प्रति जागरुक किया, या यूँ कहें कि ईश्वर को पिता से विरासत में विद्या ही मिली। ईश्वर जब 9 साल के थे तब वह अपने पिता के साथ पद यात्रा करके कोलकाता पहुँचे थे। जहाँ उन्होंने संस्कृत कॉलेज में शिक्षा लेना आरंभ किया। विषम परिस्थितियों के बाद भी ईश्वर ने अपनी प्रत्येक परीक्षा को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने 1839 में सफलतापूर्वक अपनी कानून परीक्षा उत्तीर्ण की। ईश्वर ने मात्र 21 वर्ष की आयु में संस्कृत व्याकरण, साहित्य, भाषाशास्त्र, अलंकार शास्त्र, वेदांत, स्मृति और खगोल विज्ञान में योग्यता प्राप्त की। संस्कृत भाषा और दर्शन में अगाध ज्ञान होने के कारण विद्यार्थी जीवन में ही संस्कृत कॉलेज ने उन्हें ‘विद्यासागर’ की उपाधि प्रदान की। इसके बाद से उनका नाम ईश्वर चंद्र विद्यासागर हो गया। संस्कृत कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद 1841 में संस्कृत विभाग के प्रमुख के रूप में कोलकाता के फोर्ट विलियम कॉलेज (Fort William College) में 50 रुपये मासिक पर मुख्य पण्डित के पद पर नौकरी कर ली। 1846 में ईश्वर को अपने ही कॉलेज यानी संस्कृत कालेज में सहकारी सम्पादक के रूप में काम करने का अवसर मिला, परंतु शुरूआती दिनों में ही कुछ मतभेद के चलते ईश्वर चंद्र ने पद से त्यागपत्र दे दिया। 1851 ईश्वर ने दोबारा फोर्ट विलियम कॉलेज में मुख्याध्यक्ष के रूप में नौकरी की। 1855 में वह असिस्टेंट इंस्पेक्टर बने और फिर पाँच सौ रुपये मासिक वेतन पर स्पेशल इंस्पेक्टर नियुक्त हुए। 1858 में मतभेद होने पर फोर्ट विलियम कॉलेज से त्यागपत्र दे दिया और साहित्य तथा समाजसेवा के कार्यों में लग गये। ईश्वर को 1880 में सी.आई.ई. (Companion of the Indian Empire) से सम्मानित किया गया था।

बेटे की शादी विधवा से कराई

उन दिनों बालिकाओं की पढ़ाई और विधवा विवाह एक बहुत बड़ा सामाजिक मुद्दा था, जिसका ईश्वर ने पुरजोर विरोध किया था। बालिकाओं को शिक्षा दिलाने के लिये उन्होंने हर संभव प्रयास किया। स्त्रीशिक्षा को सार्थक बनाने के लिये उन्होंने जे डी बेथ्यून की सहायता से मेट्रो पोलिस गर्ल्स स्कूल की स्थापना की, जिसके संचालन का भार ईश्वर ने स्वयं संभाला था, साथ ही अनेक सहायता प्राप्त स्कूलों की भी स्थापना कराई। संस्कृत अध्ययन के लिये एक सुगम प्रणाली निर्मित की। इसके अतिरिक्त शिक्षा प्रणाली में अनेक सुधार किये। कट्टरपंथियों के तीव्र विरोध के बाद भी उन्होंने विधवाओं के विवाह के लिये आवाज उठाई और उसके फलस्वरूप विधवा पुनर्विवाह कानून-1856 पारित हुआ। इसकी शुरुआत उन्होंने स्वयं के बेटे की शादी एक विधवा से करा कर की। इसके बाद उन्होंने बहुपत्नी प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ भी सराहनीय कार्य किये। नैतिक मूल्यों के संरक्षक और शिक्षाविद् विद्यासागर का मानना था कि अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं के ज्ञान का समन्वय करके भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं की श्रेष्ठता को हासिल किया जा सकता है। संस्कृत कॉलेज में अब तक केवल ब्राह्मण और वैद्य ही विद्योपार्जन कर सकते थे, अपने प्रयत्नों से उन्होंने समस्त हिन्दुओं के लिये विद्याध्ययन के द्वार खोले। ईश्वर साहित्य के क्षेत्र में बँगला गद्य के प्रथम प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने 52 पुस्तकों की रचना की, जिनमें 17 संस्कृत में थीं, 5 अँग्रेजी में और शेष बँगला भाषा में थीं। इन पुस्तकों के द्वारा उन्होंने विशेष साहित्य कीर्ति अर्जित की। उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें ‘वैतालपंचविंशति’, ‘शकुंतला’ तथा ‘सीतावनवास’ हैं। मेधावी, स्वावलंबी, स्वाभिमानी, मानवीय, अध्यवसायी, दृढ़प्रतिज्ञ, दानवीर, विद्यासागर, त्यागमूर्ति ईश्वरचंद्र ने अपने व्यक्तित्व और कार्यक्षमता से शिक्षा, साहित्य तथा समाज के क्षेत्रों में अमिट पद चिह्न छोड़े।

‘नंदन कानन’ के ईश्वर चन्द्र विद्यासागर

ईश्वर चंद्र अपना जीवन एक साधारण व्यक्ति की तरह जीते थे, दान पुण्य और सामाजिक सुधार ही उनका लक्ष्य था। वे घर में ही बुने हुए साधारण सूती वस्त्र धारण करते थे, जो उनकी माता जी बुनती थीं। परिवार के क्षुद्र व स्वार्थी व्यवहार से परेशान होकर वह बिहार (अब झारखण्ड) के जामताड़ा जिले के करमाटांड़ गाँव चले गये, जहाँ उन्होंने अपना जीवन करमाटांड़ के सन्ताल आदिवासियों के कल्याण के लिये समर्पित किया। उनके निवास का नाम ‘नन्दन कानन’ (नन्दन वन) था। उनके सम्मान में अब करमाटांड़ स्टेशन का नाम ‘विद्यासागर रेलवे स्टेशन’ कर दिया गया है। 29 जुलाई, 1891 को ईश्वर चंद्र विद्यासागर संसार को अलविदा कह गये। उनकी मृत्यु के बाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा, “लोग आश्चर्य करते हैं कि ईश्वर ने चालीस लाख बंगालियों में कैसे एक मनुष्य को पैदा किया!” दरअसल ईश्वर की मृत्यु के बाद उनका घर यानी नन्दन कानन को उनके बेटे नारायण चंद्र बंद्योपाध्याय ने बेच दिया। नन्दन कानन अब टूटने की कगार पर आ गया है, परंतु करमाटांड़ के निवासी, जो ईश्वर से बहुत प्रेम करते थे, उन्होंने ऐसा नहीं होने दिया। बिहार के बंगाली संघ ने घर-घर से एक एक रुपया अनुदान एकत्र कर 29 मार्च 1974 को उसे खरीद लिया। बालिका विद्यालय पुनः प्रारम्भ किया गया, जिसका नामकरण विद्यासागर के नाम पर किया गया है। निःशुल्क होम्योपैथिक क्लिनिक स्थानीय जनता की सेवा कर रहा है। विद्यासागर के निवास स्थान के मूल रूप को आज भी व्यवस्थित रखा गया है। सबसे मूल्यवान सम्पत्ति लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुरानी ‘पालकी’है जिसे स्वयं विद्यासागर प्रयोग करते थे, वह आज भी यहाँ विद्यमान है।

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