टूटेगा नहीं, अपितु और भव्य बनेगा लोकतंत्र का 98 वर्ष पुराना यह मंदिर

Written by

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 28, सितंबर 2019 (युवाPRESS)। भारत का लगातार डिजिटल होने की ओर बढ़ाया गया हर कदम हर बार एक नई चुनौती से गुज़र रहा है। डिजिटल क्रांति के इस युग में कई सारे लाभ हैं, तो कई बार तथ्य से परे जानकारी भी लोगों में भ्रम पैदा कर देती है। ऐसी ही एक भ्रांति यह फैली है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व उनकी सरकार भारतीय लोकतंत्र के मंदिर यानी ऐतिहासिक संसद को ध्वस्त कर उसका पुननिर्माण कराने वाली है, परंतु यह धारणा पूर्णत: भ्रांतिपूर्ण है।

वास्तव में यह भ्रांति तब फैली, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद के नवनिर्माण के बारे में अपने विचार सार्वजनिक किए। इसके बाद केन्द्रीय आवास एवं नगरीय मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘नये भारत’ की परिकल्पना के अनुसार भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये 2030 तक देश के 70 प्रतिशत शहरी क्षेत्र में पुनर्निर्माण किया जाएगा। यह ख़बर आते ही जनता और कुछ वरिष्ठ महानुभावों को भारत के हर भवन और कार्यालय गिरते दिखाई देने लगे। कल्पनाओं की उड़ान भर रहे लोगों ने 98 वर्ष पुराने संसद को भी नहीं छोड़ा। संसद के टूटने और पुननिर्माण की बातें भी होने लगी, परंतु हाल ही में हरदीप सिंह पुरी ने ही संसद भवन तोड़े जाने की बात को सिरे से निरस्त कर दिया और कहा कि संसद का ऐतिहासिक भवन तोड़ने का सरकार का कोई इरादा नहीं है।

पाण्डवों का इंद्रप्रस्थ कैस बना अनंगपाल तोमर की दिल्ली?

बात जब संसद की निकली है, तो आइए आपको संसद से पहले उस राजधानी दिल्ली के बारे में बताते हैं, जहाँ संसद है। महाभारत काल में दिल्ली का उल्लेख हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ के रूप में मिलता है। यदि इतिहास पर दृष्टि डालें, तो दिल्ली की स्थापना वर्ष 900-1200 के दौरान हुई थी। दिल्ली में अंतिम हिन्दू सम्राट के रूप में महाराज पृथ्वीराज चौहान (1178-1192) थे। पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चंद बरदाई (1165-1192) की एक हिंदी रचना ‘पृथ्वीराज रासो’ में कहा गया है कि तोमर वंश के राजा अनंगपाल तोमर (900-1200) ने दिल्ली की स्थापना की थी। माना जाता है कि अनंगपाल ने ही 1060 में ‘लाल-कोट’ (वर्तमान लाला किले) का निर्माण कराया और महरौली के गुप्त कालीन लौह-स्तंभ को दिल्ली में स्थापित किया। लाला कोट वर्तमान दिल्ली क्षेत्र का प्रथम निर्मित नगर था। दिल्ली नाम के पीछे भी कई रहस्य और कहानियाँ छिपी हैं। कहा जाता है कि ईसा पूर्व 50 में एक मौर्य राजा हुआ करते थे, जिसका नाम धिल्लु था और लोग उन्हें दिलु भी कहा करते थे और उनके नाम धिल्लु का अपभ्रंश होकर राजधानी का नाम दिल्ली पड़ा। ‘दिल्ली’ या ‘दिल्लिका’ शब्दों का प्रयोग सर्वप्रथम उदयपुर में पाए गए 1170 में लिखे गए शिलालेखों में मिलता है।

7 बार उजाड़ने के बाद, जब दिल्ली बनी राजधानी

1206 के बाद दिल्ली ‘दिल्ली सल्तनत’ (1206-1526) की राजधानी बनी, जिस पर खिलज़ी वंश, तुग़लक वंश, सैयद वंश और लोधी वंश समेत कुछ अन्य वंशों ने शासन किया। ऐसा माना जाता है दिल्ली को सात बार उजाड़ कर विभिन्न स्थानों पर बसाया गया, जिनके कुछ अवशेष आधुनिक दिल्ली में आज भी मिलते हैं। शाहजहाँ (1627-1658) ने दिल्ली को 7वीं बार बसाया था और दिल्ली को शाहजहाँबाद नाम से दिया। शाहजहाँबाद को पुराना शहर या पुरानी दिल्ली कहा जाता है। प्राचीनकाल से पुरानी दिल्ली पर अनेक राजाओं एवं सम्राटों ने राज्य किया है तथा समय-समय पर इसके नाम में भी परिवर्तन किया। पुरानी दिल्ली 1638 के बाद मुग़ल सम्राटों की राजधानी रही। वर्ष 1857 में अंग्रेजी हुक़ूमत के दौरान हुए प्रथम भारतीय विद्रोह (विप्लव) के बाद ब्रिटिश साम्राज्य ने स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन को पूरी तरह दबाने के लिए अंग्रेजों ने 1911 में कलकत्ता (कोलकाता) से अपनी राजधानी को दिल्ली स्थानांतरित कर दिया। 15 अगस्त 1947 को भारत की आज़ादी के बाद दिल्ली को अधिकारिक रूप से भारत की राजधानी घोषित कर दिया गया। अब सवाल यह है कि क्या एक बार फिर यानी 8वीं बार दिल्ली को उजाड़ कर बसाया जाएगा ?

ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर एडविन लुटियन और सर हर्बर्ट बेकर ने बनाया ‘संसद’

अब आते हैं दिल्ली की शान बढ़ाने वाले संसद भवन पर, जिसकी नींव 12 फरवरी 1921 में रखी गई। 1912-1913 में संसद को ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर एडविन लुटियन और सर हर्बर्ट बेकर ने ब्रिटिश भारत के लिए एक नई प्रशासनिक राजधानी बनाने के लिए अपने व्यापक जनादेश के हिस्से के रूप में डिज़ाइन किया था। संसद की रचना मध्य प्रदेश के खजुराहो में स्थित 11वीं शताब्दी के चौसठ योगिनी मंदिर की गोलाकार संरचना से प्रेरित होकर डिजाइन की गई। संसद भवन का निर्माण 1921 में शुरू किया गया और 1927 में पूरा किया गया। 18 जनवरी, 1927 को संसद भवन का उद्घाटन समारोह इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में रखा गया, जिसका उद्घाटन गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने किया। केंद्रीय विधान सभा का तीसरा सत्र 19 जनवरी, 1927 को संसद भवन में आयोजित किया गया। संसद भवन विश्व के किसी भी देश में विद्यमान वास्तु कला का एक उत्कृष्ट नमूना है। इसकी तुलना विश्व के सर्वोत्तम विधान-भवनों के साथ की जा सकती है। यह एक विशाल वृत्ताकार भवन है, जिसका व्यास 560 फुट तथा जिसका घेरा 533 मीटर है। यह लगभग 6 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। भवन के 12 दरवाजे हैं, जिनमें से 5 के सामने द्वार मंडप बने हुए हैं। पहली मंज़िल पर खुला बरामदा हल्के पीले रंग के 144 चित्ताकर्षक खंभों की कतार से सुसज्‍जित हैं, जिनकी प्रत्येक की ऊँचाई 27 फुट है। भारत की संविधान सभा की पहली बैठक 1946-1949 में संसद भवन में ही हुई थी। 1947 में ब्रिटिश शासन से भारत के हाथों में सत्ता का ऐतिहासिक हस्तांतरण भी संसद भवन में ही हुआ था।

मंत्री हरदीप पुरी : संसद भवन को तोड़ कर नयी इमारत बनाने की धारणा ग़लत

फिलहाल हरदीप पुरी ने संसद भवन की पुनर्निर्माण योजना का ज़िक्र करते हुये स्पष्ट किया है कि संसद भवन को तोड़ कर नयी इमारत बनाने की धारणा ग़लत है। पुरी ने कहा कि ऐतिहासिक इमारत अभी की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पा रही हैं, इसलिए बदलती ज़रूरतों के मुताबिक़ इसके पुनर्निर्माण की योजना बनायी गई है। अभी इसके लिये वैश्विक स्तर पर ‘आइडिया’ आमंत्रित किये जा रहे हैं, वहीं आवास एवं शहरी मामलों के सचिव दुर्गा शंकर मिश्रा ने कहा कि संसद भवन, केंद्रीय सचिवालय और सेंट्रल विस्टा के पुनर्निर्माण की महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करने के लिये सकारात्मक सोच वाले इंजीनियर और अधिकारियों की टीम बनायी जा रही है।

Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares