कैम्ब्रिज से छुट्टी पर आए और भारत को बता गए दुश्मनों की ‘छुट्टी’ करने का मार्ग

*भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक थे डॉ. होमी जहाँगीर भाभा

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 30 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही भारत के वैज्ञानिकों ने कई ऐसे कार्यों को पूर्ण करना शुरू कर दिया था जिससे भारत एक विकाशसील देश की श्रेणी में शामिल हो सके, उसी दौरान भारत को आंतरिक और बाहरी हमलों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए उस दौर के एक महान वैज्ञानिक ने परमाणु ऊर्जा की कल्पना करते हुए 1965 में ऑल इंडिया रेडियो से घोषणा कर दी की कि यदि “मुझे छूट दी जाए, तो भारत 18 महीने के अंदर परमाणु बम बना सकता है।” यह उद्घोष सुन कर अमेरिका भी घबरा गया। उस महान वैज्ञानिक का नाम था डॉ होमी जहाँगीर भाभा। भाभा इस बात से काफी आश्‍वस्‍त थे कि यदि भारत को ताकतवर बनना है, तो ऊर्जा, कृषि और मेडिसिन जैसे क्षेत्रों के लिए शांतिपूर्ण नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम शुरू करना होगा, इसके अतिरिक्त भाभा ये भी चाहते थे कि देश की सुरक्षा के लिए परमाणु बम बनाए जाएँ। डॉ होमी जहाँगीर भाभा भारत ही नहीं अपितु विश्‍व के जाने माने वैज्ञानिकों में से एक थे। असाधारण प्रतिभा के धनि होमी भाभा सिर्फ सपने देखने में ही विश्वास नहीं करते थें, अपितु उन्हें पूरा करने में जुट जाते थे। उनके अथक प्रयासों का ही परिणाम है कि आज भारत परमाणु तकनीक से सुसम्पन्न राष्ट्रों की श्रेणी में गिना जाता है। डॉ. भाभा उदार विचारधारा के थे। उनके व्यवहार में मानवीयता की झलक सदैव दृष्टिगोचर होती थी। डॉ भाभा को हम इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज उनकी 110वीं जयंती है।

बचपन से ही चाँद तारों और अंतरिक्ष को जानने की थी जिज्ञासा

होमी जहाँगीर भाभा का जन्म 30 अक्टूबर, 1909 को मुम्बई के एक सम्पन्न पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता जे. एच. भाभा मुम्बई के एक प्रतिष्ठित बैरिस्टर थे। डॉ होमी जहाँगीर भाभा के मन में बचपन से ही चाँद तारों और अंतरिक्ष के सम्बन्ध में जानने की बड़ी जिज्ञासा थी। वे रात को सोते नहीं थे, घंटों उनके दिमाग में विचारों की तीव्रता उमड़ती रहती थी। 15 वर्ष की आयु में ही उन्होंने वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत को समझ लिया था। भाभा ने अपनी स्कूल की पढ़ाई मुंबई के कैथड्रल और जॉन केनन स्कूल से की, इसके बाद उन्होंने एल्फिस्टन कॉलेज मुंबई और रोयाल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से बीएससी किया। मुंबई से पढ़ाई पूरी करने के बाद भाभा 1927 में इंग्लैंड के कैअस कॉलेज, कैंब्रिज इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने चले गए। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से 1930 में स्नातक उपाधि अर्जित की। 1934 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की। जर्मनी में उन्होंने कॉस्मिक किरणों पर अध्ययन और प्रयोग किए, हालाँकि इंजीनियरिंग पढ़ने का निर्णय उनका नहीं था। केवल परिवार की इच्छा के लिए उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, परंतु अपने प्रिय विषय फिजिक्स से भी स्वयं को जोड़े रखा। न्यूक्लियर फिजिक्स के प्रति उनका लगाव एक जुनूनी स्तर तक पहुँच चुका था अतः उन्होंने कैंब्रिज से अपने पिता को पत्र लिखा, जिसमें भाभा ने अपने इरादे बताते हुए फिजिक्स को ही अपना अंतिम लक्ष्य लिखा।

द्वितीय विश्व युद्ध बना भारत के परमाणु ऊर्जा विस्तार का कारण

सितंबर 1939 में डॉ. भाभा कैम्ब्रिज में अध्ययन और अनुसंधान कार्य से छुट्टी लेकर भारत आए उसी दौरान द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। इस समय हिटलर पूरे यूरोप पर तेजी से क़ब्ज़ा करता जा रहा था और इंग्लैंड पर हमला सुनिश्चित कर दिया था। इंग्लैंड के अधिकांश वैज्ञानिक युद्ध के लिये सक्रिय हो गए और पूर्वी यूरोप में मौलिक अनुसंधान लगभग ठप्प सा हो गया। ऐसी परिस्थिति में इंग्लैंड जाकर अनुसंधान जारी रखना डॉ. भाभा के लिए संभव नहीं था। डॉ. भाभा के सामने यह प्रश्न था कि वे भारत में क्या करें ? उनकी प्रखर प्रतिभा से परिचित कुछ विश्वविद्यालयों ने उन्हें अध्यापन कार्य के लिये आमंत्रित भी किया। अंततः डॉ. भाभा ने ‘भारतीय विज्ञान संस्थान’ (IISc) बैंगलोर को चुना, जहाँ वे भौतिक शास्त्र विभाग के प्राध्यापक के पद पर पढाने लगे। यह उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था। डॉ. भाभा को उनके कार्यों में सहायता के लिए ‘सर दोराब जी टाटा ट्रस्ट’ ने एक छोटी-सी राशि भी अनुमोदित की। डॉ. भाभा के लिए कैम्ब्रिज की तुलना में बैंगलोर में काम करना कठिन था। कैम्ब्रिज में वे सरलता से अपने वरिष्ठ लोगों से सम्बन्ध बना लेते थे, परंतु बैंगलोर में यह उनके लिए चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने अपना अनुसंधान कार्य जारी रखा और धीरे-धीरे भारतीय सहयोगियों से संपर्क भी बनाना शुरू किया। उन दिनों ‘भारतीय विज्ञान संस्थान’, बैंगलोर में ‘सर सी. वी. रमन’ भौतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख थे। सर रमन, डॉ. भाभा को शुरू से ही पसंद किया करते थे इसलिए रमन ने ‘फैलो ऑफ़ रायल सोसायटी’ (FRS) में चयन हेतु डॉ. भाभा की मदद की।

भारत के लिए वैज्ञानिक विकास का निर्णायक मोड़

बैंगलोर में डॉ. भाभा कॉस्मिक किरणों के हार्ड कम्पोनेंट पर उत्कृष्ट अनुसंधान कार्य कर रहे थे, परंतु वे देश में विज्ञान की उन्नति के बारे में बहुत चिंतित थे। उन्हें चिंता थी कि क्या भारत उस गति से उन्नति कर रहा है जिसकी उसे ज़रूरत है? देश में वैज्ञानिक क्रांति के लिए बैंगलोर का संस्थान पर्याप्त नहीं था। डॉ. भाभा ने नाभिकीय विज्ञान के क्षेत्र में विशिष्ट अनुसंधान के लिए एक अलग संस्थान बनाने का विचार बनाया और सर दोराब जी टाटा ट्रस्ट से मदद माँगी। यह सम्पूर्ण भारत वर्ष के लिए वैज्ञानिक चेतना एवं विकास का निर्णायक मोड़ था। भारत की स्वतंत्रता के बाद होमी जहाँगीर भाभा ने दुनिया भर में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिकों से अपील की कि वे भारत लौट आएँ। उनकी ये अपील रंग लाई और कुछ वैज्ञानिक भारत लौटे आए। इन्हीं में से एक थे मैनचेस्टर की इंपीरियल कैमिकल कंपनी में काम करने वाले होमी नौशेरवाँजी सेठना। अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाले सेठना में भाभा को काफी संभावनाएं दिखाई दीं। ये दोनों वैज्ञानिक भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने के अपने कार्यक्रम में जुट गए।

जवाहरलाल नेहरू के थे काफ़ी नज़दीक

होमी भाभा जवाहरलाल नेहरू के काफ़ी नज़दीक थे और दुनिया के उन चुनिंदा लोगों में से थे. जो उन्हें भाई कहकर पुकारते थे। नेहरू को केवल दो लोग भाई कहते थे, एक जयप्रकाश नारायण और दूसरे होमी भाभा। इंदिरा गांधी ने अपने एक भाषण में कहा था कि नेहरू को भाभा अक्सर देर रात में फ़ोन करते थे और नेहरू हमेशा उनसे बात करने के लिए समय निकालते थे। अंग्रेज़ वैज्ञानिक पैट्रिक बैंकेट, जो डीआरडीओ के सलाहकार हुआ करते थे उनका कहना था कि “नेहरू को बौद्धिक कंपनी बहुत पसंद थी और होमी भाभा से वह कंपनी उन्हें मिला करती थी।” भाभा का सोचने का दाएरा काफ़ी विस्तृत था। वो वर्तमान के साथ-साथ आने वाले समय की आवश्यकताओं को भी उतना ही महत्व देते थे।

परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के थे प्रबल पक्षधर

डॉ भाभा परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के प्रबल पक्षधर थे। डॉक्टर भाभा के नेतृत्व में भारत में परमाणु ऊर्जा आयोग (NEC) की स्थापना की गई। उनके एटॉमिक एनर्जी के विकास के लिए समर्पित प्रयासों का ही परिणाम था कि भारत ने 1956 में ट्रांबे में एशिया के प्रथम एटमिक रिएक्टर की स्थापना की। इतना ही नहीं, डॉ भाभा को 1956 में जेनेवा में आयोजित यूएन कॉफ्रेंस ऑन एटॉमिक एनर्जी के चेयरमैन भी चुने गया था। उन्होंने जेआरडी टाटा की मदद से मुंबई में ‘टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च’ की स्थापना की और 1945 में इसके निदेशक बने। डॉ. होमी जहाँगीर भाभा के प्रयासों का ही परिणाम है कि कृषि, उद्योग और औषधि उद्योग तथा प्राणिशास्त्र के लिए आवश्यक लगभग 205 रेडियो आइसोटोप आज देश में उपलब्ध हैं। भाभा ने जल्दी नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थों जैसे- मछली, फल, वनस्पति आदि को जीवाणुओं से बचाने के लिए विकिरण के प्रभाव को इस्तेमाल करने की उच्च प्राथमिकता दी और इस दिशा में शोध किया। बीजों के शुद्धीकरण पर भी जोर दिया ताकि अधिक से अधिक अनाज का उत्पादन किया जा सके। भूगर्भीय विस्फोटों तथा भूकंपों के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए एक केन्द्र बंगलौर के पास खोला गया। डॉक्टर भाभा को 5 बार भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया, परंतु विज्ञान की दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान इस महान वैज्ञानिक को मिल नहीं पाया। उन्हें भारत सरकार ने पद्म भूषण के अवॉर्ड से सम्मानित किया है। 1943 में एडम्स पुरस्कार तथा कॉस्मिक किरणों पर उनके कार्यों के लिए कैम्ब्रिज फिलॉसॉफिकल सोसाइटी ने 1948 में उन्हें हॉपकिन्स पुरस्कार से सम्मानित किया। अनेक विश्व विद्यालयों ने भाभा को डॉक्टर ऑफ सांइस जैसी उपाधियों से विभूषित किया। भारत सरकार ने सन् 1954 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया था। होमी भाभा की तीन पुस्तकें क्वांम्टम थ्योरी, एलिमेंट्री फिज़िकल पार्टिकल्स एवं कॉस्मिक रेडिएशन बहुत चर्चित हैं। शास्त्रीय संगीत, मूर्तिकला तथा नृत्य आदि क्षेत्रों के विषयों पर भी उनकी अच्छी पकङ़ थी। वे आधुनिक चित्रकारों को प्रोत्साहित करने के लिए उनके चित्रों को खरीदकर ट्रॉम्बे स्थित संस्थान में सजाते थे। संगीत कार्यक्रमों में सदैव हिस्सा लेते थे और कला के दूसरे पक्ष पर भी पूरे अधिकार से बोलते थे, जितना कि विज्ञान पर। उनका मानना था कि सिर्फ विज्ञान ही देश को उन्नती के पथ पर ले जा सकता है।

विमान दुर्घटना में हुआ निधन

जनवरी 1966 में मुंबई से न्यूयॉर्क जा रहे एयर इंडिया बोइंग 707 जहाज मॉन्ट ब्लां के निकट दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस दौरान विमान में सवार सभी 117 लोगों की मौत हो गई थी। इसी विमान में मौजूद होमी जहाँगीर भाभा भी थे। भाभा एक कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने ऑस्ट्रिया के वियना शहर जा रहे थे। इस विमान दुर्घटना का रहस्य आज तक नहीं खुल पाया है। एक न्यूज वेबसाइट ने अपनी रिपोर्ट में इसके संकेत दिए थे कि भाभा के प्लेन क्रैश में अमेरिकी गुप्तचर अभिकरण Central Intelligence Agency यानी CIA का हाथ था। इस प्लेन क्रैश में भारत के इस महान वैज्ञानिक की मृत्यु 24 जनवरी 1966 को हो गई थी। भारत सरकार ने इस महान वैज्ञानिक के योगदान को देखते हुए भारतीय परमाणु रिसर्च सेंटर का नाम भाभा परमाणु रिसर्च संस्थान रखा है।

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