माँ का नहीं देख सके मुँह और माँ भारती की मुक्ति के लिए कर दी क्रांति

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 4 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। काला पानी का नाम सुनते ही एक दर्दनाक स्मृतियाँ अकस्मात ही हमारे मस्तिष्क में भ्रमण करने लगती हैं। काले पानी की ज़मीनी सच्चाई तो उन्हीं लोगों को बलिभाँति पता है जो इस परिस्थिती से गुजरे थे। काले पानी की वास्तविकता बड़ी ही जटिल और भयावह है। ब्रिटिश शासन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को बंदी बनाकर रखने और उन पर अत्याचार करने के लिए ही काले पानी के दंड की शुरुआत की थी। भारत जब गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा था, अंग्रेजी सरकार स्वतंत्रता सेनानियों पर कहर ढा रही थी। हजारों सेनानियों को फांसी दे दी गई, तोपों के मुंह पर बांध कर उन्हें उड़ा दिया गया। कई ऐसे भी थे जिन्हें तिल तिलकर मारा जाता था, इसके लिए अंग्रेजों के पास सेल्युलर जेल यानी काला पानी बनाया। काला पानी भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय है। इस जेल को सेल्युलर इसलिए नाम दिया गया था, क्योंकि यहाँ एक कैदी से दूसरे से बिलकुल अलग रखा जाता था। जेल में हर कैदी के लिए एक अलग सेल होती थी। यहाँ का अकेलापन कैदी के लिए सबसे भयावह होता था। क्रांतिकारियों पर कहर बरपाने के लिए अंग्रेज उन्हें काला पानी की सज़ा सुनाकर यातनाए देने के लिए काला पानी भेज दिया जाता था। उन्हीं महान क्रांतिकारियों में से थे वासुदेव बलवंत फडके और भाई परमानंद आज इन दोनों की जयंती के अवसर पर हम आपको इन दोनों सपूतों से परिचित कराने जा गहे हैं।

वासुदेव बलवंत फडके

गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिकारियों में अनगिनत नाम शामिल हैं, परंतु सार्वधिक श्रेय यदि किसी को जाता है, तो वो हैं, महाराष्ट्र के वासुदेव बलवंत फडके। 1857 की क्रांति के पश्चात यदि ब्रिटिश सरकार किसी से आतंकित और भयभीत थी, तो वासुदेव बलवंत फडके और उनकी गुरिल्ला टुकिड़यों से। फडके ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का संगठन करने वाले भारत के प्रथम क्रान्तिकारी थे। वासुदेव बलवन्त फडके का जन्म 4 नवंबर, 1845 को महाराष्ट्र में रायगढ के शिरढोणे नामक गाँव में हुआ था। आज उनकी 174वीं जयंती है। विद्यार्थी जीवन में ही वासुदेव बलवंत फडके को 1857 की विफल क्रांति से परिचित हो चुका था। महाराष्ट्र में अपनी शिक्षा पूरी करके फडके ग्रेट इंडियन पेनिंसुला रेलवे (Great Indian Peninsula Railway)और पुणे के मिलिट्री फाइनेंस डिपार्टमेंट (Defense Finance Department) में नौकरी करने लगे, उसी दौरान उन्होंने जंगल में एक व्यायामशाला बनाई, जहाँ ज्योतिबा फुले ने उनका सहयोग किया। लोगों को यहाँ शस्त्र शिक्षा प्रदान की जाने लगे। यहीं सेलोकमान्य तिलक ने भी शस्त्र चलाना सीखा था।

महादेव गोविन्द रानाडे बने प्रेरणा

1857 की क्रान्ति के दमन के बाद देश में धीरे-धीरे नई जागृति आई और विभिन्न क्षेत्रों में संगठन बनने लगे। इन्हीं में एक संस्था पूना की ‘सार्वजनिक सभा’ थी। 1870 में ने एक आयोजन किया, जिसमें प्रसिद्ध भारतीय राष्ट्रवादी, विद्वान, समाज सुधारक और न्यायविद महादेव गोविन्द रानाडे ने एक भाषण दिया, उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अंग्रेज़ किस प्रकार भारत की आर्थिक लूट कर रहे हैं। इसका फडके पर बड़ा प्रभाव पड़ा। वे नौकरी से मिली छुट्टी के दिनों में गाँव-गाँव जाकर लोगों में इस लूट के विरोध का प्रचार करने लगे। 1871 में एक दिन सायंकाल वासुदेव बलवन्त फडके कुछ गंभीर विचार में बैठे थे। तभी उनकी माताजी की तीव्र अस्वस्थता का तार उनको मिला। इसमें लिखा था कि ‘वासु’ (वासुदेव बलवनंत फडके) तुम शीघ्र ही घर आ जाओ, नहीं तो माँ के दर्शन भी शायद न हो सकेंगे। इस वेदनापूर्ण तार को पढ़कर अतीत की स्मृतियाँ फडके के मानस पटल पर आ गयीं और तार लेकर वे अंग्रेज़ अधिकारी के पास अवकाश का प्रार्थना-पत्र देने के लिए गए। परंतुअंग्रेज़ तो भारतीयों को अपमानित करने के लिए सतत प्रयासरत रहते थे। उस अंग्रेज़ अधिकारी ने अवकाश नहीं दिया, लेकिन वासुदेव बलवन्त फडके दूसरे दिन अपने गांव चले आए। गाँव आने पर वासुदेव पर वज्राघात हुआ। जब उन्होंने देखा कि उनका मुंह देखे बिना ही तड़पते हुए उनकी ममतामयी माँ चल बसी हैं। उन्होंने पाँव छूकर रोते हुए माता से क्षमा मांगी, परंतु अंग्रेज़ी शासन के दुव्यर्वहार से उनका हृदय द्रवित हो उठा। इस घटना के वासुदेव फडके ने नौकरी छोड़ दी और विदेशियों के विरुद्ध क्रांति की तैयारी करने लगे। 1860 में, साथी समाज सुधारकों और क्रांतिकारियों लक्ष्मण नरहर इंद्रपुरकर और वामन प्रभाकर भावे के साथ फडके ने पूना मूल संस्था (पीएनआई) की स्थापना की, जिसे महाराष्ट्र शिक्षा सोसायटी (एमईएस) के रूप में नाम दिया गया। पीएनआई के माध्यम से, उन्होंने पुणे में भावे स्कूल की स्थापना की। आज एमईएस महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में 77 से अधिक संस्थानों को चलाता हो रहा है।

आदिवासियों की सेना संगठित कर किया युद्ध

फडके ने शिवाजी का मार्ग अपनाकर आदिवासियों की सेना संगठित करने की कोशिश प्रारम्भ कर दी। उन्होंने फ़रवरी 1879 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा कर दी। धन-संग्रह के लिए धनिकों के यहाँ डाके भी डाले। उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में घूम-घूमकर नवयुवकों से विचार-विमर्श किया, और उन्हें संगठित करने का प्रयास किया। परंतुउन्हें नवयुवकों के व्यवहार से आशा की कोई किरण नहीं दिखायी पड़ी। कुछ दिनों बाद ‘गोविन्द राव दावरे’ तथा कुछ अन्य युवक उनके साथ खड़े हो गए। महाराष्ट्र के सात ज़िलों में वासुदेव फडके की सेना का ज़बर्दस्त प्रभाव फैल चुका था। अंग्रेज़ अफ़सर डर गए विश्राम बाग़ में इकट्ठा हुए, वहाँ पर एक सरकारी भवन में बैठक चल रही थी कि 13 मई, 1879 की रात 12 बजे वासुदेव बलवन्त फडके अपने साथियों सहित वहाँ आ गए। अंग्रेज़ अफ़सरों को मारा और भवन को आग लगा दी। उसके बाद अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें ज़िन्दा या मुर्दा पकड़ने पर 50 हज़ार रुपए का इनाम घोषित कर दिया, परंतु दूसरे ही दिन मुंबई नगर में वासुदेव के हस्ताक्षर से इश्तहार लगा दिए गए कि जो अंग्रेज़ अफ़सर ‘रिचर्ड’ का सिर काटकर लाएगा, उसे 75 हज़ार रुपए का इनाम दिया जाएगा। अंग्रेज़ अफ़सर इससे और भी बौखला गए। अंग्रेज़ सरकार फडके के पीछे पड़ गई। वे बीमारी की हालत में एक मन्दिर में विश्राम कर रहे थे, तभी 20 जुलाई, 1879 को उन्हें बंदी बना लिया गया। उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला और आजन्म काला पानी की सज़ा देकर फडके को यमन की अदन (ADEN JAIL) जेल भेज दिया गया।

जेल पहुँचने पर फडके भाग निकले, परंतु वहाँ के मार्गों से परिचित न होने के कारण पकड़ लिये गए। जेल में उनको अनेक प्रकार की यातनाएँ दी गईं। वहाँ उन्हें क्षय रोग हो गया और इस महान् देशभक्त ने 17 फ़रवरी, 1883 को अदन की जेल में अपने प्राण त्याग दिए। फडके को भारतीय सशस्त्र विद्रोह के जनक के रूप में जाना जाता है जिसमें उन्होंने साथी स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा प्रदान की। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के देशभक्ति उपन्यास आनंद मठ में उनके स्वतंत्रता संग्राम के दौरान फडके द्वारा की गई देशभक्ति के विभिन्न कार्य शामिल हैं। 1984 में भारतीय डाक सेवा ने फडके के सम्मान में 50 पैसे का डाक टिकट भी जारी किया। मेट्रो सिनेमा के पास दक्षिण मुंबई में एक चौक का नाम भी फडके के सम्मान में रखा गया है। दिसंबर 2007 मेंगजेंद्र अहिरे द्वारा निर्देशित एक मराठी फिल्म वासुदेव बलवंत फडके भी बन चुकी है।

भाई परमानन्द

भाई परमानन्द का जन्म 4 नवम्बर, 1876 को पंजाब के झेलम में हुआ था। उन्होंने डी.ए.वी. कॉलेज और पंजाब विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूरी की थी। वे आरम्भ में ही आर्य समाज के नेता लाला लाजपत राय और महात्मा हंसराज के प्रभाव में आ गये थे। अत: डी.ए.वी. कॉलेज में अध्यापन कार्य करने के साथ ही वे आर्य समाज का प्रचार भी करते रहे। 1905 में वे दक्षिण अफ़्रीका गये और वहाँ समाज की शाखा स्थापित की। आज इन महान व्यक्तित्व की 143वीं जयंती है।

दक्षिण अफ़्रीका से वे इतिहास का अध्ययन पूरा करने के लिए लंदन गए और 1908 में भारत आकर डी.ए.वी. कॉलेज, लाहौर में फिर से अध्यापन करने लगे। उन्होंने बर्मा की और फिर दोबारा दक्षिण अफ़्रीका की यात्रा की। इस बीच उन्होंने उर्दू में ‘तवारिखे उर्दू’ नामक ‘भारत के इतिहास’ की पुस्तक लिखी। इसे सरकार ने जब्त कर लिया। उनके घर की तलाशी हुई और 3 वर्ष तक अच्छा चाल-चलन रखने के लिए उनसे जमानत देने को कहा गया। इस पर भाई परमानन्द ने भारत छोड़ दिया और ब्रिटेन, गायना और त्रिनिदाद होते हुए कैलिफोर्निया जा पहुँचे। वहाँ परमानन्द के बचपन के मित्र लाला हरदयाल ग़दर पार्टी का काम कर रहे थे। भाई परमानन्द द्वारा लिखी पुस्तक ‘तवारीख-ए-हिन्द’ तथा उनके लेख युवकों को सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित करते थे। 25 फ़रवरी, 1915 को लाहौर में भाई परमानन्द को बंदी बना लिया गया। उनके विरुद्ध अमरीका तथा इंग्लैंड में अंग्रेज़ी सत्ता के विरुद्ध प्रथम लाहौर षड‍्यंत्र रचने, करतार सिंह सराबा तथा अन्य युवकों को क्रांति के लिए प्रेरित करने और आपत्तिजनक साहित्य की रचना करने जैसे आरोप लगाकर फाँसी की सज़ा सुना दी गई। इसका समाचार मिलते ही सारे देश के लोग भड़क उठे। इस स्थिति में सरकार ने भाई परमानन्द की फाँसी की सज़ा को रद्द कर दिया और उन्हें आजीवन कारावास का दण्ड देकर दिसम्बर, 1915 में अंडमान कालापानी भेज दिया । 1920 में सी.एफ़. एन्ड्रूज की मध्यस्थता से उन्हें रिहा कर दिया गया था।

अंडमान की काल कोठरी में गीता के उपदेशों ने सदैव परमानन्द को कर्मठ बनाए रखा। जेल में ‘श्रीमद्भगवद गीता’ सम्बंधी लिखे गए अंशों के आधार पर उन्होंने बाद में ‘मेरे अन्त समय का आश्रय- गीता’ नामक ग्रंथ की रचना की। गांधी जी को जब कालापानी में परमानन्द को अमानवीय यातनाएँ दिए जाने का समाचार मिला, तो उन्होंने 19 नवम्बर, 1919 के ‘यंग इंडिया’ में एक लेख लिखकर यातनाओं की कठोर भर्त्सना की। 1920 में सी.एफ़. एन्ड्रूज की मध्यस्थता से उन्हें रिहा कर दिया गया था।

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