बहुत ‘मीठा’ है भारत, फिर क्यों ‘कड़वाहट’ का विष उड़ेल रहे पेट में ?

विश्लेषण : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 6 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। सोशल मीडिया में भारत के नक्शे की एक तसवीर वायरल हुई है, जिसमें प्रत्येक राज्य की फेमस मिठाई को दर्शाया गया है, जो इस बात की ओर इंगित करता है कि भारत के कोने-कोने में कितनी मिठास भरी हुई है, परंतु इंसान तरह-तरह के अभक्ष्य भोजन खा कर अपने तन को ही नहीं, अपितु मन को भी मैला कर रहा है। शास्त्रों में भी भोजन का एक अलग ही महत्व बताया गया है। साथ ही भोजन करने से मनुष्य पर होने वाले प्रभाव का भी उल्लेख किया गया है। शास्त्रों के अनुसार भोजन करते समय भोजन की सात्विकता पर विशेष ध्यान रखना आवश्यक है, क्योंकि सात्विक भोजन से मन और मस्तिष्क दोनों ही शांत रहते हैं, वहीं इसके विपरीत अभक्ष्य वस्तुएँ खाने से मन तो व्याकुल रहता ही है, तन भी कई सारे रोगों से ग्रसित हो जाता है। हमारे भोजन का हमारे जीवन और मनोमस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त भोजन करते समय अच्छी भावना और अच्छे वातावरण का होना भी बहुत महत्व रखता है। यदि भोजन के सभी नियमों का पालन किया जाए, तो व्यक्ति के जीवन में कभी भी किसी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता। हमारे देश में भोजन को लेकर कुछ प्रचलित कहावतें भी हैं, जैसे ‘जैसा आहार वैसा विचार’ और ‘जैसा अन्न वैसा मन’। वैसे तो भोजन को तीन प्रकार का माना गया है राजसिक, तामसिक और सात्विक। आइए जानते भोजन का मनुष्य के जीवन में क्या महत्व क्या ?

भारतीय सनातन धर्म के अनुसार हमारा भोजन शुद्ध होना चाहिए और उससे भी शुद्ध होना चाहिए जल और वायु। यदि ये तीनों शुद्ध हैं, तो व्यक्ति 100 वर्ष तक जीवित रह सकता है। शास्त्रीय नियमों के अनुसार भोजन करने से पूर्व सदैव अपने शरीर के 5 अंगों हाथ, दोनों पाँव और हमारे मुँह को स्वच्छ रखना चाहिए। भोजन से पूर्व अन्नदेवता, अन्नपूर्णा माता की स्तुति करके उनका धन्यवाद करना चाहिए और साथ ही कहना चाहिए, ‘हे अन्नदेवता, सभी भूखों को भोजन प्राप्त हो।’ भोजन बनाने वाले को भी कुछ शास्त्रीय नियमों का पालन करते हुए बिना स्नान किए भोजन नहीं बनाना चाहिए। भोजन बनाने के बाद 3 रोटियाँ अग्निदेव को समर्पित करने के लिए निकाल लेनी चाहिए। इनमें पहली रोटी गाय की, दूसरी रोटी कौए की और तीसरी रोटी श्वान को अर्पित कर देना चाहिए। सिर्फ सही प्रकार का भोजन ही नहीं, अपितु सही समय पर उचित मात्रा में भोजन करना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अत्यधिक खाने से शरीर में सुस्ती आती है।

मानसिक शक्ति और शारीरिक की सेहत में सुधार का आधार

सात्विक आहार भारतीय परम्परा में बहुत सम्मान भरा स्थान रखता है। योगियों और मुनियों ने भी सात्विक भोजन के सेवन को काफी बेहतर बताया है और वो सात्विक भोजन ही करते थे। सही भोजन शरीर के लिए कितना महत्वपूर्ण है यह हम सब समझते ही हैं। तामसिक भोजन करने से जहाँ शरीर में आलस्य बढ़ने की बात कही जाती है, वहीं राजसिक भोजन खाने से शरीर को उसे पचाने में कठिनाई होती है। सात्विक भोजन पचने में आसान, हल्का और ऊर्जा देने वाला होता है। सात्विक आहार शुद्ध, स्वच्छ और पौष्टिक होता है सात्विक भोजन की विशेषता यही है कि यह मन और पेट को आराम देता है और ऐसी डायट लेने से आपका मन शांत, सचेत और ताजगी से भरा रहता है। आयुर्वेद के अनुसार सात्विक आहार के सेवन से मानसिक शक्ति और शारीरिक स्वास्थ्य सुधार होता है। सात्विक भोजन करने वालों की आयु भी बढ़ती है। ऐसा भोजन खाने से थकान दूर होती है और आपको शांति और खुशी का अहसास होता है। हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए सात्विक भोजन एक अच्छा विकल्प है, क्योंकि इसमें मसाले, तेल और मीठा जैसी चीज़ों का प्रयोग न के बराबर होता है। ताजे फल, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, बादाम आदि, अनाज और ताजा दूध सात्विक भोजन है।

बेचैनी, क्रोध, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा का कारण

राजसिक भोजन हमारे मन को बहुत चंचल बनाता है तथा उसे संसार की ओर प्रवृत करता है। इसमें अण्डे, मछली, केसर, पेस्ट्री, नमक, मिर्च, मसाले आदि तथा सब उतेजक पदार्थ जैसे चाय, काफी, गरम दूध और ज्यादा मात्रा में खाया गया खाना आता है। राजसिक आहार शरीर और मस्तिष्क को कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं। इनका अत्यधिक सेवन शरीर में अतिसक्रियता, बेचैनी, क्रोध, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा इत्यादि लाते हैं। अतिस्वादिष्ट सभी खाद्य पदार्थ राजसिक हैं। तामसिक भोजन हमारे अंदर आलस्य, क्रोध आदि उत्पन्न करता है। वास्तव में किसी भी भोजन की बहुत अधिक मात्रा तामसिक प्रभाव डालती है। मसालेदार भोजन, प्याज, लहसून, चाय, कॉफी और तले हुए खाद्य पदार्थ, मांस, शराब, तम्बाकू, मादक पदार्थ, भारी और बासी खाना, अत्यधिक मीठा भोजन तामसिक भोजन हैं, जो शरीर और मन को सुस्त करते हैं। इनके अत्यधिक सेवन से जड़ता, भ्रम और भटकाव महसूस होता है।

जैसा खाएँ अन्न वैसा बने मन

जैसा भोजन है वैसा ही मन है,
जैसा मन है, वैसे ही हमारे विचार है,
जैसे विचार हैं, वैसे ही कर्म हैं,
जैसे कर्म हैं वैसे ही परिणाम हैं।

आधुनिक खान-पान की एक और विसंगति है कि जब शरीर श्रम करता है, तब उसे कम आहार दिया जाता है, परंतु जब वह विश्राम की अवस्था में होता है, तब उसे अधिक मात्रा में कैलोरीयुक्त आहार दिया जाता है। जैसे दिन का समय जो मेहनत परिश्रम का होता है, तब तो हल्का भोजन, नाश्ता, चाय, काफी, ठंड़े पेय आदि कम कैलोरी वाले आहार करता है और रात्रि में जो विश्राम का समय होता है, प्रायः अधिकांश व्यक्ति गरिष्ठ भोजन करते हैं, जो स्वास्थ्य के मूल सिद्धान्तों के विपरीत होता है। वहीं आजकल लोग चाइनीज़ फूड, फास्टफूड जैसे भोजन को बड़े ही चाव से खाना पसंद करते हैं, परंतु उन्हें इस बात का तनिक भी आभास नहीं होता कि वो जो खा रहे वो शरीर के लिए कचरा के सिवा कुछ नहीं है। दरअसल, चाइनीज फूड में अजीनोमोटो पाया जाता है जो सेहत के लिए हानिकारक होता है। अजनीमोटो को मोनोसोडियम ग्लूटामेट यानी एसएसजी के नाम से भी जाना जाता है और इसमें बहुत अधिक मात्रा में सोडियम होता है। एक बार अजीनोमोटो का सेवन करने के बाद उसकी लत पड़ जाती है और बार-बार भूख लगती है। इस वजह से दिमाग की नसें उत्तेजित हो जाती हैं और न्यूरोट्रांसमीटर को बढ़ा देती हैं। ऐसे में सिर दर्द, व्यवहार में बदलाव जैसी समस्याएं होने लगती हैं। चाइनीज फूड में फीटोएस्ट्रोगेन तत्व बहुत ही अधिक मात्रा में पाया जाता है। इस वजह से ब्रेस्ट कैंसर, नपुंसकता, सेक्स इच्छा में कमी और एंडोमेट्रिओसिस जैसी समस्या होती है।

राजसिक और तामसिक भोजन से बुरे विचार उत्पन्न होते हैं। सात्विक भोजन से शुद्ध विचार आते हैं। शुद्ध विचारों से चरित्र अच्छा बनता है और परमात्मा के प्रेम के लिए अच्छा चरित्र बहुत जरूरी है। परमात्मा के प्रेम के बिना कोई आत्मिक उन्नित नहीं हो सकती।

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