69 वर्ष का हुआ भारतीय भाप इंजन : मुंबई से थाणे के बीच चली थी प्रथम ‘लौहपथगामिनी’

आलेख : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 1 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। मानव कल्पना का कोई अंत नहीं होता। मनुष्य की दृढ़ सोच उसे भीड़ में सबसे अलग बनाती है। आविष्कारों पर भी यही बात लागू होती है। देश और विश्व में जितने भी आविष्कार या रचाएँ हुई हैं, वे किसी न किसी व्यक्ति विशेष की उत्तम सोच का ही परिणाम है। वह केवल एक सिद्धांत पर कार्य करनी हैं, मानव कल्याण। ऐसा ही एक अतुल्य और भव्य आविष्कार था भाप इंजन, जिसने मानव को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाने में लगने वाले समय को बहुत ही अल्प कर दिया। इंजन ने विश्व को एक ऐसा परिवहन साधन दिया, जो आज भी आवागन का एक सरल और सस्ता साधन है। इस साधन को हम रेल TRAIN, रेलगाड़ी, छुक-छुक गाड़ी और कुछ शुद्ध हिन्दी बोलने के आग्रही लोग लौहपथगामिनी के नाम से पुकारते हैं। आज भारत के प्रथम भाप इंजन ए डब्ल्यूजी श्रेणी लोकोमोटिव ( a WG class locomotive ) की 69वीं आविष्कार दिवस है। 1 नवंबर, 1950 को भारत ने अपना प्रथम भाप इंजन बनाया था। इस लेख में आपको रेल और उसके इंजन से जुड़े कुछ विशेष तथ्य बताने जा रहे हैं।

वाष्पयान या भाप इंजन एक प्रकार का ऊष्मीय इंजन था, जो जल-वाष्प के प्रयोग से कार्य करता था। भाप इंजन अधिकांशतः वाह्य दहन इंजन होते थे, जिसमें रैंकाइन चक्र (Rankine Cycle) नामक उष्मा-चक्र (Heat Cycle) काम में लाया जाता था। कुछ वाष्पयान सौर उर्जा, नाभिकीय उर्जा और जिओथर्मल उर्जा से भी चलते चलाए जाते थे। भाप इंजन बनाने के यत्न का सबसे प्राचीन उल्लेख अलेक्जैंड्रिया के हीरो (Hero of Alexandria – 300 ई.पू. से 400 ई.) के लेखों में मिलता है। हीरो से लगभग 2,000 वर्ष बाद यानी 1606 में नेपोलियन अकादमी के संस्थापक और तत्कालीन यूरोप में विज्ञान के अग्रणी नेता मार्क्सेव देला पोर्ता (Marcuse Della Porta) ने हीरो के फुहारेवाले प्रयोग में हवा की जगह भाप का उपयोग किया, परंतु उनके इस सुझाव को क्रियान्वित होने में कई वर्ष लग गए, क्योंकि 92 वर्ष पश्चात यानी 1698 ई. में मार्क्सेव देला पोर्ता के इस सुझाव का उपयोग टामस सेवरी (Thomas Savery) ने पानी चढ़ाने की एक मशीन में किया। सेवरी वे प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने एक व्यावसायिक भाप इंजन बनाया, जिसका उपयोग खदानों में से पानी उलीचने और कुओं में से पानी निकालने में किया गया। सेवरी के इंजन के बाद टामस न्यूकोमेन (1663-1729 ई.) ने न्यूकोमेन इंजन का आविष्कार किया, जिसका प्रयोग 50 वर्षों तक खदानों और कुओं से पानी निकालने में किया गया। इसके बाद 1763 में ग्लासगो विश्वविद्यालय के एक भौतिकी के विद्यर्थी जेम्स वाट को उनके प्रोफेसर ने उन्हें एक न्यूकामेन इंजन की मरम्मत का ओदश दिया, 27 वर्षीय जेम्स ग्लासगो में एक चतुर वैज्ञनिक यंत्ररचयिता थे। मरम्मत करते समय जोम्स वाट ने पाया कि ईंधन बुरी तरह व्यर्थ हो गया है। विचारशील स्वभाव के जेम्स वाट के मन में इसे एक श्रेष्ठ मशीन बनाने का विचार आया, उन्होंने अनेक अन्वेषण किए और यंत्र बनाए और अततः भाप इंजन को उसका वर्तमान स्वरूप प्राप्त हुआ। 1804 में प्रथम पूर्ण कार्यशील रेलवे स्टीम लोकोमोटिव (Locomotive) रेल भाप इंजन रिचर्ड ट्रेविथिक (Richard Trevithick) ने यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) में बनाया था, जिससे 21 फरवरी 1804 को विश्व की प्रथम रेल यात्रा पेन-वाई-डेरेन (Pen-y-darren) से दक्षिण वेल्स (South Wales) में एबरकिनन (Abercynon) से मेरथेयर टाइफिल (Merthyr Tydfil) तक की गई। इस इंजन के डिजाइन में कई महत्वपूर्ण नवाचार शामिल थे, जिसमें उच्च दबाव वाली भाप का उपयोग किया गया था, इंजन के वजन को कम किया गया था और इसकी दक्षता में वृद्धि की गई थी। इसकी सफलता के बाद से उत्तर-पूर्व इंग्लैंड में कोलियरी रेलवे भाप इंजनों के प्रयोग और विकास का प्रमुख केंद्र बन गया।

146 वर्षों के बाद भारत आया विदेशी भाप इंजन

WG class locomotive

विदेशों में निर्मित भाप इंजन को भारत आते-आते 146 वर्ष लग गए। अंततः लोकोमोटिव भाप इंजन 1851 से 1852 के बीच भारत पहुँचा। इनमें जनरल गेज का भाप इंजन “थॉमसन” (4′ 8.1/2″) और ब्रॉडगेज का भाप इंजन “लार्ड फ़ॉकलैंड” (5′6″) शामिल था। इसके प्रयोग से भारत में 16 अप्रैल, 1853 को 3:35 बजे बंबई (अब मुंबई) से बोरी बंदर (अब ठाणे) स्टेशन तक ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे की प्रथम रेल चलाई गई। सिंध, साहिब और सुल्तान नाम के 3 इंजनों ने 14 बोगियों में बैठे करीब 400 यात्रियों को अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचाया था, वहीं भारत में उस समय ट्रेन की शुरुआत देश की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। भाप के इंजन के माध्यम से देश में प्रथम रेल को चलाया गया था। रेल की प्रसिद्धि, लोकप्रियता, उपयोगिता और सुविधाओं को देखते हुए भारत ने अब विदेशी इंजनों पर निर्भर न रहते हुए स्वदेशी भाप इंजन बनाने का निर्णय लिया और 1950 में पश्चिम बंगाल में स्थित चितरंजन रेल कारखाने में प्रथम भाप इंजन तैयार किया गया।फैक्ट्री ने 26 जनवरी, 1950 को स्टीम लोकोमोटिव के उत्पादन की शुरुआत की। उत्तर ब्रिटिश लोकोमोटिव कंपनी के सहयोग से 1 नवंबर, 1950 को, भारतीय राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्वतंत्रता सेनानी देशबंधु चितरंजन दास को औपचारिक रूप से कंपनी द्वारा उत्पादित पहला स्टीम रेल-इंजन एक डब्ल्यूजी श्रेणी का लोकोमोटिव ( A WG class locomotive) पंजीकरण संख्या 8401 नाम से समर्पित किया। नजदीकी रेलवे स्टेशन मिहिजाम का नाम भी बदलकर चितरंजन कर दिया गया। स्टीम लोकोमोटिव निर्माण के लिए आवश्यक कई विशिष्ट मशीनरी इंग्लैंड में वल्कन फाउंड्री से प्राप्त की गई थीं, जो पहले भारत के इंजनों की एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता थीं, यद्यपि 1971 में यहाँ भाप इंजनों का निर्माण कार्य बंद कर दिया गया और इसमें डीज़ल इंजन बनाए जाने लगे। दुनिया के सबसे पुराने स्टीम इंजन से चलने वाली भारत की सबसे पहली हैरिटेज ट्रेन फेयरी क्वीन (Fairy Queen) है, जो नई दिल्ली और राजस्थान के अलवर में चलती थी। फेयरी क्वीन दुनिया का सबसे पुराना स्टीम इंजन है, जिसका निर्माण 1855 में ब्रिटेन की किटसन ने किया था। फेयरी क्वीन को 1998 में विश्व के सबसे पुराना स्टीम लोकोमोटिव इंजन के लिए गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड प्रमाण पत्र दिया गया। इसके साथ ही इसे हेरिटेज अवॉर्ड भी दिया जा चुका है।

भारत के पूर्वोत्तर में पहली बार 1881 में टॉय ट्रेन की घोषणा की गई। यह ट्रेन 2 फुट चौड़े नैरो गेज ट्रेक पर चलती है और इसकी स्पीड बहुत कम होती है। वहीं इस ट्रेन को यूनेस्कों से वर्ल्ड हैरिटेज साइट का भी दर्जा प्राप्त है। भारत के सबसे ऊँचे रेलवे स्टेशनों तक टॉय ट्रेन की पहुँच है। 1856 से 1865 के बीच भारत में सुरंग रेल निर्माण कराया गया। भोर घाट और थूल घाट सहित 1863 में 28 सुरंगों और पुराने पुलों को निर्माण किया गया। 1 जुलाई, 1856 को दक्षिण भारत में रेल की शुरुआत मद्रास रेलवे कंपनी से हुई। स्वतंत्रता के पश्चीत, जब भारत और पाकिस्तान काबँटवारा हुआ, उसी समय 14 अगस्त, 1947 कोरेल नेटवर्क को भी दोनों देशों के बीच में बाँट दिया गया। देश की स्वतंत्रता के 4 वर्ष बाद 1951 में भारतीय रेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया यानि की रेलवे पर पूरी तरह से भारत सरकार ने अपना अधिकार सथापित कर लिया।

रेल नेटवर्क का विस्तारीकरण

1866 से 1872 के बीच भारतीय रेल नेटवर्क का विस्तार किया गया, इस दौरान कलकत्ता को दिल्ली, अमृतसर और मुंबई के साथ जोड़ा गया, इसके साथ ही मुंबई को भी कोचिन और मद्रास समेत तमाम शहरों के साथ जोड़ने का काम किया गया। भारत के पूर्व में जमालपुर वर्कशॉप और पश्चिम में परेले में रोलिंग स्टॉक आदि के रखरखाव के लिए काम किए गए। भारीतय रेल के शुरु होने के 50 वर्ष बिना शौचालय की रेल का प्रयोग होता रहा, जिसके बाद पश्चिम बंगाल के एक यात्री ओखिल चंद्र सेन ने 1909 में पैसेंजर ट्रेन से यात्रा करने के अपने बुरे अनुभव के बारे में साहिबगंज रेल डिविजन के ऑफिस को एक चिट्टठी लिखकर शिकायत की। उनकी शिकायत के बाद रेलवे विभाग ने रेल में शौचालय की सुविधा शुरु की। ओखिल चन्द्र सेन का वो लेटर आज भी इंडियम रेल म्यूजियम में मौजूद है। 1891 में केलव प्रथम श्रेणी के डिब्बों को ही शौचालय की सुविधा से जोड़ा गया था, उसके बाद धीरे-धीरे रेल की सभी डिब्बों में शौचालय की सुविधा की शुरुआत की। 1929 में भारत की प्रथम विद्युत ट्रेन ‘डेक्कन क्वीन’ (Deccan Queen) कल्याण और पुणे के बीच चलाई गई थी। 1945 में प्रथम बार डीजल इंजन की शुरुआत की गई। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के साथ ही भारतीय रेल का गठन किया गया था और इसे क्षेत्रीय रेलों में विभाजित किया गया। 15 अगस्त,1854 में हावड़ा से हुगली के बीच भारत की प्रथम पैसेंजर ट्रेन चलाई गई थी। 3 मार्च, 1859 को इलाहाबाद और कानुपर के बीच रेल सेवा की शुरुआत की गई। 1999 में भारतीय रेलवे के नई दिल्ली स्टेशन का नाम गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया। 1000 रिले और 1133 सिग्नल के साथ इसे विश्व के सबसे बड़े रूट रिले इंटरलॉकिंग सिस्टम (Route Relay Interlocking System) यानी RRIS के लिए गिनीज बुक्स ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह मिली है।

भारतीय रेल एशिया का सबसे बड़ा और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क

आज पूरे देश में रेल नेटवर्क का जाल इस तरह बिछा हुआ है, कि भारत का कोई भी राज्य और कोई भी शहर रेल सुविधा से वंचित नहीं है। भारतीय रेलवे व्यवस्था के तहत इसकी कुल लंबाई 63 हजार 465 किमी है। यानि कि कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से अरुणाचल प्रदेश तक चारों दिशा में लोग ट्रेन से सफर तय कर सकते हैं। इंडियन रेलवे का यह अति रोचक तथ्य है कि भारतीय रेलवे की सहयोगी संस्‍था इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन (IRCTC) पर सिर्फ 1 मिनट में 12 लाख से ज्यादा हिट्स मिलते हैं। वहीं, 1 अप्रैल, 2015 को ऑनलाइन ट्रेन टिकट की बुकिंग के दौरान यह संख्या करीब 13.45 लाख प्रति मिनट के करीब पहुंच गई है। वहीं इस वेबसाइट पर कई बार साइबर हमले भी किए गए, बाबजूद इसके यह वेबसाइट निरंतर लोगों को अपनी सेवाएँ उपलब्ध करवा रही है। आज भारतीय रेल एशिया का सबसे बड़ा और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। यह विश्व का सबसे बड़ा नियोक्ता भी है, इसमें 16 लाख से भी ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। भारतीय रेल लगभग 168 साल से भी ज्यादा समय से भारत में अपनी सेवाएँ प्रदान कर रहा है।

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