पुलिस स्मृति दिवस : दिन-रात ड्यूटी करने वालों को क्यों नही मिलता “जवान-सा” सम्मान

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 21 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। सरहद पर शहीद हुए सैनिक को प्रशासनिक और सामाजिक हर स्तर पर सम्मान दिया जाता है। एक शहीद की शहादत पर पूरा देश उसे श्रदांजलि देने के लिए एकजुट हो जाता है, परंतु जब एक पुलिस जवान अपना कर्तव्य निभाते हुए शहीद होता है, तो उसकी जानकारी भी लोगों तक नहीं पहुँच पाती है। सितंबर 2018 से लेकर अगस्त 2019 तक आतंकवाद रोधी और अन्य अभियानों में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) तथा सीमा सुरक्षा बल (BSF) जैसे अर्ध सैनिक बलों के कर्मियों सहित कुल 292 पुलिसकर्मी शहीद हुए। आँकड़ों के अनुसार स्वतंत्रता से लेकर अब तक 35 हजार से अधिक पुलिसकर्मियों ने अपना बलिदान दिया है। शहीद होने वाले राज्य पुलिस और अर्धसैनिक बलों के कर्मियों में सीआरपीएफ के कर्मियों की संख्या सबसे अधिक 67 है। आज हम पुलिस कर्मियों को इसलिए याद कर रहे हैं, क्योंकि आज 60वाँ पुलिस स्मृति दिवस है। चीनी सैनिकों के साथ मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ते हुए 10 शूरवीर पुलिस कर्मियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था। उनकी शहादत की स्मृति में ही प्रति वर्ष 21 अक्टूबर को देश में पुलिस स्‍मृति दिवस मनाया जाता है। 21 अक्टूबर, 1959 को लद्दाख की कड़ाके की ठंड में केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल की तीसरी बटालियन की एक कंपनी को भारत-तिब्बत सीमा की सुरक्षा के लिए लद्दाख में ‘हॉट-स्प्रिंग’में तैनात किया गया था। कंपनी को टुकड़ियों में बाँट कर चौकसी करने को कहा गया था, जब बल के 21 जवान ‘‘हॉट-स्प्रिंग’’में गश्त लगा रहे थे, तभी चीनी फौज के एक बड़े दस्ते ने इस गश्ती टुकड़ी पर घात लगा कर आक्रमण कर दिया था। उस समय बल के केवल 21 जवानों ने चीनी आक्रमणकारियों का डँट कर सामना किया था।

प्रति वर्ष लगभग 1,000 पुलिसकर्मी

पुलिस के सम्मान में मनाया जाने वाला ये दिवस मीडिया, समाचारपत्रों में नदारद ही जान पड़ता है। वास्तव में ये बड़े दुःख का विषय है कि जनता एवं शांति की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले पुलिस कर्मियों की शहादत को याद करने का आज किसी के पास समय ही नहीं है। किरन बेदी का भी कहना है कि पुलिस के सम्मान में किए जाने वाले समारोह और परेडों में बहुत कम लोग आना पसंद करते हैं। इतना ही नहीं, इन परेडों की कवरेज के लिए मीडिया कर्मी भी उपस्थित नहीं होते हैं। इस देश के 13 लाख से अधिक पुलिस कर्मियों के महत्त्वपूर्ण योगदान को मीडिया कैसे नकार सकता है ? प्रति वर्ष लगभग 1,000 पुलिसकर्मी अपना फर्ज निभाते हुए शहीद होते हैं, परंतु इनमें से किसी को भी अपने कार्यों और फ़र्ज को निभाते हुए शहीद हो जाने के लिये किसी प्रकार की सराहना नहीं मिलती, न ही उनके बलिदानों की कहानी लोगों तक पहुँचती है।

14.4 प्रतिशत पुलिस कर्मियों की कमी

5 नवम्बर 1963 को जयपुर में पुलिस स्मारक का उद्घा़टन करते हुए पंडित नेहरू ने कहा था, ‘हम प्रायः पुलिसकर्मी को अपना फर्ज पूरा करते देखते हैं और अक्सर हम उनकी आलोचना करते हैं। उन पर आरोप भी लगाते हैं, जिनमें से कुछ सच भी साबित होते हैं, कुछ गलत। पर हम भूल जाते हैं कि ये लोग कितना कठिन कार्य करते हैं। आज हमें उनकी सेवा के उस नजरिए को देखना है, जिसमें वे दूसरों की जान व माल की रक्षा के बदले अपनी जिन्दगी से समझौता कर लेते हैं।’’ देश के प्रथम प्रधानमंत्री के 1963 में पुलिस कर्मियों के बारे में ये उद्गार थे। संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार, भारत में प्रति 1 लाख व्यक्ति पर 230 पुलिस होनी चाहिए, परंतु भारत में प्रति 1 लाख व्यक्ति केवल 125 पुलिस कर्मी ही हैं। भारत में जनसंख्या अनुपात में सबसे कम पुलिस है। कई रिक्तियाँ हैं जो भरी नहीं गई हैं। 16.6 लाख पुलिस कर्मियों की आवश्यकता की तुलना में केवल 14.2 लाख पुलिस ही मौजूद है। अर्थात लगभग 14.4 प्रतिशत पुलिस कर्मियों की कमी है, वहीं छोटे शहरों की तुलना में बड़े शहरों में अधिक पुलिस है। कई पुलिस अधिकारियों का उपयोग बहुत कम संख्या में किसी महत्वपूर्ण सुरक्षा के लिए किया जाता है। इसके विपरीत प्रशासनिक और यातायात कर्तव्यों में बहुत अधिक पुलिस कर्मियों को शामिल किया जाता है। अपराध की रोकथाम, पता लगाने और कानून व्यवस्था का समग्र रखरखाव करना पुलिस कर्मियों का विशेष कार्य क्षेत्र है।

क्या है केरिपु ?

केरिपु बल अर्थात आंतरिक सुरक्षा के लिए केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (Central Reserve Police Force) यानी CRPF भारत संघ का प्रमुख केंद्रीय पुलिस बल है। 78 वर्ष पुराने इस बल का इतिहास बहुत ही गौरवशाली है। 27 जुलाई, 1939 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (All-India Congress Committee)ने क्राउन रिप्रजेंटेटिव पुलिस (Crown Representative Police) को मद्रास संकल्प (Madras Resolution) के रूप में गठित किया था। केरिपु बल का उद्देश्य भारत के तत्‍कालीन राज्यों में आंदोलनों एवं राजनीतिक अशांति को दूर करना तथा सामाजिक नीति के रूप में कानून एवं व्‍यवस्‍था बनाए रखना और उसमें सहयोग करना था। स्वतंत्रता के पश्चात 28 दिसंबर, 1949 को संसद के एक अधिनियम में इस बल का नाम केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल कर दिया गया। 1950 में गुजरात का पूर्व भुज, तत्‍कालीन पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्‍य संघ (पीईपीएसयू) तथा चंबल के बीहड़ों के सभी क्षेत्रों में केरिपु बल की सैन्‍य टुकडि़यों के प्रदर्शन की बहुत सराहना की गई थी। 1962 के चीनी आक्रमण के दौरान एक बार फिर बल ने अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना को सहायता प्रदान की। इस आक्रमण के दौरान केरिपु बल के 8 जवान शहीद हुए थे। पश्चिमी और पूर्वी दोनों सीमाओं पर 1965-1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी इस बल ने भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिला कर संघर्ष किया था। भारत में अर्द्ध सैनिक बलों के इतिहास में पहली बार महिलाओं की 1 टुकड़ी सहित केरिपु बल की 13 कंपनियों को आतंकवादियों से लड़ने के लिए भारतीय शाँति सेना के साथ श्रीलंका भी भेजा गया था। 70 के दशक के पश्‍चात जब उग्रवादी तत्‍वों ने त्रिपुरा और मणिपुर में शाँति भंग की, तो वहाँ भी केरिपु बल की बटालियनों को तैनात किया गया था।

You may have missed