जानिए कहानी सिखों के चौथे गुरु रामदास की, जिन्होंने अमृतसर की स्थापना की

रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद, 2 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। “अमृत” अर्थात ‘अमरता’। भारतीय ग्रंथों में अमरत्व प्रदान करने वाले रसायन को अमृत की संज्ञा दी गई है।अर्थ में प्रयुक्त होता है। अमृत शब्द प्रथम बार ऋग्वेद में प्रयोग किया गया था, जहाँ इसे सोम के विभिन्न पर्यायों में से एक माना जाता है। ऐसा ही एक शहर है अमृत सर जहाँ लोगों को पहुँचकर अमृत प्राप्ति की अनुभूति होती है, यूँ तो भारत के धार्मिक स्थलो की बड़ी मान्यता है, उसी में से एक है सिखों का पवित्र स्थल पंजाब का अमृतसर। पवित्र इसलिए, क्योंकि यहाँ सिखों का सबसे बड़ा गुरुद्वारा स्वर्ण मंदिर है, जो अपने आप में ही किसी अमृत कलश से कम नहीं। इसके प्रांगण में पैर रखते ही एक दिव्य शक्ति से स्वयं ही साक्षात्कार हो जाता है। प्रतिदिन यहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। आज हम इस लेख में आपको अमृतसर के गौरवमयी इतिहास और उसे बसाने वाले सिखों के चौथे गुरु “गुरु राम दास” का आपसे परिचय कराने जा रहे हैं।

गुरु राम दास को जेठा जी भी पुकारते थे। राम दास का जन्म लाहौर (अब पाकिस्तान में) के चूना मण्डी में कार्तिक वदी 2, (25वें आसू) संवत 1591 (24 सितंबर, 1534) को हुआ था। उनकी माता दया कौर और पिता हरी दास सोढी खत्री थे। बचपन से ही राम दास बहुत ही सुंदर और आकर्षक थे। राम दास का परिवार बहुत निर्धन था। आजीविका के लिए उन्हें उबले हुए चने पड़ते थे। जब वे केवल 7 वर्ष के थे, उनके माता-पिता की मृत्यु हो गयी। उनकी नानी उन्हें अपने साथ बसर्के गाँव ले आयीं। उन्होंने बसर्के में 5 वर्षों तक उबले हुए चने बेच कर अपना जीवन यापन किया। उसी दौरान उनके दादा चल बसे। दादा की मृत्यु पर गुरु अमर दास साहिब उनकी नानी के साथ उनके घर आए। बालक राम दास से भेंट होने के बाद अमर दास को उनसे एक गहरा लगाव हो गया। उसके बाद रामदास अपनी नानी के साथ पंजाब के तरनतारन में गोइन्दवाल गाँव आ गये, यहाँ भी वे अपनी आजीविका के लिए उबले चने बेचने लगे और साथ ही गुरु अमरदास साहिब द्वारा धार्मिक संगतों में भी भाग लेने लगे, अब वह गोइन्दवाल साहिब के निर्माण और उसके सेवा कार्यों में हाथ बँटाने लगे थे। रामदास का विवाह गुरु अमर दास की पुत्री बीबी भानी के साथ हो गया। उनके यहाँ तीन पुत्र पृथी चन्द, महादेव और अरजन का जन्म हुआ। शादी के पश्चात राम दास गुरु अमदास के पास ही रहने लगे और गुरु घर की सेवा करने लगे। वे गुरु अमर दास के अति प्रिय व विश्वासपात्र सिक्ख बन गए थे। वे भारत के विभिन्न भागों में लम्बे धार्मिक प्रवासों के दौरान गुरु अमर दास के साथ ही रहते थे।

गुरु राम दास एक बहुत ही उच्च वरीयता वाले व्यक्ति थे। वो अपनी भक्ति एवं सेवा के लिए बहुत प्रसिद्ध हो गये थे। गुरु अमर दास ने उन्हें हर पहलू में गुरु बनने के योग्य पाया और 1 सितम्बर 1574 को उन्हें “चतुर्थ नानक” के रूप में स्थापित किया गया। चतुर्थ नानक बनने के बाद गुरु राम दास ने लोगों की भलाई के कार्य करना आरंभ किया इसी उद्देश्य के साथ उन्होंने तुंग, गिलवाली एवं गुमताला गाँवों के जमींदारों से संतोखसर सरोवर खुदवाने के लिए जमीनें खरीदीं। बाद में उन्होने संतोखसर का काम बन्द कर अपना पूरा ध्यान अमृतसर सरोवर खुदवाने में लगा दिया। इस कार्य की देख रेख करने के लिए भाई सहलो एवं बाबा बूढा को नियुक्त किया गया। इसके बाद गुरु राम दास ने “चक रामदास”, जिसे रामदासपुर भी कहते थे, शहर की नींव रखी, जो अब अमृतसर कहलाता है। अमृत सरोवर होने के कारण रामदासपुर अमृतसर कहलाता है।

ये नया शहर जल्द ही अन्तराष्ट्रीय व्यापार का केन्द्र बनकर चमकने लगा। यह शहर व्यापारिक दृष्टि से लाहौर की ही तरह महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। गुरु रामदास साहिब ने स्वयं विभिन्न व्यापारों से सम्बन्धित व्यापारियों को इस शहर में आमंत्रित किया। यह कदम सामरिक दृष्टि से बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ। अमृतसर सिक्खों के लिए भजन-बंदगी का स्थान बनाया गया, इसी के साथ एक विलक्षण सिक्ख पंथ के लिए नवीन मार्ग तैयार हुआ। गुरु राम दास ने “मंजी पद्धति” का संवर्द्धन करते हुए “मसंद पद्धति” का शुभारम्भ किया। यह कदम सिक्ख धर्म की प्रगति में एक मील का पत्थर साबित हुआ।

अमृतसर का इतिहास गौरवमयी है। यह अपनी संस्कृति और लड़ाइयों के लिए बहुत प्रसिद्ध रहा है। अमृतसर अनेक त्रासदियों और दर्दनाक घटनाओं का गवाह रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा नरसंहार अमृतसर के जलियांवाला बाग में ही हुआ था। इसके बाद भारत पाकिस्तान के बीच जो बंटवारा हुआ उस समय भी अमृतसर में बड़ा हत्याकांड हुआ। यहीं नहीं अफग़ान और मुगल शासकों ने इसके ऊपर अनेक आक्रमण किए और इसको बर्बाद कर दिया। इसके बावजूद सिक्खों ने अपने दृढ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से दोबारा इसको बसाया। हालांकि अमृतसर में समय के साथ काफी बदलाव आए हैं, लेकिन आज भी अमृतसर की गरिमा बरकरार है। अमृतसर लगभग साढ़े चार सौ वर्ष से अस्तित्व में है। सबसे पहले गुरु रामदास ने 1577 में 500 बीघा में गुरुद्वारे की नींव रखी थी। यह गुरुद्वारा एक सरोवर के बीच में बना हुआ है। यहाँ का बना तंदूर बड़ा लजीज होता है। यहां पर सुन्दर कृपाण, आम पापड, आम का आचार और सिक्खों की दस गुरुओं की खूबसूरत तस्वीरें मिलती हैं।

अमृतसर में पहले जैसा आकर्षण नहीं रहा। अमृतसर के पास उसके गौरवमयी इतिहास के अलावा कुछ भी नहीं है। अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के अलावा देखने लायक कुछ है तो वह है अमृतसर का पुराना शहर। इसके चारों तरफ दीवार बनी हुई है। इसमें बारह प्रवेश द्वार है। यह बारह द्वार अमृतसर की कहानी बयान करते हैं। अमृतसर दर्शन के लिए सबसे अच्छा साधन साईकिल रिक्शा और ऑटो हैं। इसी प्रचालन को आगे बढ़ाने और विरासत को सँभालने के उद्देश से पंजाब पर्यटन विभाग ने फाजिल्का की एक गैर सरकारी संस्था ग्रेजुएट वेलफेयर एसोसिएशन फाजिल्का से मिलकर, फाजिल्का से शुरू हुए इकोफ्रेंडली रिक्शा ने नए रूप, “ईको- कैब” को अमृतसर में भी शुरू कर दिया है। अब अमृतसर में रिक्शा की सवारी करते समय ना केवल पर्यटकों की जानकारी के लिए ईको- कैब में शहर का पर्यटन मानचित्र है, बल्कि पीने के लिए पानी की बोतल, पढ़ने के लिए अख़बार और सुनने के लिए एफ्फ़ एम्म रेडियो जैसे सुविधाएं भी है।स्वर्ण मंदिर अमृतसर का सबसे बड़ा आकर्षण है। इसका पूरा नाम हरमंदिर साहब है लेकिन यह स्वर्ण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। पूरा अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है। स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों पर्यटक आते हैं। अमृतसर का नाम वास्वत में उस तालाब के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण गुरु रामदास ने अपने हाथों से कराया था।

हरमंदिर साहब परिसर में दो बडे़ और कई छोटे-छोटे तीर्थस्थल हैं। ये सारे तीर्थस्थल जलाशय के चारों तरफ फैले हुए हैं। इस जलाशय को अमृतसर और अमृत झील के नाम से जाना जाता है। पूरा स्वर्ण मंदिर सफेद पत्थरों से बना हुआ है और इसकी दिवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की गई है। हरमंदिर साहब में पूरे दिन गुरु बानी की स्वर लहरियां गुंजती रहती हैं। मंदिर परिसर में पत्थर का स्मारक लगा हुआ है। यह पत्थर जांबाज सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि देने के लिए लगा हुआ है। 13 अप्रैल, 1919 को इस बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था। यह सभा ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध थी। इस सभा को बीच में ही रोकने के लिए जनरल डायर ने बाग के एकमात्र रास्ते को अपने सैनिकों के साथ घेर लिया और भीड़ पर अंधाधुंध गोली बारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में बच्चों, बुढ़ों और महिलाओं समेत लगभग 300 लोगों की जान गई और 1000 से ज्यादा घायल हुए। यह घटना को इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड इतना भयंकर था कि उस बाग में स्थित कुआं शवों से पूरा भर गया था। अब इसे एक सुन्दर पार्क में बदल दिया गया है और इसमें एक संग्राहलय का निर्माण भी कर दिया गया है। इसकी देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी जलियांवाला बाग ट्रस्ट की है। यहाँ पर सुन्दर पेड लगाए गए हैं और बाड़ बनाई गई है। इसमें दो स्मारक भी बनाए गए हैं, जिसमें एक स्मारक रोती हुई मूर्ति का है और दुसरा स्मारक अमर ज्योति का है। बाग में घुमने का समय गर्मियों में सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक और सर्दियों में सुबह 10 बजे से शाम 5 तक रखा गया है।

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