कारगिल विजय दिवस : अदम्य साहस और वीरता का दूसरा नाम था कैप्टन अनुज नैयर, किया था यह कारनामा !

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अहमदाबाद, 25 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। कारगिल युद्ध में भाग लेने वाला हर सिपाही इस जीत का हीरो है, परंतु हम बात कर रहे हैं विजय दिलाने के लिये प्राणों की आहुति देने वाले उन शहीद वीरों की, जिन्होंने प्राण तो गँवाए, किन्तु दुनिया से विदाई लेने से पहले दुश्मनों के दाँत खट्टे कर दिये थे। ऐसे ही वीर शहीदों में एक नाम है जाट रेजिमेंट की 17वीं बटालियन के कैप्टन अनुज नैयर का। अनुज के संघर्ष की कहानी उनके अदम्य साहस को बयान करती है। इसीलिये उन्हें उनकी अनुकरणीय वीरता के लिये सरकार ने भी मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया था। जब अनुज नैयर का तिरंगे में लिपटा शव उनके घर पहुँचा तो वहाँ उनके परिवार और सम्बंधियों के अलावा कोई और भी था, जो फूट-फूटकर रोया था, वह एक लड़की थी, जिसके बारे में हम आपको बताएँगे, परंतु उससे पहले अनुज की वीरता की दास्तान नहीं सुनी तो उस लड़की का भी परिचय अधूरा ही रह जाएगा। इसलिये जानिए कैप्टन अनुज नैयर की गौरवान्वित कर देनेवाली कहानी…

फिल्म की स्टोरी जैसी थी कैप्टन अनुज की कहानी

अनुज अपने विद्यार्थी जीवन में काफी होशियार छात्र थे और चाहते तो बड़ी आसानी से शिक्षक, डॉक्टर या इंजीनियर बन सकते थे, परंतु अनुज ने देश सेवा को चुना और थलसेना में भर्ती हो गये। अनुज और उनकी बचपन की दोस्त के बीच बेहद प्रेम था और अनुज ने उसी दोस्त के साथ शादी करके उसके साथ जीवन जीने के सपने संजोए थे और जल्दी ही 24 साल के अनुज सगाई करने के लिये घर आने वाले थे, तभी कश्मीर के कारगिल में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया और कैप्टन अनुज को टाइगर हिल के पश्चिमी पोइन्ट 4875 को खाली करने की जिम्मेदारी सौंपकर जंग में भेज दिया गया।

ऊँचाई पर बैठे दुश्मन को खदेड़ने का काम था बेहद मुश्किल

इस पूरे टाइगर हिल पर दुश्मन सेना के घुसपैठी सैनिकों ने पूरी तरह से कब्जा जमाया हुआ था। यह पोइंट हजारों फीट की ऊंचाई पर था, जहाँ से गिरने वाला एक पत्थर भी अनुज और उनकी टीम के लिये जानलेवा साबित हो सकता था। ऐसे में ऊँचाई पर बैठे दुश्मन को खदेड़ना और इस पोइंट को जीतना बेहद मुश्किल टास्क था, परंतु युद्ध को जीतने के लिये दुश्मन के एक-एक सैनिक को हराना और भगाना जरूरी था। अनुज का एक गलत कदम भी खुद उनके लिये और उनकी टीम के लिये खतरनाक साबित हो सकता था। ऐसे में बहादुरी के साथ-साथ दिमाग चलाना भी बहुत जरूरी था। इसके बावजूद कैप्टन अनुज ने कदम-कदम पर जान का खतरा होने के बावजूद टीम के साथ कदम आगे बढाया और दबे कदमों से पोइंट पर चढ़ाई शुरू की।

दुश्मन को मिली आहट और कैप्टन पर किया हमला

इसी दौरान दुश्मन घुसपैठियों को आहट मिल गई और उन्होंने हमला कर दिया। कैप्टन ने भी दुश्मनों के दाँत खट्टे कर देने वाला जवाब दिया। उन्होंने अकेले ही पाकिस्तान के नौ घुसपैठियों को मार गिराया और बाकी घुसपैठियों को पीछे हटने के लिये मजबूर कर दिया। इस बीच खुद भी घायल होने के बावजूद उन्होंने दुश्मन के मशीनगन बंकर को उड़ाया, लेकिन जैसे ही वह पोइंट पर तिरंगा फहराने के लिये आगे बढ़े, तभी छुपे हुए दुश्मनों ने उन पर ग्रेनेड से हमला कर दिया। इस हमले में अनुज गंभीर रूप से घायल हो गये, साथियों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका, मगर वह दुश्मनों को पीछे खदेड़ने के लिये आगे बढ़ते चले गये और एक अन्य विस्फोट में अनुज सहित उनकी पूरी टीम शहीद हो गई। पाकिस्तानी घुसपैठियों ने पोइंट पर वापस लौटने और कब्जा करने की कोशिश की, परंतु पीछे से आई कैप्टन बत्रा के नेतृत्व वाली दूसरी टीम ने दुश्मनों के पाँव जमने से पहले ही उखाड़ दिये और उनका काम तमाम कर दिया।

जंग में जाने से पहले सीनियर को दिया था यह संदेश

जब कैप्टन अनुज को जंग में जाने का आदेश मिला तो उन्होंने अपने एक सीनियर अधिकारी से मिलकर उन्हें एक अँगूठी देते हुए कहा था कि यह अँगूठी वह उनकी मंगेतर तक पहुँचा दें। अधिकारी ने कहा कि आप खुद दे देना तो कैप्टन अनुज ने कहा कि मैं जंग लड़ने जा रहा हूँ, यदि वापस आया तो अँगूठी खुद अपने हाथों से पहनाऊँगा, वर्ना आप यह अँगूठी मेरे घर भेज देना और साथ में मेरा संदेश भी पहुँचा देना। दुर्भाग्यवश कैप्टन अनुज जंग से वापस नहीं लौटे। वह देश के लिये और सैनिकों के लिये एक मिसाल बन गये।

फूट-फूटकर रोई थी सिमरन

जब उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ, दिल्ली पहुँचा तो परिवार के साथ उनकी बचपन की दोस्त भी फूट-फूटकर रो पड़ी। उसका नाम सिमरन है, जिसका अनुज से सगाई करने का सपना अधूरा ही रह गया। भारत सरकार ने कैप्टन अनुज नैयर को उनके अदम्य साहस और अनुकरणीय वीरता के लिये मरणोपरांत महावीर चक्र (जो परमवीर चक्र के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है) से सम्मानित किया।

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