विपक्ष ‘बिल्ली के भाग से छींका टूटने’ के इंतज़ार में ? इसीलिए मोदी विरोधियों ने छेड़ा ‘MISSION 2004 PART 2’ ? भाजपा हुई सावधान, मोदी बोले : करो मतदान

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लोकसभा चुनाव 2019 के प्रथम तीन चरणों में मतदान के रुख को भले ही कांग्रेस सहित विपक्ष अपने पक्ष में बता रहा है, परंतु तीन चरणों के बाद मोदी विरोधियों के बयानों में जिस तरह का बदलाव आया है, उससे लगता है कि विपक्ष अब ‘बिल्ली के भाग से छींका टूटने’ वाली कहावत फिर से चरितार्थ होने का इंतजार कर रहा है। इसीलिए मोदी के धुर विरोधी माने जाने वाले कई नेताओं ने तीन चरणों के मतदान के बाद ऐसे-ऐसे बयान देने शुरू किए हैं, जिससे लगता है कि वे 2004 की तर्ज पर कम मतदान करवा कर मोदी सरकार को सत्ता से बिना प्रयास किए ही हटाने में जुट गए हैं।

विपक्ष के इस अभियान को मिशन 2004 पार्ट 2 भी नाम दिया जा सकता है, परंतु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह विपक्ष के इस कथित अभियान को लेकर सावधान हैं और मोदी-शाह लगातार लोगों से अपील कर रहे हैं कि वे शेष चरणों में अधिक से अधिक मतदान करें।

मोदी भाँप गए विपक्ष की चाल

गत 26 अप्रैल को वाराणसी से नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अलग-अलग इंटरव्यू और रैलियों में जो बात महत्वपूर्ण ढंग से उठाई, वह यह है कि विपक्ष के चेहरे तीन चरणों के मतदान लटके हुए हैं और वे यह भ्रम फैला रहे हैं कि मोदी ही आएगा, परंतु मतदाता भ्रम में न रहें। यदि मोदी ही आने वाला है, तो उसे अधिक से अधिक वोट देकर भारी बहुमत के साथ लाएँ। मोदी ने आज झारखंड में फिर यही बात दोहराई। इसका अर्थ यह हुआ कि तीन चरणों के मतदान, राज्यों में बिखराव वाराणसी में मोदी-भाजपा के विराट रूप को देखने के बाद विपक्षी नेताओं को कहीं न कहीं लगने लगा है कि कदाचित वे मोदी को मात नहीं दे पाएँगे। इसीलिए मोदी को यह कहना पड़ा कि विपक्ष के लोग यह अफवाह फैला रहे हैं कि मोदी तो जीत चुका है, परंतु यह मान कर आने वाले चरणों में मतदाता मतदान करने से न चूकें। अधिक से अधिक वोट करें। इतना ही नहीं, विपक्ष की इस चाल से भाजपा के चाणक्य व अध्यक्ष अमित शाह भी सावधान हो गए हैं। मोदी-शाह विपक्षी नेताओं को यह दिखा देना चाहते हैं कि आज की भाजपा अटल-आडवाणी युग से कहीं आगे निकल चुकी है।

किन नेताओं के बदले सुर ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा। (फाइल चित्र)
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा। (फाइल चित्र)

सोशल मीडिया और विभिन्न प्रचार-प्रसार माध्यमों में प्रथम तीन चरणों के मतदान के बाद कई प्रखर मोदी विरोधियों ने ऐसी-ऐसी चालें चलीं और ऐसे-ऐसे बयान देने शुरू किए हैं, जिससे जनता में भ्रम की स्थिति पैदा हो। विपक्षी खेमे के कुछ नेताओं ने मोदी को सत्ता से हटाने के लिए एक रणनीति के तहत काम शुरू किया है, जिसका सबसे बड़ा प्रमाण है वाराणसी से प्रियंका गांधी वाड्रा के चुनाव लड़ने की ख़बर उड़ाना। ऐन वक्त पर पीछे हट कर जनता में यह संदेश देने की कोशिश की गई कि कांग्रेस मोदी से डर गई। इतना ही नहीं, कांग्रेस ने 2014 में तीसरे नंबर पर रहे अजय राय को टिकट देकर ये जताने की कोशिश की कि उसने वाराणसी में मोदी की जीत का मार्ग प्रशस्त कर दिया। इसी रणनीति के तहत कुछ तथाकथित मोदी विरोधी और कांग्रेस समर्थक पत्रकार अचानक मोदी की जीत तय बताने लगे। कांग्रेस की आर्थिक नीतियों के कर्णधार माने जाने वाले एक नेता ने फिर यह स्पष्टता की कि प्रियंका खुद ही वाराणसी से पीछे हट गईं और यह बताने की कोशिश की कि प्रियंका-कांग्रेस मोदी से डर गए हैं। सवाल ये है कि क्या ये सब अचानक अपने आप हो रहा है या फिर कोई योजना के तहत ये भी एक चुनावी रणनीति है वोटर्स को demotivated करके वोट नहीं करने को प्रोत्साहन करने की ?

कांग्रेस की नीयत में ही खोट ?

पहली नज़र में तो यही लगता है कि यह सारा घटनाक्रम जान-बूझ कर किया गया है, ताकि मतदाता 2004 में जिस तरह वाजपेयी की जीत पक्की मान कर वोट देने नहीं निकला और कांग्रेस को यूपीए सरकार बनाने में बिना प्रयास किए ही सफलता मिल गई। ठीक उसी तरह शेष चरणों में मतदाता मोदी की जीत तय मान कर वोट देने न निकले और फायदा फिर एक बार कांग्रेस को हो जाए। इसका संकेत उस दिन पहली बार मिला, जब यूपीए अध्यक्ष और कांग्रेस की सबसे शीर्ष नेता सोनिया गांधी ने रायबरेली से पर्चा भरने के बाद नरेन्द्र मोदी को 2004 की याद दिलाते हुए कहा कि कोई भी अजेय नहीं है। तो क्या कांग्रेस वास्तव में ‘बिल्ली के भाग से छींका टूटने’ के इंतजार में है ? वास्तविकता यह है कि 2004 में वाजपेयी जी इसलिये नहीं हारे थे कि वो पॉपुलर नहीं थे, बल्कि इसलिए हारे थे कि मध्यम वर्ग के वोटर्स उनकी जीत को निश्चित समझ कर वोट देने नहीं निकले, बल्कि छुट्टी मनाने चए गए। लोकसभा चुनाव 2004 में केवल 56 प्रतिशत मतदान हुआ और वाजपेयी सरकार को जाना पड़ा। जिनको 2004 का चुनाव याद है वो Result वाले दिन लगा SHOCK नहीं भूले होंगे। सारे Opinion Poll, Survey, राजनीति के पंडित TINA (There Is No Alternative) फैक्टर की बात करके एक ही बात कह रहे थे कि वाजपेयी जी की जीत निश्चित है। इस निश्चिन्तता की ऐसी हवा चली कि Middle Class वोटर्स वोट देने नहीं निकले। सोनिया गांधी अप्रत्याशित रूप से चुनाव जीती। सोनिया की इसी जीत से एक निचोड़ निकला कि सामान्य वोटर्स आलसी है और उसके इस आलसपन को हवा देना भी जीतने का एक तरीका है। क्या ये रणनीति फिर से दोहराई जा रही है?

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