EXCLUSIVE : भारत में वाघा बॉर्डर नाम की कोई जगह नहीं !!! पढ़िए चौंकाने वाला खुलासा

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 27 जून 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। भारत के अमृतसर और पाकिस्तान के लाहौर के बीच ग्रैंड ट्रंक रोड पर भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित बॉर्डर को भारत में लोग वाघा बॉर्डर कहते हैं, जो कि सरासर गलत है, क्योंकि भारत में वाघा नाम की कोई जगह ही नहीं है। वास्तव में इस बॉर्डर का नाम अटारी बॉर्डर है, जो कि बहुत कम लोग ही जानते हैं। आज हम यहाँ अटारी बॉर्डर के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।

वाघा नहीं, भारत में है अटारी बॉर्डर

पंजाब में भारत-पाकिस्तान की अटारी बॉर्डर अमृतसर से 32 कि.मी. दूर स्थित है, जबकि पाकिस्तान के लाहौर से यह 22 कि.मी. की दूरी पर है। दोनों देशों के बीच जमीनी मार्ग से आवागमन करने का यही एक मात्र मार्ग है। 1947 में भारत का विभाजन हुआ तब अमृतसर-लाहौर के बीच स्थित ग्रैंड ट्रंक रोड पर इस जगह निशानदेही करके बॉर्डर तय की गई। इसके बाद भारत ने 1958 में इस जगह पर एक पुलिस चौकी स्थापित की, जो आज भी मौजूद है। यहाँ से दोनों देशों में आवागमन करने वाले लोगों से यह पुलिस पूछताछ करती है। 1965 में बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) की स्थापना के साथ ही बीएसएफ को यहाँ की रखवाली की जिम्मेदारी सौंपी गई और तब से ही इस जगह रिट्रीट का सिलसिला शुरू हुआ। पंजाब में आने वाले सैलानी अटारी बॉर्डर देखने जरूर आते हैं और यहाँ आने पर वह प्रति दिन होने वाली रिट्रीट भी जरूर देखते हैं। 1990 के दशक में आतंकवाद की शुरुआत होने पर इस जगह पर स्थित द्वार को बड़ा कर दिया गया और 1998 में पंजाब में आतंकवाद फैलने से पूरी बॉर्डर पर फेंसिंग कर दी गई। 2001 में यहाँ एक दर्शक गैलरी बनाई गई, जहाँ से 15 से 20 हजार लोग रिट्रीट देखते हैं। दरअसल बँटवारे के समय वाघा नामक गाँव पाकिस्तान की सीमा में चला गया और अटारी नामक गाँव पंजाब के हिस्से में रहा। इसलिये पाकिस्तान में यह वाघा बॉर्डर के नाम से पहचानी जाती है और भारत में अटारी बॉर्डर।

महाराजा रंजीत सिंह के सेनापति के नाम पर हुआ बॉर्डर का नामकरण

इसके बावजूद भारत में अधिकांश लोग इस वास्तविकता से अपरिचित होने के कारण अटारी बॉर्डर को वाघा बॉर्डर के नाम से ज्यादा लिखते और बोलते आ रहे हैं। इसी कन्फ्यूज़न को दूर करने के लिये केन्द्र सरकार की मंजूरी से पंजाब सरकार ने 2007 में सरकारी नोटिफिकेशन जारी करके आधिकारिक रूप से इसे अटारी बॉर्डर नाम दिया। अटारी के महाराजा रंजीत सिंह की सिक्ख वाहिनी के विख्यात सेनापति शाम सिंह अटारीवाला के नाम से गाँव का नाम अटारी पड़ा था। इसलिये पंजाब सरकार ने अटारीवाला के सम्मान में इस बॉर्डर को अटारी बॉर्डर का नाम दिया है। इस प्रकार अटारी बॉर्डर का अच्छा खासा ऐतिहासिक महत्व है। हालाँकि यह आधिकारिक नाम सरकारी दस्तावेजों में ही सिमट कर रह गया और सरकार की ओर से प्रचार के अभाव में अधिकांश लोग आज भी इसे भारत में वाघा बॉर्डर कहते हैं, जो कि नैतिक रूप से उचित नहीं है।

अटारी बॉर्डर पर हर रोज़ होती है रिट्रीट सेरेमनी

यदि आप अटारी बॉर्डर और बीएसएफ की रिट्रीट देखने के लिये जाना चाहते हैं तो आपको बता दें कि बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी सूर्यास्त के समय आयोजित होती है। गर्मियों में यह लगभग शाम 5.30 बजे होती है, जबकि सर्दियों में थोड़ी जल्दी आयोजित होती है। द्वार खुलने का समय दोपहर 3.30 बजे का है। सेरेमनी में शामिल होने के लिये कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। अंदर जाने के लिये कोई टोकन सिस्टम भी नहीं है और न ही कोई एडवांस बुकिंग करवानी पड़ती है। बस, आपको इसके लिये एक निरंकुश भीड़ का हिस्सा बनना पड़ेगा। अंदर जाने के बाद लंबा इंतजार भी करना होगा और गेट खुलने के साथ ही सिक्योरिटी द्वार की तरफ तेजी से दौड़ लगानी होगी।
रिट्रीट में भारत-पाकिस्तान के जवान एक दूसरे से गुस्से में हाथ मिलाते हैं और दोनों ओर के सैनिक अपने पाँव पटकते हुए पाँव को हवा में काफी ऊपर उठाते हैं। इसके बाद सूर्यास्त के समय राष्ट्रीय झंडे उतारे जाते हैं। इस अवसर पर भारत के बीएसएफ के जवान खाकी रंग की वर्दी में सज्ज होते हैं, जबकि पाकिस्तानी रेंजर्स काले रंग की वर्दी में होते हैं।

ब्रिटिशर सर सिरिल रेडक्लिफ ने बनाई थी भारत-पाक बॉर्डर

उल्लेखनीय है कि 1947 में भारत के अंतिम ब्रिटिश वायसराय माउंटबेटन ने भारत की आजादी की घोषणा की थी और इसके बाद ब्रिटेन से 8 जुलाई को सर सिरिल रेडक्लिफ को भारत बुलाया गया था, उन्हें धर्म के आधार पर भारत और पाकिस्तान की बॉर्डर सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वह भारत में कभी रहे नहीं थे, इसे बॉर्डर सुनिश्चित करने में जुटी पार्टियों ने फायदाकारक माना, क्योंकि इन पार्टियों का सोचना था कि नये रेडक्लिफ का किसी पार्टी की ओर पूर्वाग्रह नहीं होगा। दो सप्ताह में ही रेडक्लिफ ने अपना काम पूरा कर दिया। उन्होंने एक तरफ भारत और पाकिस्तान की बॉर्डर बनाई तो दूसरी ओर भारत और पूर्वी पाकिस्तान (जो अब बांग्लादेश है) की बॉर्डर बनाई थी।

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